मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १२२ * ४१९
| वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सर्वतो धनधान्यवान्।<br>नित्यं पुष्पफलोपेतः सर्वरत्नसमावृतः॥ ४७<br>आवृतः पशुभिः सर्वैर्ग्राम्यारण्यैश्च सर्वशः।<br>आनुपूर्व्यात् समासेन कुशद्वीपं निबोधत॥ ४८<br>अथ तृतीयं वक्ष्यामि कुशद्वीपं च कृत्स्नशः।<br>कुशद्वीपेन क्षीरोदः सर्वतः परिवारितः॥ ४९<br>शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्वितः।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः॥ ५०<br>रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु।<br>द्विनामानश्च ते सर्वे शाकद्वीपे यथा तथा॥ ५१<br>प्रथमः सूर्यसंकाशः कुमुदो नाम पर्वतः।<br>विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः॥ ५२<br>सर्वधातुमयैः शृङ्गैः शिलाजालसमन्वितैः।<br>द्वितीयः पर्वतस्तत्र उन्नतो नाम विश्रुतः॥ ५३<br>हेमपर्वत इत्युक्तः स एव च महीधरः।<br>हरितालमयैः शृङ्गैर्द्वीपमावृत्य सर्वशः॥ ५४<br>बलाहकस्तृतीयस्तु भात्यञ्जनमयो गिरिः।<br>द्युतिमान् नामतः प्रोक्तः स एव च महीधरः॥ ५५<br>चतुर्थः पर्वतो द्रोणो यत्रौषध्यो महाबलाः।<br>विशल्यकरणी चैव मृतसंजीवनी तथा॥ ५६<br>पुष्यवान् नाम सैवोक्तः पर्वतः सुमहाचितः।<br>कङ्कस्तु पञ्चमस्तेषां पर्वतो नाम सारवान्॥ ५७<br>कुशेशय इति प्रोक्तः पुनः स पृथिवीधरः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतो दिव्यवीरुत्समन्वितः॥ ५८<br>षष्ठस्तु पर्वतस्तत्र महिषो मेघसंनिभः।<br>स एव तु पुनः प्रोक्तो हरिरित्यभिविश्रुतः॥ ५९<br>तस्मिन् सोऽग्निर्निवसति महिषो नाम योऽप्सुजः।<br>सप्तमः पर्वतस्तत्र ककुद्मान् स हि भाष्यते॥ ६० | वृक्षोंके समूह शोभायमान हो रहे हैं। वह धन-धान्यसे परिपूर्ण है। वह सदा पुष्पों और फलोंसे युक्त रहता है। उसमें सभी प्रकारके रत्न पाये जाते हैं। वह सर्वत्र ग्रामीण एवं जंगली पशुओंसे भरा हुआ है। उस कुशद्वीपका संक्षेपमें आनुपूर्वी वर्णन सुनिये। अब मैं तीसरे कुशद्वीपका समग्ररूपसे वर्णन कर रहा हूँ। कुशद्वीपसे क्षीरसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। यह शाकद्वीपके दुगुने विस्तारसे युक्त है। यहाँ भी रत्नोंकी खानोंसे युक्त सात पर्वत जानना चाहिये। यहाँकी नदियाँ भी रत्नोंकी भण्डार हैं। अब मुझसे उनका नाम सुनिये। जैसे शाकद्वीपमें सभी पर्वतों और नदियोंके दो नाम थे, वैसे ही यहाँके भी पर्वत एवं नदी दो नामवाली हैं। पहला सूर्यके समान चमकीला कुमुद नामक पर्वत है। वह पर्वत विद्रुमोच्चय नामसे भी कहा जाता है। वहाँ दूसरा पर्वत उन्नत नामसे विख्यात है। वह सम्पूर्ण धातुओंसे परिपूर्ण एवं शिला-समूहोंसे समन्वित शिखरोंसे युक्त है। वही पर्वत हेमपर्वत नामसे अभिहित होता है॥ ४५—५३ १/२ ॥<br><br>तीसरा बलाहक पर्वत है, जो अञ्जनके समान काला है। यह अपने हरितालमय शिखरोंसे सर्वत्र द्वीपको आवृत किये हुए है। यही पर्वत द्युतिमान् नामसे भी पुकारा जाता है। चौथा पर्वत द्रोण है। इस महान् गिरिपर विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी आदि महाबलवती ओषधियाँ पायी जाती हैं। वही महान् समृद्धिशाली पर्वत पुष्यवान् नामसे विख्यात है। उनमें पाँचवाँ कङ्क पर्वत है, जो सारयुक्त पदार्थोंसे सम्पन्न है। इस पर्वतको कुशेशय भी कहते हैं। वहाँ छठा महिष पर्वत है, जो मेघ-सदृश काला है। वह दिव्य पुष्पों एवं फलोंसे युक्त तथा दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न है। वही पुनः हरि नामसे विख्यात है। उस पर्वतपर महिष नामक अग्नि, जो जलसे उत्पन्न हुआ है, निवास करता है। वहाँ सातवें पर्वतको ककुद्मान् कहा जाता है। उसीको मन्दर जानना चाहिये। वह |