मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १२१ * । ४११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा।<br>सा चक्षुषी तयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम्॥ २३<br>अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वौषधो गिरिः।<br>गौरं तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति॥ २४<br>हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं सरः काञ्चनवालुकम्॥ २५<br>रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः।<br>गङ्गार्थे स तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः॥ २६<br>दिवं यास्यन्तु मे पूर्वे गङ्गातोयाप्लुतास्थिकाः।<br>तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता॥ २७<br>सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते।<br>यूपा मणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मयाः॥ २८<br>तत्रेष्ट्वा क्रतुभिः सिद्धः शक्रः सुरगणैः सह।<br>दिव्यश्छायापथस्तत्र नक्षत्राणां तु मण्डलम्॥ २९<br>दृश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा।<br>अन्तरिक्षं दिवं चैव भावयित्वा भुवं गता॥ ३०<br>भवोत्तमाङ्गे पतिता संरुद्धा योगमायया।<br>तस्या ये बिन्दवः केचित्क्रुद्धायाः पतिता भुवि॥ ३१<br>कृतं तु तैर्बहुसरस्ततो बिन्दुसरः स्मृतम्।<br>ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहसा रुषा॥ ३२<br>ज्ञात्वा तस्या ह्यभिप्रायं क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>भित्त्वा विशामि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्॥ ३३<br>अथावलेपं तं ज्ञात्वा तस्याः क्रुद्धस्तु शङ्करः।<br>तिरोभावयितुं बुद्धिरासीदङ्गेषु तां नदीम्॥ ३४<br>एतस्मिन्नेव काले तु दृष्ट्वा राजानमग्रतः।<br>धमनीसंततं क्षीणं क्षुधाव्याकुलितेन्द्रियम्॥ ३५ | भी कहते हैं। वह उन दोनों पर्वतोंके बीचसे बहती हुई पश्चिम-सागरमें जा मिली है। कैलासकी उत्तर दिशामें हिरण्यशृङ्ग नामका अत्यन्त विशाल पर्वत है, जो हरितालसे परिपूर्ण पर्वतश्रेष्ठ गौरतक फैला हुआ है। इस कल्याणकारी पर्वतपर दिव्य ओषधियाँ प्राप्त होती हैं। इसके पादप्रान्तमें बिन्दुसर नामक अत्यन्त रमणीय दिव्य सरोवर है, जो सुवर्णके समान बालुकासे युक्त है। यहींपर राजर्षि भगीरथने 'मेरे पूर्वज गङ्गाजलसे हड्डियोंके अभिषिक्त हो जानेपर स्वर्गलोकको चले जायँ, इस भावनासे भावित होकर गङ्गाको भूतलपर लानेके लिये बहुत वर्षोंतक (तप करते हुए) निवास किया था। इसलिये त्रिपथगा* गङ्गादेवी सर्वप्रथम वहीं प्रतिष्ठित हुई थीं और सोम पर्वतके पादसे निकलकर सात भागोंमें विभक्त हो गयीं। उस सरोवरके तटपर अनेकों मणिमय यज्ञस्तम्भ तथा स्वर्णमय विमान शोभा पा रहे थे। वहाँ देवताओंके साथ इन्द्रने यज्ञोंका अनुष्ठान कर सिद्धि लाभ किया था। वहाँ दिव्य छायापथ तथा नक्षत्रोंका मण्डल विद्यमान है। वहाँ त्रिपथगा गङ्गादेवी रातमें चमकती हुई दीख पड़ती हैं॥ १९—२९ १/२ ॥<br><br>गङ्गादेवी स्वर्गलोक और अन्तरिक्षलोकको पवित्र कर भूतलपर आयीं और वे शिवजीके मस्तकपर गिरीं। तब शिवजीने अपनी योगमायाके बलसे उन्हें वहीं रोक दिया। (इससे गङ्गादेवी क्रुद्ध हो गयीं।) उस समय उन कुपित हुई गङ्गादेवीकी जो कुछ बूँदें पृथ्वीपर गिरीं, उनसे 'बहुसर' नामक एक सरोवर बन गया, वही आगे चलकर 'बिन्दुसर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस समय शिवजीके सहसा रोक लिये जानेपर गङ्गादेवी क्रुद्ध होकर ऐसा विचार करने लगीं कि मैं अपनी धाराके साथ शङ्करको बहाती हुई पृथ्वीको फोड़कर पातालमें प्रवेश कर जाऊँगी। जब शङ्करजीको गङ्गाकी यह कुचेष्टा और क्रूर अभिप्राय ज्ञात हुआ, तब वे उसे गङ्गाका अभिमान समझकर क्रुद्ध हो गये और उस नदी-रूपिणी गङ्गाको अपने अङ्गोंमें ही लीन कर लेनेका विचार करने लगे; परंतु ठीक इसी समय राजा भगीरथ, जिनकी इन्द्रियाँ भूखसे व्याकुल हो गयी थीं तथा जिनके शरीरमें नसेंमात्र दीख रही थीं, शिवजीके सम्मुख आ गये। |
* वाल्मी० रामायण (१। ४४। ६)-के अनुसार गङ्गा भू, पाताल, स्वर्ग—इन तीन पथों—मार्गोंको भावित—पवित्र करनेके कारण 'त्रिपथगा' कही जाती हैं—'त्रीन् पथो भावयतीति तस्मात्त्रिपथगा स्मृता।'