मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १२४ * | ४३५ |
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| शरद्वसन्तयोर्मध्यं विषुवं तु विधीयते।<br>आलोकान्तः स्मृतो लोको लोकाच्चालोक उच्यते॥ ९३<br>लोकपालाः स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः।<br>चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ ९४<br>सुधामा चैव वैराजः कर्दभश्च प्रजापतिः।<br>हिरण्यरोमा पर्जन्यः केतुमान् राजसश्च सः॥ ९५<br>निर्द्वन्द्वा निरभिमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः।<br>लोकपालाः स्थितास्त्वेते लोकालोके चतुर्दिशम्॥ ९६ | ग्रसती है। जहाँतक सूर्यका प्रकाश पहुँचता है, उसे लोक कहते हैं और उस लोकके बाद जो तमसाच्छन्न प्रदेश है, उसे अलोक कहा जाता है। इसी लोक और अलोकके मध्यमें स्थित (लोकालोक) पर्वतपर चारों लोकपाल महाप्रलयपर्यन्त निवास करते हैं। उनके नाम हैं—वैराज सुधामा, प्रजापति कर्दम, पर्जन्य हिरण्यरोमा और राजस केतुमान्। ये सभी लोकपाल सुख-दुःख आदि द्वन्द्व, अभिमान, आलस्य और परिग्रहसे रहित होकर लोकालोकके चारों दिशाओंमें स्थित हैं॥ ८६—९६॥ | | उत्तरं यदगस्त्यस्य शृङ्गं देवर्षिसेवितम्।<br>पितृयाणः स्मृतः पन्था वैश्वानरपथाद् बहिः॥ ९७<br>तत्रासते प्रजाकामा ऋषयो येऽग्निहोत्रिणः।<br>लोकस्य संतानकराः पितृयाणे पथि स्थिताः॥ ९८<br>भूतारम्भकृतं कर्म आशिषश्च विशाम्पते।<br>प्रारभन्ते लोककामैस्तेषां पन्थाः स दक्षिणः॥ ९९<br>चलितं ते पुनर्धर्मं स्थापयन्ति युगे युगे।<br>संतततपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च॥ १००<br>जायमानास्तु पूर्वे वै पश्चिमानां गृहेषु ते।<br>पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेष्विह॥ १०१<br>एवमावर्तमानास्ते वर्तन्त्याभूतसम्प्लवम्।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमेधिनाम्॥ १०२<br>सवितुर्दक्षिणं मार्गमाश्रित्याभूतसम्प्लवम्।<br>क्रियावतां प्रसङ्ख्यैषा ये श्मशानानि भेजिरे॥ १०३<br>लोकसंव्यवहारार्थं भूतारम्भकृतेन च।<br>इच्छाद्वेषरताच्चैव मैथुनोपगमाच्च वै॥ १०४<br>तथा कामकृतेनेह सेवनाद् विषयस्य च।<br>इत्येतैः कारणैः सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे॥ १०५ | लोकालोक पर्वतका जो उत्तरी शिखर है, वह अगस्त्यशिखर कहलाता है। देवर्षिगण उसका सेवन करते हैं। वह वैश्वानर-मार्गसे बाहर है और पितृयाण-मार्गके नामसे प्रसिद्ध है। उस पितृयाण-मार्गपर प्रजाभिलाषी अग्निहोत्री तथा लोगोंको संतान प्रदान करनेवाले ऋषिगण निवास करते हैं। राजन्! लौकिक कामनाओंसे युक्त वे ऋषिगण अपने आशीर्वादके प्रयोगसे प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मको सफल बनाते हैं। उनका मार्ग दक्षिणायनमें है। वे प्रत्येक युगमें अपनी उग्र तपस्या तथा धर्मशास्त्रकी मर्यादाद्वारा मर्यादासे स्खलित हुए धर्मकी पुनः स्थापना करते हैं। इनमें जो पहले उत्पन्न हुए थे, वे अपनेसे पीछे उत्पन्न होनेवालोंके घरोंमें जन्म लेते हैं और पीछे उत्पन्न होनेवाले मृत्युके पश्चात् पूर्वजोंके गृहोंमें चले जाते हैं। इस प्रकार वे प्रलयपर्यन्त आवागमनके चक्करमें पड़े रहते हैं। इन क्रियानिष्ठ गृहस्थ ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके दक्षिण मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। उन्हें श्मशानकी शरण लेनी पड़ती है अर्थात् ये मृत्युभागी होते हैं। लोक-व्यवहारकी रक्षाके लिये प्राणियोंद्वारा आरम्भ किये गये कर्मोंकी पूर्ति, इच्छा, द्वेषपरता, स्त्री-सहवास तथा स्वेच्छापूर्वक सांसारिक विषयभोगोंका सेवन—इन्हीं कारणोंसे उन ऋषियोंको इस लोकमें सिद्ध होते हुए भी श्मशानमें जाना पड़ता है ॥ ९७—१०५ ॥ | | प्रजैषिणः सप्तर्षयो द्वापरेष्विह जज्ञिरे।<br>संततिं ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युजितस्तु तैः॥ १०६<br>अष्टाशीतिसहस्राणि तेषामप्यूर्ध्वरेतसाम्।<br>उदक्पन्थानमाश्रित्य तिष्ठन्त्याभूतसम्प्लवम्॥ १०७ | द्वापरयुगमें प्रजाभिलाषी सात ऋषि इस मृत्युलोकमें उत्पन्न हुए थे, किंतु आगे चलकर उन्हें संततिसे घृणा हो गयी, जिससे उन्होंने मृत्युको जीत लिया। इन ऊर्ध्वरेता ऋषियोंकी संख्या अठासी हजार है। ये सूर्यके उत्तर मार्गका आश्रय लेकर प्रलयपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। |