मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १२५ * <span style="float: right;">४३९</span>
| मेहनाच्च मिहेर्धार्तोर्मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च।<br>न भ्रश्यन्ते ततो ह्यापस्तस्मादब्भ्रस्य वै स्थितिः।<br>स्रष्टासौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः॥ ३५<br><br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः।<br>ग्रहात्रिवृत्त्या सूर्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम्॥ ३६<br><br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठितम्।<br>अतः सूर्यरथस्यापि सन्निवेशं प्रचक्षते।<br>स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिणाभिना॥ ३७ | 'मिह सेचने' अर्थात् 'मिह' धातु सेचन अथवा मेहनके अर्थमें प्रयुक्त होती है, इसलिये 'मिह'—धातुसे मेघ शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'अपो विभ्रति' या 'न भ्रश्यन्ते आपो यस्मात्' जिससे जल नहीं गिरते, उसे अब्भ्र या अभ्र कहते हैं। इस तरह ध्रुवद्वारा अधिकृत सूर्य वृष्टिसर्गकी सृष्टि करते हैं। पुनः ध्रुवद्वारा नियुक्त वायु उस वृष्टिका संहार करती है। नक्षत्रमण्डल सूर्यमण्डलसे निवृत्त होकर विचरण करता है और जब विचरण समाप्त हो जाता है, तब ध्रुवद्वारा अधिष्ठित सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है॥ २७—३६ १/२॥ |
| हिरण्मयेनाणुना वै अष्टचक्रैकनेमिना।<br>चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा॥ ३८<br><br>शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते।<br>द्विगुणश्च रथो पस्थादीषादण्डः प्रमाणतः॥ ३९<br><br>स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो ह्यर्थवशेन तु।<br>असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पवनगैर्हयैः॥ ४०<br><br>छन्दोभिर्वाजिरूपैस्तैर्यथाचक्रं समास्थितैः।<br>वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः॥ ४१<br><br>तेनासौ चरति व्योम्नि भास्वाननुदिनं दिवि।<br>अथाङ्गानि तु सूर्यस्य प्रत्यङ्गानि रथस्य च।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम्॥ ४२<br><br>अहर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकचक्रस्य वै स्मृतः।<br>अराः संवत्सरास्तस्य नेम्यः षडृतवः स्मृताः॥ ४३<br><br>रात्रिर्रवरूथो घर्मश्च ध्वज ऊर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>अक्षकोट्योर्युगान्यस्य आर्तवाहाः कलाः स्मृताः॥ ४४<br><br>तस्य काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै।<br>निमेषश्चानुकर्षोऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता॥ ४५<br><br>युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थकामावुभौ स्मृतौ।<br>सप्ताश्वरूपपाश्छन्दांसि वहन्ते वायुरांहसा॥ ४६ | इसके बाद अब सूर्यके रथकी रचना बतलायी जाती है। उसमें एक पहिया, पाँच अरे (अरगजे) और तीन नाभियाँ हैं। उस चक्रकी नेमि (घेरे)-में स्वर्णमयी आठ छोटी-छोटी पुट्ठियाँ लगी हैं। ऐसे उद्दीप्त एवं शीघ्रगामी रथपर बैठकर सूर्य विचरण करते हैं। उस रथकी लम्बाई एक लाख योजन बतलायी जाती है। उसका ईषादण्ड (हरसा) रथके उपस्थ (मध्यभाग)-से प्रमाणमें दुगुना है। ब्रह्माने किसी मुख्य प्रयोजनवश उस रथका निर्माण किया था। उसका असङ्ग (वह रस्सी, जिससे घोड़े रथमें बँधे रहते हैं) दिव्य एवं स्वर्णमय है। उसमें पवनके समान शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। चक्रके अनुकूल चलनेवाले छन्द ही उन घोड़ोंके रूपमें उपस्थित होते हैं। वह रथ वरुणके रथके लक्षणोंसे मिलता-जुलता-सा है। उसी रथसे सूर्य प्रतिदिन गगन-मण्डलमें विचरते हैं। सूर्यके अङ्गों तथा रथके अवयवोंकी समतामें क्रमशः कल्पना की गयी है। दिनको सूर्यके एक पहियेवाले रथकी नाभि कहा जाता है। वर्ष उसके अरे और छहों ऋतुएँ उसकी नेमि कहलाती हैं। रात्रि उसका वरूथ (कवच, बख्तर) और धूप ऊपर फहरानेवाला ध्वज है। चारों युग इसके धुरेके दोनों छोर हैं और कलाएँ आर्तवाह कही गयी हैं। काष्ठा उसकी नासिका तथा क्षण उसके दाँतोंकी पङ्क्तियाँ हैं। निमेषको इसका अनुकर्ष (रथका तला) और कलाको ईषा (हरसा) कहते हैं। उनके जुएके दोनों छोर अर्थ और काम कहलाते हैं॥ ३७—४५ १/२॥ |
| गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप्तथैव च।<br>पङ्क्तिश्च बृहती चैव उष्णिगेव तु सप्तमः॥ ४७ | गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती और उष्णिक्—ये सातों छन्द सातों घोड़ोंके रूपमें हैं, जो वायु-वेगसे रथको वहन करते हैं। |