मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४३६ * मत्स्यपुराण *
| ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च वर्जनात्।<br>ईर्ष्याद्वेषनिवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात् ॥ १०८<br>ततोऽन्यकामसंयोगशब्दादेर्दोषदर्शनात् ।<br>इत्येतैः कारणैः शुद्धैस्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे ॥ १०९<br>आभूतसम्प्लवस्थानममृतत्वं विभाव्यते ।<br>त्रैलोक्यस्थितिकालो हि न पुनर्मार्गगामिनाम् ॥ ११०<br>ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां पुण्यपापकृतोऽपरम् ।<br>आभूतसम्प्लवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतसः ॥ १११<br>ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्रानुसंस्थितः ।<br>एतद् विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भास्वरम् ॥ ११२<br>यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् ।<br>धर्मे ध्रुवस्य तिष्ठन्ति ये तु लोकस्य काङ्क्षिणः ॥ ११३ | वे लोक-कल्याणकर्ता, स्त्री-पुरुष-सम्पर्करहित, ईर्ष्या, द्वेष आदिसे निवृत्त, प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंके त्यागी तथा अन्यान्य कामसम्बन्धी वासनामय शब्दोंमें दोषदर्शी होते हैं। इन शुद्ध कारणोंसे सम्पन्न होनेके कारण उन्हें अमरताकी प्राप्ति हुई। प्रलयपर्यन्त स्थित रहनेवाले नैष्ठिक ऋषियोंका त्रिलोकीकी स्थितितक वर्तमान रहना अमरत्व कहलाता है। यह कामासक्त व्यक्तियोंको नहीं प्राप्त होता। ब्रह्महत्याजन्य पाप और अश्वमेधजन्य पुण्यसे ही इनमें अन्तर आता है। (भाव यह कि जैसे घोर पाप और महान् पुण्य प्रलयपर्यन्त जीवात्माके साथ लगे रहते हैं, बीचमें नष्ट नहीं होते, वैसे ही ऊर्ध्वरेताका शरीर भी तबतक स्थित रहता है।) सप्तर्षिमण्डलके ऊपर उत्तर दिशामें जहाँ ध्रुवका निवास है, वहीं भगवान् विष्णुका तीसरा दिव्य पद स्थित हुआ था, जो (अब भी) आकाशमें उद्भासित होता रहता है। भगवान् विष्णुके उस परमपदको प्राप्त कर लेनेपर जीवोंको शोक नहीं करना पड़ता। इसलिये जिन्हें ध्रुवलोक प्राप्त करनेकी आकाङ्क्षा होती है, वे सदा धर्म-सम्पादनमें ही लगे रहते हैं॥ १०८-११३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चन्द्रसूर्यभुवनविस्तारो नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें चन्द्र-सूर्य-भुवन-विस्तार नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२४॥
एक सौ पचीसवाँ अध्याय
सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
| एवं श्रुत्वा कथां दिव्याम्बुवाँल्लोमहर्षणिम्।<br>सूर्यचन्द्रमसोश्चारं ग्रहाणां चैव सर्वशः ॥ १ | इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमाकी गति तथा सभी ग्रहोंके गतिचारकी सारी दिव्य कथाको सुनकर शौनकादि ऋषिगण लोमहर्षणके पुत्र सूतजीसे बोले ॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतींषि रविमण्डले।<br>अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा चासंकरेण वा ॥ २<br>कश्च भ्रामयते तानि भ्रमन्ति यदि वा स्वयम्।<br>एतद् वेदितुमिच्छामस्ततो निगद सत्तम ॥ ३ | ऋषियोंने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी ! ये ग्रह, नक्षत्र आदि ज्योतिर्गण तिर्यग्व्यूहमें निबद्ध हो सूर्यमण्डलमें किस प्रकार घूमते हैं? ये सभी परस्पर मिलकर घूमते हैं अथवा पृथक्-पृथक्? इन्हें कोई घुमाता है या ये स्वयं घूमते हैं? हमें इस रहस्यको जाननेकी विशेष उत्कण्ठा है, अतः आप इसका वर्णन कीजिये ॥२-३॥ |
| सूत उवाच<br>भूतसम्मोहनं ह्येतद् ब्रुवतो मे निबोधत।<br>प्रत्यक्षमपि दृश्यं तत् सम्मोहयति वै प्रजाः ॥ ४ | सूतजी कहते हैं — ऋषियो! यह विषय प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाला है; क्योंकि यह प्रत्यक्षरूपसे दृश्य होनेपर भी प्रजाओंको मोहित कर देता है। मैं इसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये! |