मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२५ * | ४३७ |
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| योऽसौ चतुर्दशर्क्षेषु शिशुमारो व्यवस्थितः।<br>उत्तानपादपुत्रोऽसौ मेढीभूतो ध्रुवो दिवि॥ ५<br>सैष भ्रमन् भ्रामयते चन्द्रादित्यौ ग्रहैः सह।<br>भ्रमन्तमनुसर्पन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्॥ ६<br>ध्रुवस्य मनसा यो वै भ्रमते ज्योतिषां गणः।<br>वातानीकमयैर्बन्धैर्ध्रुवे बद्धः प्रसर्पति॥ ७<br>तेषां भेदाश्च योगश्च तथा कालस्य निश्चयः।<br>अस्तोदयास्तथोत्पाता अयने दक्षिणोत्तरे॥ ८<br>विषुवद्ग्रहवर्णश्च सर्वमेतद् ध्रुवेरितम्।<br>जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्भवः॥ ९<br>द्वितीय आवहन् वायुर्मेघास्ते त्वभिसंश्रिताः।<br>इतो योजनमात्राच्च अध्यर्धविकृता अपि॥ १०<br>वृष्टिसर्गस्तथा तेषां धारासारः प्रकीर्तितः।<br>पुष्करावर्तका नाम ते मेघाः पक्षसम्भवाः॥ ११<br>शक्रेण पक्षाश्छिन्ना वै पर्वतानां महौजसा।<br>कामगानां समृद्धानां भूतानां नाशमिच्छताम्॥ १२<br>पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिणः।<br>पुष्करावर्तका नाम कारणेनेह शब्दिताः॥ १३<br>नानारूपधराश्चैव महाघोरस्वराश्च ते।<br>कल्पान्तवृष्टिकर्तारः कल्पान्ताग्नेर्नियामकाः॥ १४<br>वाय्वाधारा वहन्ते वै सामृताः कल्पसाधकाः।<br>यान्यस्याण्डस्य भिन्नस्य प्राकृतान्यभवंस्तदा॥ १५<br>यस्मिन् ब्रह्मा समुत्पन्नश्चतुर्वक्त्रः स्वयं प्रभुः।<br>तान्येवाण्डकपालानि सर्वे मेघाः प्रकीर्तिताः॥ १६<br>तेषामाप्यायनं धूमः सर्वेषामविशेषतः।<br>तेषां श्रेष्ठश्च पर्जन्यश्चत्वारश्चैव दिग्गजाः॥ १७<br>गजानां पर्वतानां च मेघानां भोगिभिः सह।<br>कुलमेकं द्विधाभूतं योनिरेका जलं स्मृतम्॥ १८ | आकाशमण्डलमें जो यह (चौदह) नक्षत्रोंके मध्यमें स्थित शिशुमार¹ नामक चक्र है वही उत्तानपादका पुत्र ध्रुव है, जो (उस चक्रमें) मेंढीके² समान है। वह ध्रुव स्वयं भ्रमण करता हुआ ग्रहोंके साथ सूर्य और चन्द्रमाको भी घुमाता है। नक्षत्रगण भी चक्रकी भाँति घूमते हुए ध्रुवके पीछे-पीछे चलते हैं। जो ज्योतिर्गण वायुमय बन्धनोंद्वारा ध्रुवमें निबद्ध है, वह ध्रुवके मानसिक संकल्पसे ही घूमता है। उन ज्योतिर्गणोंके भेद, योग, कालका निश्चय, अस्त, उदय, उत्पात, उत्तरायण एवं दक्षिणायनमें गमन, विषुवत् रेखापर स्थिति और ग्रहोंके वर्ण आदि सभी कार्य ध्रुवकी प्रेरणासे होते हैं। (भगणके नीचे मेघ हैं।) जिनसे जीवोंकी उत्पत्ति होती है, उन मेघोंको जीमूत कहते हैं। वे मेघ यहाँसे एक योजन दूर आवह नामक दूसरी वायुके आश्रयपर टिके हुए हैं। उनमें कुछ विकार उत्पन्न हो जानेपर वे ही वृष्टि करते हैं, जो महावृष्टि कही जाती है। पूर्वकालमें महान् ओजस्वी इन्द्रने प्राणियोंके कल्याणकी भावनासे स्वच्छन्दचारी एवं समृद्धिशाली पर्वतोंके पंखोंको काट डाला था। उन पंखोंसे उत्पन्न हुए मेघोंको पुष्करावर्तक कहते हैं। पर्वतोंके पंखोंका नाम पुष्कर था, वे बहुत बड़े-बड़े और जलसे भी परिपूर्ण थे, इसी कारण वे मेघ भी पुष्करावर्तक नामसे कहे गये हैं। ये अनेकों प्रकारके रूप धारण करनेवाले, महान् भयंकर गर्जनासे युक्त, कल्पान्तके समय वृष्टि करनेवाले, कल्पान्तकी अग्निके प्रशामक, अमृतयुक्त और कल्प अर्थात् प्रलयके साधक हैं॥ ४-१४॥<br><br>वे वायुके आधारपर चलते-फिरते हैं। इस अण्डके विदीर्ण होनेपर उससे जो प्राकृतिक कपाल निकले थे और जिसमें सामर्थ्यशाली स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे, उन्हीं अण्डकपालोंको सभी मेघोंके रूपमें बतलाया जाता है। उन सभी मेघोंको समानरूपसे तृप्त करनेवाला धूम है। उनमें पर्जन्य नामक मेघ सबसे श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त ऐरावत, वामन, अञ्जन आदि चार दिग्गज हैं। हाथी, पर्वत, मेघ और सर्प—इन सबका कुल एक है जो दो भागोंमें विभक्त हो गया है; परंतु इनकी योनि (उत्पत्ति-स्थान) एक ही है, जो जल नामसे कही जाती |
१. शिशुमार (सूँस) एक जलीय जन्तु होता है, जो प्रायः सर्पवत् वृत्ताकार कुण्डल (गेंडुर) मारकर स्थित रहता है। उसके समान स्थितिको 'शिशुमार' चक्र कहते हैं। उसीके समान गोल होनेसे नक्षत्रमण्डलकी उससे उपमा दी गयी है।
२. दौरीके केन्द्रमें स्थित खम्भेको मेंढ़ी कहते हैं। उसके आश्रयपर कई बैल चलकर अन्नकणोंको रौंदते हैं। इस सम्बन्धमें विशेष जानकारीके लिये श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराण देखना चाहिये।