भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०६* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।<br>कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥ ८होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूँथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥१—८॥
अस्त्यस्मिन् गहने कुञ्जे विशिष्टकुसुमा लता।<br>काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिरंसुना ॥ ९कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही
कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।<br>सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम् ॥ १०थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ
काश्चित् पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक् पृथक्।<br>क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः ॥ ११गन्धर्वोंके साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई
काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।<br>ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥ १२सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे
कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।<br>अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ १३उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके
कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना ।<br>केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥ १४ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय
स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।<br>छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः ॥ १५वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल-
स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।<br>रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम् ॥ १६पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर
जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनां शुचिस्मिता।<br>धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम् ॥ १७प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके
कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।<br>त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम् ॥ १८धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट
काचिद्दुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।<br>सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९
काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।<br>शिलातलगता भर्त्रा दृष्टा कामार्तचक्षुषा ॥ २०
कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।<br>रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम् ॥ २१
सुस्रातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।<br>पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२
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