मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| * अध्याय १२२ * | ४१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः।<br>सैवेह केशवत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च॥ १८ | कारण इसे विभ्राज कहते हैं। इसीको 'केशव' भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है॥ ११–१८॥ |
| तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः॥ १९<br>द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा।<br>उदयस्योदयं वर्षं जलधारेति विश्रुतम्॥ २०<br>नाम्ना गतभयं नाम वर्षं तत् प्रथमं स्मृतम्।<br>द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम्॥ २१<br>तदेव शैशिरं नाम वर्षं तत् परिकीर्तितम्।<br>नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम्॥ २२<br>श्यामपर्वतवर्षं तदनीचक्रमिति स्मृतम्।<br>आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्॥ २३<br>सोमकस्य शुभं वर्षं विज्ञेयं कुसुमोत्करम्।<br>तदेवासितमित्युक्तं वर्षं सोमकसंज्ञितम्॥ २४<br>आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्।<br>तदेव ध्रुवमित्युक्तं वर्षं विभ्राजसंज्ञितम्॥ २५ | द्विजवरो ! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षोंका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोंके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिये। उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं। (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विभ्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है॥ १९–२५॥ |
| द्वीपस्य परिणाहं च ह्रस्वदीर्घत्वमेव च।<br>जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये वनस्पतिम्॥ २६<br>शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः।<br>एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः॥ २७<br>विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः॥ २८<br>तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः।<br>द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधाः स्मृताः॥ २९ | शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूद्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोंमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं। इनमें प्रत्येक वर्षमें समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं। |
| प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिवजला शुभा।<br>अनुप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता॥ ३०<br>सुकुमारी तपःसिद्धा द्वितीया नामतः सती।<br>नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता॥ ३१<br>शिबिका च चतुर्थी स्याद् द्विविधा च पुनः स्मृता।<br>इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः॥ ३२ | मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है। इक्षुको पाँचवीं गङ्गा समझना चाहिये। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं। |