मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२० * | ४०७ |
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| क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः।<br>मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥ २३<br>काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।<br>शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ॥ २४<br>काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।<br>कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना॥ २५ | जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा॥ ९—२५॥ |
| वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते ।<br>काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥ २६<br>पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।<br>काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७<br>काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।<br>पीत्वा पप्रच्छ रमणं क्व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८<br>त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।<br>तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव व्रीडिता भृशम्॥ २९<br>काचित् कान्तार्पितं सुभ्रूः कान्तपीतावशेषितम्।<br>सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥ ३०<br>आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।<br>शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम्॥ ३१<br>प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम्।<br>राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२<br>याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।<br>आवसन् संयुताः कान्तैः परर्द्धिरचितां गुहाम्॥ ३३<br>नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।<br>नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥ ३४<br>एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।<br>तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५<br>तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम॥ ३६<br>वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काङ्क्षितान् वरान्।<br>तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥ ३७ | राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थीं, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोलीं—'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये'॥ २६—३७॥ |
| राजोवाच<br>अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।<br>वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्॥ ३८ | राजाने कहा— गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह |