भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १२१ * ४१३
पाञ्चालान् कौशिकान् मत्स्यान् मागधाङ्गांस्तथैव च।<br>सुह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च ताम्रलिप्तांस्तथैव च॥ ५०<br>एताञ्जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा।<br>ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ५१उत्तरसुह्म, वङ्ग और ताम्रलिप्त—इन आर्य देशोंको पवित्र करती हैं। इस प्रकार वे (हिमालयसे निकलकर) विन्ध्यपर्वतसे अवरुद्ध होकर पूर्वकी ओर आगे बढ़ती हुई दक्षिणसमुद्रमें मिल गयी हैं॥ ३९–५१॥
ततस्तु ह्लादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखी ययौ।<br>प्लावयन्त्युपकांश्चैव निषादानपि सर्वशः॥ ५२<br>धीवरानृषिकांश्चैव तथा नीलमुखानपि।<br>केकरानेककर्णांश्च किरातानपि चैव हि॥ ५३<br>कालञ्जरान् विकर्णांश्च कुशिकान् स्वर्गभौमकान्।<br>सा मण्डले समुद्रस्य तीरे भूत्वा तु सर्वशः॥ ५४<br>ततस्तु नलिनी चापि प्राचीमेव दिशं ययौ।<br>कुपथान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि॥ ५५<br>तथा खरपथान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि।<br>मध्येनोजानकमरून् कुथप्रावरणान् ययौ॥ ५६<br>इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम्।<br>ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशां जवेन तु॥ ५७<br>तोमरान् प्लावयन्ती च हंसमार्गान् समूहकान्।<br>पूर्वान् देशांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधा गिरिम्।<br>कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि॥ ५८<br>सिक्त्वा पर्वतमेरुं सा गत्वा विद्याधरानपि।<br>शैमिमण्डलकोष्ठं तु सा प्रविष्टा महत्सरः॥ ५९<br>तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः॥ ६०इसी प्रकार पुण्यतोया ह्लादिनी, जो पूर्वाभिमुखी प्रवाहित होती है, उपका, निषाद, धीवर, ऋषिक, नीलमुख, केकर, अनेककर्ण, किरात, कालेंजर, विकर्ण, कुशिक और स्वर्गभौमक—इन सभी देशोंको सींचती हुई समुद्रमण्डलके तटपर पहुँचकर उसमें लीन हो गयी है।<br><br>नलिनी नदी भी बिन्दुसरसे निकलकर पूर्व दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। वह कुपथ, इन्द्रद्युम्नसर, खरपथ, वेत्र (ट) द्वीप, शङ्कुपथ आदि प्रदेशोंको सींचती हुई उज्जानक (जूनागढ़) मरुके मध्यभागसे बहती हुई कुथप्रावरणकी ओर चली गयी है तथा इन्द्रद्वीपके निकट लवणसागरमें मिल गयी है। उसी (मूल) सरोवरसे पावनी नदी बड़े वेगसे पूर्व दिशाकी ओर बहती है। वह तोमर, हंसमार्ग और समूहक देशोंको सींचती हुई पूर्वी देशोंमें जा पहुँचती है। वहाँ अनेकों प्रकारसे पर्वतको विदीर्ण करके कर्णप्रावरणमें पहुँचकर अश्वमुख देशमें चली जाती है। इसके बाद मेरु पर्वतको सींचती हुई विद्याधरोंके लोकोंमें जाकर शैमिमण्डलकोष्ठ नामक महान् सरोवरमें प्रवेश कर जाती है। इनकी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों सहायक नदियाँ भी हैं, जो पृथक्-पृथक् इन्हींमें आकर मिली हैं। इन्हींके जलको ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ ५२–६०॥
तीरे वंशौकसारायाः सुरभिर्नाम तद् वनम्।<br>हिरण्यशृङ्गो वसति विद्वान् कौबेरको वशी॥ ६१<br>यज्ञादपेतः सुमहान्मितौजाः सुविक्रमः।<br>तत्रागस्त्यैः परिवृता विद्वद्भिर्ब्रह्मराक्षसैः॥ ६२<br>कुबेरानुचरा ह्येते चत्वारस्तत्समाशिताः।<br>एवमेव तु विज्ञेया सिद्धिः पर्वतवासिनाम्॥ ६३वंशौकसाराके तटपर सुरभि नामक वह वन है, जिसमें जितेन्द्रिय एवं विद्वान् हिरण्यशृङ्ग निवास करता है। वह कुबेरका अनुचर, यज्ञसे विमुख, अमित तेजस्वी एवं परम पराक्रमी है। वहीं अगस्त्यगोत्रीय विद्वान् ब्रह्मराक्षसोंका भी निवासस्थान है। (उनकी संख्या चार है।) वे चारों कुबेरके अनुचर हैं, जो उसी हिरण्यशृङ्गके आश्रममें रहते हैं। इसी प्रकार पर्वतनिवासियोंकी सिद्धि समझनी चाहिये।