भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

* अध्याय १११ *

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुखोष्णं चैव तत् तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।<br>वैदूर्यस्य शिला मध्ये सरसस्तस्य शोभना ॥ १९<br><br>प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन् धनुःशते।<br>चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मितात्रिणा ॥ २०<br><br>बिलद्वारसमो देशो यत्र यत्र हिरण्मयः।<br>प्रदेशः स तु राजेन्द्र द्वीपे तस्मिन् मनोहरे ॥ २१उस सरोवरका जल कुछ गुनगुना गरम था, जो स्नान करनेसे ठण्डकको दूर कर देता था। उस सरोवरके मध्यमें वैदूर्यमणिकी एक सुन्दर शिला थी। राजन्! उस रमणीय शिलाको महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके प्रभावसे निर्मित किया था। वह आठ सौ हाथ (दो फर्लांग) विस्तृत एवं चौकोर थी। राजेन्द्र! उस मनोहर द्वीपमें सारा प्रदेश बिलद्वारके समान स्वर्णमय था॥१०—२१॥
तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजञ्शिलातले।<br>सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता ॥ २२<br><br>आकाशप्रतिमा राजंश्चतुरस्रा मनोहरा।<br>तस्यास्तदुदकं स्वादु लघु शीतं सुगन्धिकम् ॥ २३<br><br>न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिं नापूरयत्यपि।<br>तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम् ॥ २४<br><br>मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।<br>रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ २५<br><br>शशाङ्करश्मेः संकाशं प्रासादं रजतं हितम्।<br>रम्यवैदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारकम् ॥ २६<br><br>इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।<br>वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोंरमम् ॥ २७<br><br>प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः।<br>भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ॥ २८<br><br>जान्वाच्य कुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः।<br>फणीन्द्रसंनिविष्टोऽङ्घ्रिर्द्वितीयश्च तथानघ ॥ २९<br><br>लक्ष्म्युत्सङ्गतोऽङ्घ्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः।<br>फणीन्द्रभोगसंन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः ॥ ३०राजन्! उस शिलातलपर एक रमणीय पुष्करिणी (पोखरी) थी, जो चौकोर, मनोमोहिनी तथा आकाशके समान निर्मल थी। वह अत्यन्त शीतल एवं निर्मल जलसे परिपूर्ण तथा कमलोंसे सुशोभित थी। उसका वह जल सुस्वादु, पचनेमें हलका, शीतल और सुगन्धयुक्त था। वह जैसे गलेको कष्ट नहीं पहुँचाता था, उसी प्रकार कुक्षिको भी वायुसे परिपूर्ण नहीं करता था, अर्थात् वायुविकार नहीं उत्पन्न करता था, अपितु शरीरमें पहुँचकर परम तृप्ति उत्पन्न करता तथा महान् सुख पहुँचाता था। उस पुष्करिणी (बावली)-के मध्यभागमें महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके बलसे एक महलका निर्माण किया था। वह सुन्दर प्रासाद चाँदीका बना हुआ था, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमक रहा था। उसमें सभी प्रकारके रत्न जड़े गये थे तथा भीतर प्रवेश करनेके लिये सोनेकी सीढ़ियाँ बनी थीं, जिनमें रमणीय वैदूर्य एवं निर्मल मूँगे लगे हुए थे। उसमें इन्द्रनील मणिके विशाल खम्भे लगे थे। उसकी वेदिका अर्थात् फर्शपर मरकतमणि जड़ी हुई थी। हीरेकी किरणोंसे चमचमाता हुआ वह रमणीय महल देखते ही मनको लुभा लेता था। उस महलमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन (मूर्ति-रूपसे) सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित होकर शेषनागके फणोंपर शयन कर रहे थे। अनघ! देवाधिदेव चक्रधारी भगवान्‌का एक चरण घुटनेसे मुड़ा हुआ था और दूसरा चरण शेषनागके ऊपरसे होता हुआ लक्ष्मीकी गोदमें स्थित था। शेषनागके फणोंपर शयन करनेवाले भगवान्‌का बाजूबंदसे विभूषित एक हाथ शेषनागके फणोंपर स्थापित था ॥२२—३०॥
अङ्गुलीपष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरं भुजम्।<br>एकं वै देवदेवस्य द्वितीयं तु प्रसारितम् ॥ ३१उस हाथकी अङ्गुलियोंका पृष्ठभाग शेषके सिरपर रखा हुआ था। उनका दूसरा हाथ फैला हुआ था।