भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 1098 में से

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४१२ * मत्स्यपुराण *


| अनेन तोषितश्चाहं नद्यर्थे पूर्वमेव तु।<br>बुद्ध्वास्य वरदानं तु ततः कोपं न्ययच्छत॥ ३६<br><br>ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा यदुक्तं धारयन् नदीम्।<br>ततो विसर्जयामास संरुद्धां स्वेन तेजसा॥ ३७<br><br>नदीं भगीरथस्यार्थे तपसोग्रेण तोषितः।<br>ततो विसर्जयामास सप्त स्रोतांसि गङ्गया॥ ३८ | उन क्षीणकाय नरेशको देखकर शङ्करजी विचारमें पड़ गये कि इसने तो पहले ही इस नदीको भूतलपर लानेके लिये तपस्याद्वारा मुझे संतुष्ट कर लिया है। फिर अपने द्वारा राजाको दिये गये वरदानको यादकर उन्होंने अपने क्रोधको रोक लिया। तत्पश्चात् गङ्गा नदीको धारण करते समय ब्रह्माद्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर तथा भगीरथकी उग्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने अपने तेजसे रोकी हुई गङ्गा नदीको छोड़ दिया। इसके बाद गङ्गा सात धाराओंमें विभक्त होकर प्रवाहित हुई॥ ३०—३८॥ | | त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं त्रीण्यथैव तु।<br>स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा॥ ३९<br><br>नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः।<br>सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च तिस्त्रस्ता वै प्रतीच्यगाः॥ ४०<br><br>सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम्।<br>तस्माद् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४१<br><br>सप्त चैताः प्लावयन्ति वर्षं तु हिमसाह्वयम्।<br>प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा बिन्दुसरोद्भवाः॥ ४२<br><br>तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्वशः।<br>सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् बर्बरान् यवनान् खसान्॥ ४३<br><br>पुलिन्दांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलौक्यान् वरांश्च यान्।<br>कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४४ | त्रिपथगा गङ्गाकी तीन धाराएँ पूर्वाभिमुखी तथा तीन पश्चिमाभिमुखी प्रवाहित हुई (और सातवीं धारा स्वयं भागीरथी गङ्गा थीं)। इस प्रकार वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। उनमें पूर्व दिशामें बहनेवाली धाराओंका नाम नलिनी, ह्लादिनी और पावनी है तथा पश्चिम दिशामें प्रवाहित होनेवाली तीनों धाराएँ सीता, चक्षु और सिंधु नामसे कही गयी हैं। उनमें सातवीं धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर चली और दक्षिणसागरमें प्रविष्ट हो गयी, इसी कारण वह भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। ये ही सातों धाराएँ हिमवर्षको आप्लावित करती हैं। इस प्रकार ये सातों नदियाँ बिन्दुसरसे निकली हुई हैं। ये सब ओरसे उन म्लेच्छप्राय देशोंको सींचती हैं, जो पर्वतीय कुकुर, रौध्र, बर्बर, यवन, खस, पुलिन्द, कुलत्थ, अङ्गलौक्य और वर नामसे कहे जाते हैं। इस प्रकार गङ्गा हिमवान्‌को दो भागोंमें विभक्त कर दक्षिणसमुद्रमें प्रवेश कर गयी हैं। | | अथ वीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैव शूलिकान्।<br>तुषारान् बर्बरान् कारान् पह्लवान् पारदाञ्छकान्॥ ४५<br><br>एताञ्जनपदांश्चक्षुः प्लावयित्वोदधिं गता।<br>दरदोर्जगुडांश्चैव गान्धारानौरसान् कुहून्॥ ४६<br><br>शिवपौरानिन्द्रमरून् वसतीन् समतेजसम्।<br>सैन्धवानुर्वशांन् बर्बान् कुपथान् भीमरोमकान्॥ ४७<br><br>शुनामुखांश्चोर्दमरून् सिन्धुरेतान् निषेवते।<br>गन्धर्वान् किंनरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान्॥ ४८<br><br>कलापग्रामकांश्चैव तथा किम्पुरुषान् नरान्।<br>किरातांश्च पुलिन्दांश्च कुरून् वै भारतानपि॥ ४९ | इसके बाद चक्षु (वंक्षु) नदी वीरमरु, कालिक, शूलिक, तुषार, बर्बर, कार, पह्लव, पारद और शक—इन देशोंको आप्लावित कर समुद्रमें मिल गयी है। सिन्धु नदी दरद, उर्जगुड, गान्धार, औरस, कुहू, शिवपौर, इन्द्रमरु, वसति, सैन्धव, उर्वश, वर्ब, कुपथ, भीमरोभक, शुनामुख और उर्दमरु—इन देशोंकी सेवा करती अर्थात् इन देशोंमें बहती है। मङ्गलमयी गङ्गा गन्धर्व, किंनर, यक्ष, राक्षस, विद्याधर, नाग, कलापग्रामवासी जन, किम्पुरुष, किरात, पुलिन्द, कुरु, भारत, पाञ्चाल, कौशिक मत्स्य (विराट), मगध, अङ्ग, |

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