मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० * मत्स्यपुराण *
| चक्रमक्षे निबद्धं तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहचक्रो भ्रमत्यक्षः सहाक्षो भ्रमति ध्रुवः॥ ४८<br>अक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>एवमर्थवशात् तस्य सन्निवेशो रथस्य तु॥ ४९<br>तथा संयोगभागेन सिद्धो वै भास्करो रथः।<br>तेनाऽसौ तरणिर्देवो नभसः सर्पते दिवम्॥ ५०<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य तु।<br>भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तौ चक्रयुगयोस्तु वै॥ ५१<br>मण्डलानि भ्रमेतेऽस्य खेचरस्य रथस्य तु।<br>कुलालचक्रभ्रमवन्मण्डलं सर्वतोदिशम्॥ ५२<br>युगाक्षकोटी ते तस्य वातोर्मी स्यन्दनस्य तु।<br>संक्रमते ध्रुवमहो मण्डले सर्वतोदिशम्॥ ५३<br>भ्रमतस्तस्य रश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे।<br>वर्धते दक्षिणेष्ष्वत्र भ्रमतो मण्डलानि तु॥ ५४<br>युगाक्षकोटी सम्बद्धौ द्वे रश्मी स्यन्दनस्य ते।<br>ध्रुवेण प्रगृहीतौ तौ रश्मी धारयता रविम्॥ ५५<br>आकृष्येते यदा ते तु ध्रुवेण समधिष्ठिते।<br>तदा सोऽभ्यन्तरे सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु॥ ५६<br>अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरुभयोश्चरन्।<br>ध्रुवेण मुच्यमानेन पुना रश्मियुगेन च॥ ५७<br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् वै वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ ५८ | इस रथका चक्र अक्षमें बँधा हुआ है और वह अक्ष ध्रुवसे संलग्न है। इसलिये चक्रके साथ अक्ष और अक्षके साथ ध्रुव घूमता रहता है। इस प्रकार ध्रुवद्वारा प्रेरित अक्ष चक्रके साथ ही घूमता है। किसी मुख्य प्रयोजनवश ब्रह्माने इस रथका निर्माण किया है तथा इस प्रकारके अवयवोंके संयोगसे यह सूर्यका रथ सिद्ध हुआ है। इसी रथसे सूर्यदेव आकाशमण्डलमें भ्रमण करते हैं। उस रथके जुए और धुरेके छोर दाहिनी ओरसे घूमते हैं। जब वह रथ आकाशमें मण्डलाकार घूमता है, उस समय उसकी किरणें भी मण्डलाकार घूमती-सी दीख पड़ती हैं। यह मण्डल कुम्हारके चाककी भाँति चारों दिशाओंमें घूमता है। उस रथकी दोनों युगाक्षकोटि और वातोर्मिके चारों दिशाओंमें मण्डलाकार घूमते समय उस रथकी किरणें बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें घट जाती हैं। वे दोनों किरणें रथकी युगाक्षकोटिमें बँधी हुई हैं और वे ध्रुवमें निबद्ध हैं। ये सूर्यसे भी सम्बद्ध हैं। ध्रुव जब उन दोनों किरणोंको खींचते हैं, तब सूर्य मण्डलके अन्तर्गत ही भ्रमण करते हैं। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंमें चक्कर लगाते हैं। पुनः जब ध्रुव दोनों किरणोंको छोड़ देते हैं, तब सूर्य मण्डलोंके बाह्य भागमें घूमने लगते हैं। उस समय वे मण्डलोंको उद्वेष्टित करते हुए बड़े वेगसे चलते हैं॥ ४६—५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोश सूर्याचन्द्रमसोश्चारो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्य-चन्द्रमाकी गति नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२५॥
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
सूर्य-रथ* पर प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न देवताओंका अधिरोहण तथा चन्द्रमाकी विचित्र गति
| सूत उवाच<br>स रथोऽधिष्ठितो देवैर्मासि मासि यथाक्रमम्।<br>ततो वहत्यथादित्यं बहुभिर्ऋषिभिः सह॥ १<br>गन्धर्वरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासौ द्वौ द्वौ क्रमेण च॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! सूर्यका वह रथ प्रत्येक मासमें क्रमशः देवताओंद्वारा अधिष्ठित रहता है। इस प्रकार वह बहुत-से ऋषियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों और राक्षसोंके साथ सूर्यको वहन करता है। ये सभी देवगण दो-दो मासके क्रमसे सूर्यके निकट |
* यह विषय भी भागवत स्कन्ध १२, अ० ११, वायुपुराण अ० ५२ तथा अन्य विष्णु आदि सभी पुराणोंमें स्वल्पान्तरसे प्राप्त होता है।