भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वेणुका चामृता चैव षष्ठी सम्परिकीर्तिता ।<br>सुकृता च गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता ॥ ३३<br>एताः सप्त महाभागाः प्रतिवर्षं शिवोदकाः ।<br>भावयन्ति जनं सर्वं शाकद्वीपनिवासिनम् ॥ ३४<br>अभिगच्छन्ति ताश्चान्या नदनद्यः सरांसि च ।<br>बहूदकपरिस्रावा यतो वर्षति वासवः ॥ ३५छठी गङ्गा वेणुका और अमृता नामसे प्रसिद्ध हैं। सातवीं गङ्गाको सुकृता और गभस्ती कहा जाता है। कल्याणमय जलसे परिपूर्ण एवं महान् भाग्यशालिनी ये सातों गङ्गाएँ शाकद्वीपके प्रत्येक वर्षके सभी प्राणियोंको पवित्र करती हैं। दूसरे बड़े-बड़े नद, नदियाँ और सरोवर भी इन्हीं गङ्गाकी धाराओंमें आकर मिलते हैं, जिसके कारण ये सभी अथाह जल बहानेवाली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ २६-३५॥
तासां तु नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।<br>न शक्यं परिसंख्यातुं पुण्यास्ताः सरिदुत्तमाः ॥ ३६<br>ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ।<br>एते शान्तमयाः प्रोक्ताः प्रमोदा ये च वै शिवाः ॥ ३७<br>आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाश्च नवैः सह ।<br>वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुताः ॥ ३८<br>आरोग्या बलिनश्चैव सर्वे मरणवर्जिताः ।<br>अवसर्पिणी न तेष्वस्ति तथैवोत्सर्पिणी पुनः ॥ ३९<br>न तत्रास्ति युगावस्था चतुर्युगकृता क्वचित् ।<br>त्रेतायुगसमः कालः सदा तत्र प्रवर्तते ॥ ४०<br>शाकद्वीपादिषु ज्ञेयं पञ्चस्वेतेषु सर्वशः ।<br>देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकः स्मृतः ॥ ४१<br>न तेषु सङ्करः कश्चिद् वर्णाश्रमकृतः क्वचित् ।<br>धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजाः ॥ ४२<br>न तेषु माया लोभो वा ईर्ष्यासूया भयं कुतः ।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति तद्वै स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ४३<br>कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः ।<br>स्वधर्मेण च धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ४४उन सहायक नदियोंके नाम और परिमाणकी गणना नहीं की जा सकती। ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पुण्यतोया हैं। इनके तटपर निवास करनेवाले जनपदवासी सदा हर्षपूर्वक इनका जल पीते हैं। उनके तटपर स्थित शान्तमय, प्रमोद, शिव, आनन्द, सुख, क्षेमक और नव—ये सात विश्व-विख्यात देश हैं। यहाँ वर्ण और आश्रमके धर्मोंका सुचारूरूपसे पालन होता है। यहाँके सभी निवासी नीरोग, बलवान् और मृत्युसे रहित होते हैं। उनमें अवसर्पिणी (अधोगामिनी) तथा उत्सर्पिणी (ऊर्ध्वगामिनी) क्रिया नहीं होती है। वहाँ कहीं भी चारों युगोंद्वारा की गयी युगव्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा त्रेतायुगके समान ही समय वर्तमान रहता है। शाकद्वीप आदि इन पाँचों द्वीपोंमें ऐसी ही दशा जाननी चाहिये; क्योंकि देशके विचारसे ही कालकी स्वाभाविक गति जानी जाती है। उन द्वीपोंमें कहीं भी वर्ण एवं आश्रमजन्य संकर नहीं पाया जाता। इस प्रकार धर्मका परित्याग न करनेके कारण वहाँकी प्रजा एकान्त सुखका अनुभव करती है। उनमें न तो माया (छल-कपट) है, न लोभ, तब भला ईर्ष्या, असूया और भय कैसे हो सकते हैं? उनमें धर्मका विपर्यय भी नहीं देखा जाता। धर्म तो उनके लिये स्वाभाविक कर्म माना गया है। उनपर कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वहाँ न तो दण्डका विधान है, न कोई दण्ड देनेवाला ही है। वहाँके निवासी धर्मके ज्ञाता हैं, अतः वे स्वधर्मानुसार परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते रहते हैं॥ ३६-४४॥
परिमण्डलस्तु सुमहान् द्वीपो वै कुशसंज्ञकः ।<br>नदीजलैः परिवृतः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः ॥ ४५<br>सर्वधातुविचित्रैश्च मणिविद्रुमभूषितैः ।<br>अन्यैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ ४६कुश नामक द्वीप अत्यन्त विशाल मण्डलवाला है। उसके चारों ओर नदियोंका जल प्रवाहित होता रहता है। वह बादल-सदृश रंगवाले, सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त होनेके कारण रंगे-बिरंगे तथा मणियों और मूँगोंसे विभूषित पर्वतोंद्वारा घिरा हुआ है। उसमें चारों ओर विभिन्न आकारवाले रमणीय जनपद तथा फूल-फलोंसे लदे हुए