भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३४* मत्स्यपुराण *
एवं गतिविशेषेण विभजन् रात्र्यहानि तु।<br>अजवीथ्यां दक्षिणायां लोकालोकस्य चोत्तरम्॥ ७९<br>लोकसंतानतो ह्येष वैश्वानरपथाद् बहिः।<br>व्युष्टिर्यावत्प्रभा सौरी पुष्करात् सम्प्रवर्तते॥ ८०<br>पार्श्वेभ्यो बाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वतः।<br>योजनानां सहस्राणि दशोर्ध्वं चोच्छ्रितो गिरिः॥ ८१<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च पर्वतः परिमण्डलः।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह॥ ८२<br>अभ्यन्तरे प्रकाशन्ते लोकालोकस्य वै गिरेः।<br>एतावानेव लोकस्तु निरालोकस्ततः परम्॥ ८३<br>लोक आलोकने धातुर्निरालोकस्त्वलोकता।<br>लोकालोकौ तु संधत्ते तस्मात्सूर्यः परिभ्रमन्॥ ८४<br>तस्मात् संध्येति तामाहुरुषाव्युष्ट्यर्थथान्तरम्।<br>उषा रात्रिः स्मृता विप्रैर्व्युष्टिश्चापि अहःस्मृतम्॥ ८५<br><br>त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दश पञ्च च।<br>ह्रासो वृद्धिरहर्भागैर्दिवसानां यथा तु वै॥ ८६<br>संध्यामुहूर्तमात्रायां ह्रासवृद्धी तु ते स्मृते।<br>लेखाप्रभृत्यथादित्ये त्रिमुहूर्तगते तु वै॥ ८७<br>प्रातः स्मृतस्ततः कालो भागांश्चाहुश्च पञ्च च।<br>तस्मात् प्रातर्गतात् कालान्मुहूर्ताः सङ्गवस्त्रयः॥ ८८<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु तस्मात् कालादनन्तरम्।<br>तस्मान्मध्यंदिनात् कालादपराह्न इति स्मृतः॥ ८९<br>त्रय एव मुहूर्तास्तु काल एष स्मृतो बुधैः।<br>अपराह्नव्यतीताच्च कालः सायं स उच्यते॥ ९०<br>दश पञ्च मुहूर्ताह्नो मुहूर्तास्त्रय एव च।<br>दश पञ्चमुहूर्त्तं वै अहस्तु विषुवे स्मृतम्॥ ९१<br>वर्धयतो ह्रसत्येव अयने दक्षिणोत्तरे।<br>अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिस्तु ग्रसते अहः॥ ९२इस प्रकार अपनी विशेष गतिसे रात-दिनका विभाजन करते हुए सूर्य दक्षिण दिशामें अजवीथीसे गुजरते हुए लोकालोक पर्वतकी उत्तर दिशामें पहुँचते हैं। वहाँसे लोक-संतानक और वैश्वानर नामक पर्वतोंके बाहरी मार्गसे चलते हुए वे पुष्करद्वीपपर पहुँचते हैं। वहाँ सूर्यकी प्रभातकालिकी प्रभा होती है। इस मार्गके पार्श्वभागमें लोकालोक पर्वत पड़ता है, जो दस हजार योजन ऊँचा है। यह पर्वत मण्डलाकार है और इसका एक भाग प्रकाशयुक्त एवं दूसरा भाग तिमिराच्छन्न रहता है। इस लोकालोक पर्वतके भीतर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारागणोंके साथ सभी ग्रह प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार जहाँतक प्रकाश होता है, उतनेको ही लोक माना गया है और शेष भाग निरालोक (तमसाच्छन्न) है। 'लोकृ' धातुका अर्थ दर्शन अर्थात् आलोकन है, इसलिये जो आलोक दृष्टिथसे दूर है, वह अनालोकता है। सूर्य परिभ्रमण करते हुए जिस समय लोकालोकपर्वत (प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशकी संधि)-पर पहुँचते हैं, उस समयको संध्या कहते हैं। उषःकाल और व्युष्टिमें अन्तर है। ब्राह्मणोंने उषःकालको रात्रिमें और व्युष्टिको दिनमें परिगणित किया है॥ ७७-८५॥<br><br>तीस कलाका एक मुहूर्त होता है और एक दिनमें पंद्रह मुहूर्त होते हैं। जिस प्रकार अहर्गणके हिसाबसे दिनोंकी ह्रास-वृद्धि होती है, उसी तरह संध्याके मुहूर्तमें भी ह्रास-वृद्धि माने गये हैं। तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे दिनके पाँच भाग माने गये हैं। सूर्योदय होनेके पश्चात् तीन मुहूर्ततकका काल प्रातःकाल कहा जाता है। उस प्रातःकालके व्यतीत होनेपर तीन मुहूर्ततकका समय संगवकाल कहलाता है। उस संगवकालके बाद तीन मुहूर्ततक मध्याह्न नामसे अभिहित होता है। उस मध्याह्नकालके बादका समय अपराह्न कहा जाता है। इसका भी समय विद्वानोंनें तीन मुहूर्त ही माना है। अपराह्नके बीत जानेके बादका काल सायं कहलाता है। इस प्रकार पंद्रह मुहूर्तोंका दिन तीन-तीन मुहूर्तोंके हिसाबसे पाँच भागोंमें विभक्त है। इसी प्रकार (रातमें भी १५ मुहूर्त होती है) दोनों विषुवोंमें (ठीक) पंद्रह मुहूर्तका दिन होता है—शरद् और वसन्त-ऋतुओंके मध्य (मेष-तुलासंक्रान्ति)-का समय विषुव कहलाता है, उत्तरायणमें दिन रात्रिको दक्षिणायनमें रात्रि दिनको