मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम्।<br>तुषारवर्षं वर्षन्ति वृद्धा ह्यन्नविवृद्धये॥ १९<br>षष्ठः परिवहो नाम वायुस्तेषां परायणः।<br>योऽसौ बिभर्ति भगवान् गङ्गामाकाशगोचराम्॥ २०<br>दिव्यामृतजलां पुण्यां त्रिपथामिति विश्रुताम्।<br>तस्या विस्पन्दितं तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः॥ २१<br>शीकरान् सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः।<br>दक्षिणेन गिरेर्योऽसौ हेमकूट इति स्मृतः॥ २२<br>उदङ् हिमवतः शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे।<br>पुण्ड्रं नाम समाख्यातं नगरं तत्र वै स्मृतम्॥ २३<br>तस्मिन् प्रवर्तते वर्षं तत् तुषारसमुद्भवम्।<br>ततो हिमवतो वायुर्हिमं तत्र समुद्भवम्॥ २४<br>आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चमानो महागिरिम्।<br>हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टिशेषं ततः परम्॥ २५<br>इभास्ये च ततः पश्चादिदं भूतविवृद्धये।<br>वर्षद्वयं समाख्यातं सम्यग् वृष्टिविवृद्धये॥ २६<br>मेघाश्चाप्यायनं चैव सर्वमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>सूर्य एव तु वृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते॥ २७<br>वर्षं घर्मं हिमं रात्रिं संध्ये चैव दिनं तथा।<br>शुभाशुभफलानीह ध्रुवात् सर्वं प्रवर्तते॥ २८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चापः सूर्यो संगृह्य तिष्ठति।<br>सर्वभूतशरीरेषु त्वापो ह्यानुश्रिताश्च याः॥ २९<br>दह्यमानेषु तेष्वेह जङ्गमस्थावरेषु च।<br>धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्क्रमन्तीह सर्वशः॥ ३०<br>तेन चाभ्राणि जायन्ते स्थानमभ्रमयं स्मृतम्।<br>तेजोभिः सर्वलोकेभ्य आदत्ते रश्मिभिर्जलम्॥ ३१<br>समुद्राद् वायुसंयोगाद् वहन्त्यापो गभस्तयः।<br>ततस्त्वृतुवशात्काले परिवर्तन् दिवाकरः॥ ३२<br>नियच्छत्यापो मेघेभ्यः शुक्लाः शुक्लैस्तु रश्मिभिः।<br>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः॥ ३३<br>ततो वर्षति षण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये।<br>वायुभिः स्तनितं चैव विद्युतस्त्वग्निजाः स्मृताः॥ ३४ | है। पर्जन्य मेघ और चारों वृद्ध दिग्गज हेमन्त-ऋतुमें अन्नकी वृद्धिके लिये शीतसे उत्पन्न हुए तुषारकी वर्षा करते हैं। परिवह नामक छठी वायु इनका आश्रय है। यह ऐश्वर्यशाली पवन आकाशगामिनी गङ्गाको, जो दिव्य अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण, पुण्यमयी तथा त्रिपथगा नामसे विख्यात हैं, धारण करता है, गङ्गासे निकले हुए जलको दिग्गज अपने मोटे-मोटे शुण्डोंसे फुहारेके रूपमें छोड़ते हैं। उसे नीहार (कुहासा) कहते हैं। दक्षिण पार्श्वमें जो पर्वत है, वह हेमकूट नामसे प्रसिद्ध है। वह हिमालय पर्वतके उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओंमें फैला हुआ है। वहाँ पुण्ड्र नामक एक प्रसिद्ध नगर है। उसी नगरमें वह तुषारसे उत्पन्न हुई वर्षा होती है। तदनन्तर हिमवान् पर्वतसे उद्भूत हुई वायु वहाँ उत्पन्न हुए शीकरों को अपने साथ ले आती है और बड़े वेगसे उस महान् गिरिको सींचती हुई उसका अतिक्रमण करके इभास्य नामक वर्षमें निकल जाती है। तत्पश्चात् प्राणियोंकी वृद्धिके लिये वहाँ शेष वृष्टि होती है। पहले जिन दो वर्षोंका वर्णन किया गया है, उनमें अच्छी तरह वृष्टि होती है। इस प्रकार मैंने मेघों तथा उनसे उत्पन्न हुई सारी वृष्टिका वर्णन कर दिया॥ १५—२६ १/२॥<br><br>सूर्य ही सब प्रकारकी वृष्टियोंके मूल कारण कहे जाते हैं। इस लोकमें वर्षा, धूप, हिम, रात्रि, दिन, दोनों संध्याएँ और शुभ एवं अशुभ कर्मोंके फल ध्रुवसे प्रवर्तित होते हैं। ध्रुवद्वारा अधिष्ठित जलको सूर्य ग्रहण करते हैं। जल सभी प्राणियोंके शरीरोंमें परमाणुरूपसे स्थित है। इसी कारण स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके शरीरोंके जलाये जानेपर उनमेंसे वह जल धुएँके रूपमें बाहर निकलता है। उसी धूमसे बादल बनते हैं, इसलिये धूमको अभ्रमय स्थान कहा जाता है। सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंद्वारा सभी लोक (स्थानों)-से जल ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार वे ही किरणें वायुके संयोगसे समुद्रसे भी जल खींचती हैं। तदनन्तर सूर्य ऋतुओंके अनुसार समय-समयपर जलको परिवर्तित कर अपनी श्वेत किरणोंद्वारा वह शुद्ध जल मेघोंको देते हैं। तब वायुद्वारा प्रेरित हुआ वह मेघस्थित जल वर्षके रूपमें भूतलपर गिरता है। इस प्रकार सूर्य सभी प्राणियोंकी समृद्धिके निमित्त छः महीनेतक वर्षा करते हैं। उस समय वायुके आघातसे मेघ-निर्घोष भी होता है। (बिजली भी चमकती है।) ये बिजलियाँ अग्निसे प्रादुर्भूत बतलायी जाती हैं। |