मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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* अध्याय १२१ * ४०९
एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय
कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br><br>तस्याश्रमस्योत्तरतस्त्रिपुरारिनिषेवितः ।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः कल्पद्रुमसमन्वितैः ॥ १<br><br>मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः ।<br>तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः ॥ २<br><br>अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः ।<br>कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् ॥ ३<br><br>मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसंनिभम् ।<br>तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ ४<br><br>दिव्यं च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम् ।<br>प्रागुत्तरेण कैलासाद् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ॥ ५<br><br>सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति ।<br>चन्द्रप्रभो नाम गिरिः यः शुभ्रो रत्नसंनिभः ॥ ६<br><br>तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम् ।<br>तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ७<br><br>तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्ररथं शुभम् ।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति मणिभद्रः सहानुगः ॥ ८<br><br>यक्षसेनापतिः शूरो गुह्यकैः परिवारितः ।<br>पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! उस आश्रमकी उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतके पृष्ठ-भागके मध्यमें कैलास नामक पर्वत स्थित है। उसपर त्रिपुरासुरके संहारक शंकरजी निवास करते हैं। उसके शिखर नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं तथा उनपर कल्पवृक्ष शोभा पा रहे हैं। उस पर्वतपर श्रीमान् कुबेर गुह्यकोंके साथ निवास करते हैं। इस प्रकार अलकापुरीके अधीश्वर राजा कुबेर अप्सराओंद्वारा अनुगमन किये जाते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। कैलासके पाद (उपत्यका)-से एक मन्दोदक नामक सरोवर प्रकट हुआ है, जिसका जल बड़ा पवित्र, निर्मल एवं शीतल है। उसका जल दहीके समान उज्ज्वल है। उसी सरोवरसे मङ्गलमयी दिव्य मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती है। वहाँ उस नदीके तटपर नन्दन नामक दिव्य एवं महान् वन है। कैलासकी पूर्वोत्तर दिशामें चन्द्रप्रभ नामक पर्वत है, जो रत्न-सदृश चमकदार है। वह सभी प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा अनेकों प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित दिव्य सुबेल पर्वततक फैला हुआ है। उसके निकट अच्छोद (अच्छावत) नामसे विख्यात एक दिव्य सरोवर है, उससे अच्छोदिका (अच्छोदा) नामकी कल्याणमयी दिव्य नदी उद्भूत हुई है। उस नदीके तटपर चैत्ररथ नामक दिव्य एवं सुन्दर महान् वन है। उस पर्वतपर शूरवीर यक्ष-सेनापति मणिभद्र गुह्यकोंसे घिरे हुए अपने अनुयायियोंके साथ निवास करते हैं। पुण्यमयी मन्दाकिनी तथा कल्याणकारिणी अच्छोदा—ये दोनों नदियाँ पृथ्वी-मण्डलके मध्यभागसे प्रवाहित होती हुई महासागरमें मिली हैं॥ १—९ १/२ ॥ |
| महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टा सा महोदधिम् ।<br>कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वौषधिं गिरिम् ॥ १० | कैलासके दक्षिण-पूर्व दिशामें लाल वर्णवाला हेमशृङ्ग नामक एक विशाल पर्वत है। वह दिव्य सुवेल पर्वततक |