भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 415
* अध्याय १२० *४०५

| एवं स राजा तपसि प्रसक्तः<br>सम्पूजयन् देववरं सदैव।<br>तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्<br>स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५॥ | था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥ ३८–४५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९॥


एक सौ बीसवाँ* अध्याय

राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति

| सूत उवाच<br><br>स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः।<br>क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह॥ १<br><br>कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः।<br>अर्घ्यं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥ २<br><br>पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।<br>चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति॥ ३<br><br>काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।<br>सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥ ४<br><br>काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहतैः।<br>मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥ ५<br><br>मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।<br>कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥ ६<br><br>काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।<br>कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोंके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूँथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोंको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था; तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूँककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूँथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित |


* इस अध्यायके अनेक शब्दालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १०। ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।

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