भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२० * मत्स्यपुराण *

| मन्दरः सैव विज्ञेयः सर्वधातुमयः शुभः।<br>मन्द इत्येष यो धातुरपामर्थे प्रकाशकः॥ ६१<br>अपां विदारणाच्चैव मन्दरः स निगद्यते।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ६२<br>प्रजापतिमुपादाय प्रजाभ्यो विदधत् स्वयम्।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः समुदाहृतः॥ ६३<br>इत्येते पर्वताः सप्त कुशद्वीपे प्रभाषिताः।<br>तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि सप्तैव तु विभागशः॥ ६४<br>कुमुदस्य स्मृतः श्वेत उन्नतश्चैव स स्मृतः।<br>उन्नतस्य तु विज्ञेयं वर्षं लोहितसंज्ञकम्॥ ६५<br>वेणुमण्डलकं चैव तथैव परिकीर्तितम्।<br>बलाहकस्य जीमूतः स्वैरथाकारमित्यपि॥ ६६<br>द्रोणस्य हरिकं नाम लवणं च पुनः स्मृतम्।<br>कङ्कस्यापि ककुन्नाम धृतिमच्चैव तत् स्मृतम्॥ ६७<br>महिषं महिषस्यापि पुनश्चापि प्रभाकरम्।<br>ककुद्मिनस्तु तद्वर्षं कपिलं नाम विश्रुतम्॥ ६८<br>एतान्यपि विशिष्टानि सप्त सप्त पृथक् पृथक्।<br>वर्षाणि पर्वताश्चैव नदीस्तेषु निबोधत॥ ६९<br>तत्रापि नद्यः सप्तैव प्रतिवर्षं हि ताः स्मृताः।<br>द्विनामवत्यस्ताः सर्वाः सर्वाः पुण्यजलाः स्मृताः॥ ७०<br>धूतपापा नदी नाम योनिश्चैव पुनः स्मृता।<br>सीता द्वितीया विज्ञेया सा चैव हि निशा स्मृता॥ ७१<br>पवित्रा तृतीया विज्ञेया वितृष्णापि च या पुनः।<br>चतुर्थी ह्रादिनीत्युक्ता चन्द्रभा इति च स्मृता॥ ७२<br>विद्युच्च पञ्चमी प्रोक्ता शुक्ला चैव विभाव्यते।<br>पुण्ड्रा षष्ठी तु विज्ञेया पुनश्चैव विभावरी॥ ७३<br>महती सप्तमी प्रोक्ता पुनश्चैषा धृतिः स्मृता।<br>अन्यास्ताभ्योऽपि संजाताः शतशोऽथ सहस्रशः॥ ७४<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः।<br>इत्येष संनिवेशो वः कुशद्वीपस्य वर्णितः॥ ७५<br>शाकद्वीपेन विस्तारः प्रोक्तस्तस्य सनातनः।<br>कुशद्वीपः समुद्रेण घृतमण्डोदकेन च॥ ७६ | सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त और अत्यन्त सुन्दर है। जो यह मंद धातु है, वह जलरूप अर्थको प्रकट करनेवाली है, अतः जलका विदारण करके निकलनेके कारण इस पर्वतको मन्दर कहा जाता है। उस पर्वतपर अनेकों प्रकारके रत्न पाये जाते हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं। साथ ही स्वयं इन्द्र वहाँकी प्रजाओंकी भी देख-भाल करते हैं। इनके अन्तर-विष्कम्भ पर्वत परिमाणमें दुगुने बतलाये जाते हैं। कुशद्वीपमें ये सात पर्वत कहे गये हैं। अब मैं इनके सात वर्षोंका विभागपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। कुमुद पर्वतके वर्षका नाम श्वेत है। इसे उन्नत नामसे भी पुकारते हैं। उन्नत पर्वतका लोहित नामक वर्ष जानना चाहिये। इसे वेणुमण्डलक भी कहते हैं। बलाहक पर्वतका वर्ष जीमूत है, इसीका नाम स्वैरथाकार भी है॥५४-६६॥<br>द्रोणपर्वतके वर्षका नाम हरिक है, इसे लवण भी कहते हैं। कङ्क पर्वतका वर्ष ककुद् है, इसे धृतिमान् भी कहा जाता है। महिष पर्वतके वर्षका नाम महिष है, इसे प्रभाकर नामसे अभिहित किया जाता है। ककुद्मी पर्वतका जो वर्ष है, वह कपिल नामसे विख्यात है। कुशद्वीपमें ये सातों विशिष्ट वर्ष तथा सात पर्वत पृथक्-पृथक् हैं। अब उन वर्षोंकी नदियोंको सुनिये। वहाँ प्रत्येक वर्षमें नदियाँ भी सात ही बतलायी जाती हैं। वे सभी दो नामोंवाली तथा पुण्यसलिला हैं। उनमें पहली नदीका नाम धूतपापा है, उसे योनि भी कहते हैं। दूसरी नदीको सीता नामसे जानना चाहिये। वही निशा भी कही जाती है। पवित्राको तीसरी नदी समझना चाहिये। उसीका नाम वितृष्णा भी है। चौथी ह्लादिनी नामसे पुकारी जाती है, यही चन्द्रमा नामसे भी प्रसिद्ध है। पाँचवीं नदीको विद्युत् कहते हैं, यही शुक्ला नामसे भी अभिहित होती है। पुण्ड्राको छठी नदी जानना चाहिये, इसको विभावरी भी कहते हैं। सातवीं नदीका नाम महती है, यही धृति नामसे भी कही जाती है। इनके अतिरिक्त अन्य भी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों नदियाँ हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें जाकर मिली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण करके इन्द्र यहाँ वर्षा करते हैं। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कुशद्वीपकी संस्थितिका वर्णन कर दिया तथा उसके शाकद्वीपसे दुगुने सनातन विस्तारको भी बतला दिया। यह महान् कुशद्वीप चारों ओरसे चन्द्रमाकी भाँति घृत और मट्ठेसे |