मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मनःशिलामयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति।<br>लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान्॥ ११<br><br>तस्य पादे महद् दिव्यं लोहितं सुमहत्सरः।<br>तस्मात् प्रभवते पुण्यो लौहित्यश्च नदो महान्॥ १२<br><br>दिव्यारण्यं विशोकं च तस्य तीरे महद् वनम्।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षो मणिधरो वशी॥ १३<br><br>सौम्यैः सुधार्मिकैश्चैव गुह्यकैः परिवारितः।<br>कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधिगिरिः॥ १४<br><br>ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः।<br>तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥ १५<br><br>सर्वधातुमयस्तत्र सुमहान् वैद्युतो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम्॥ १६<br><br>तस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी।<br>यस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नाम विश्रुतम्॥ १७<br><br>कुवेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो वशी।<br>ब्रह्मधाता निवसति राक्षसोऽनन्तविक्रमः॥ १८<br><br>कैलासात् पश्चिमामाशां दिव्यः सर्वौषधिगिरिः।<br>वरुणः पर्वतश्रेष्ठो रूक्मधातुविभूषितः॥ १९<br><br>भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हैमसंनिभः।<br>शातकौम्भमयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः॥ २०<br><br>शतसंख्यैस्तापनीयैः शृङ्गैर्दिवमिवोल्लिखन्।<br>शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गः शैलो महाचितः॥ २१<br><br>तस्मिन् गिरौ निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः।<br>तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥ २२ | फैला हुआ है। उसकी कान्ति सूर्यके समान है। वह मङ्गलप्रद पर्वत सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा मैनशिल नामक धातुसे परिपूर्ण है। उसके पाद-प्रान्तमें एक विशाल दिव्य सरोवर है, जिसका नाम लोहित है। वह पुण्यमय लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नामक महान् नदका उद्गमस्थान है। उस नदके तटपर विशोक नामक एक दिव्य एवं विस्तृत वन है। उस पर्वतपर मणिधर नामक यक्ष इन्द्रियोंको वशमें करके परम धार्मिक एवं सौम्य-स्वभाववाले गुह्यकोंके साथ निवास करता है। कैलासकी पश्चिमोत्तर दिशामें ककुद्मान् नामक पर्वत है, जिसपर सभी प्रकारकी ओषधियाँ सुलभ हैं। वह अञ्जन-जैसा काला तथा तीन शिखरोंसे सुशोभित है। उस ककुद्मान् पर्वतपर भगवान् रुद्रके गण ककुद्मी (नन्दिकेश्वर)-की उत्पत्ति हुई है। वहीं समस्त धातुओंसे सम्पन्न वैद्युत नामक अत्यन्त महान् पर्वत है, जो त्रिककुद् पर्वततक विस्तृत है। उसके पाद-प्रान्तमें सिद्धोंद्वारा सेवित एक महान् दिव्य मानस सरोवर है। उस सरोवरसे लोकपावनी पुण्य-सलिला सरयू* निकली हुई हैं, जिनके तटपर (वरुणका) वैभ्राज नामक सुप्रसिद्ध दिव्य वन है। उस वनमें प्रहेतिका पुत्र ब्रह्मधाता नामक राक्षस निवास करता है। वह जितेन्द्रिय, अनन्तपराक्रमी और कुबेरका अनुचर है॥ १०—१८॥<br><br>कैलासकी पश्चिम दिशामें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न वरुण नामक दिव्य पर्वत है। वह पर्वतश्रेष्ठ सुवर्ण आदि धातुओंसे विभूषित, भगवान् शंकरका प्रियपात्र, शोभाशाली, स्वर्णसदृश चमकीला और स्वर्णमयी दिव्य शिलाओंसे सम्पन्न है। वह अपने स्वर्णसरीखे चमकदार सैकड़ों शिखरोंसे आकाशको छूता हुआ-सा दीख पड़ता है। वहीं शृङ्गवान् नामका एक महान् दिव्य पर्वत है, जो समृद्धिशाली एवं दुर्गम है। उस पर्वतपर धूम्रलोचन भगवान् शिव निवास करते हैं। उस पर्वतके पाद-प्रान्तमें शैलोद नामक सरोवर है। उसीसे मङ्गलमयी पुण्यतोया शैलोदका नामकी नदी प्रवाहित होती है। उसे चक्षुषी |
* इस अध्यायका हिमालयसे सम्बद्ध भौगोलिक विवरण बड़े महत्त्वका है और यह वर्णन बहुत कुछ कालिकापुराणसे मिलता है।