भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 48

३८ * मत्स्यपुराण *

| सूत उवाच<br>यदाभिषिक्तः सकलह्याधिराज्ये<br>पृथुर्धरित्र्यामधिपो बभूव।<br>तदौषधीनामधिपं चकार<br>यज्ञव्रतानां तपसां च चन्द्रम्॥ २<br>नक्षत्रताराद्विजवृक्षगुल्म-<br>लतावितानस्य च रुक्मगर्भः।<br>अपामधीशं वरुणं धनानां<br>राज्ञां प्रभुं वैश्रवणं च तद्वत्॥ ३<br>विष्णुं रवीणामधिपं वसूना-<br>मग्निं च लोकाधिपतिश्चकार।<br>प्रजापतीनामधिपं च दक्षं<br>चकार शक्रं मरुतामधीशम्॥ ४<br>दैत्याधिपानामथ दानवानां<br>प्रह्लादमीशं च यमं पितॄणाम्।<br>पिशाचरक्षःपशुभूतयक्ष-<br>वेतालराजं त्वथ शूलपाणिम्॥ ५<br>प्रालेयशैलं च पतिं गिरिणा-<br>मीशं समुद्रं ससरिन्नदानाम्।<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार॥ ६<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमादिदेश।<br>दिशां गजानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतं¹ नामधेयम्॥ ७<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार।<br>सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>प्लक्षं पुनः सर्ववनस्पतीनाम्॥ ८<br>पितामहः पूर्वमथाभ्यषिञ्च-<br>च्चैतान्पुनः सर्वदिशाधिनाथान्।<br>पूर्वेण दिक्पालमथाभ्यषिञ्च-<br>न्नाम्नासुधर्माणमरातिकेतुम् ॥ ९<br>ततोऽधिपं दक्षिणतश्चकार<br>सर्वेश्वरं शङ्खपदाभिधानम्।<br>सुकेतुमन्तं दिशि पश्चिमायां<br>चकार पश्चाद् भुवनाण्डगर्भः॥ १०॥ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! जब महाराज पृथु समस्त भूमण्डलके अधिनायक-पदपर अभिषिक्त होकर सबके अधिपति हुए, उस समय उन हिरण्यगर्भ ब्रह्माने चन्द्रमाको ओषधि, यज्ञ, व्रत, तप, नक्षत्र, तारा, द्विज, वृक्ष, गुल्म और लतासमूहका अध्यक्ष बनाया। उन्होंने वरुणको जलका, कुबेरको धन और राजाओंका,² विष्णुको आदित्योंका, अग्निको वसुओंका अधिपति बनाया। दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका, प्रह्लादको दैत्यों और दानवोंका, यमराजको पितरोंका, शूलपाणि शिवको पिशाच, राक्षस, पशु, भूत, यक्ष और वेतालोंका, हिमालयको पर्वतोंका, समुद्रको छोटी-बड़ी नदियोंका, चित्ररथको गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंका, प्रबल पराक्रमी वासुकिको नागोंका, तक्षकको, सर्पोंका, ऐरावत नामक गजेन्द्रको दिग्गजोंका, गरुड़को पक्षियोंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका, सिंहको वन्य जीवोंका, वृषभको गौओंका और पाकड़को समस्त वनस्पतियोंका अधिनायक नियुक्त किया। फिर ब्रह्माने सर्गारम्भके समय सम्पूर्ण दिशाओंके अधिनायकोंको भी अभिषिक्त किया। उन्होंने शत्रुओंके संहारक सुधर्माको पूर्व दिशाके दिक्पाल-पदपर स्थापित किया। इसके बाद सर्वेश्वर शङ्खपदको दक्षिण दिशाका स्वामी बनाया। सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें अन्तर्भूत करनेवाले ब्रह्माने सुकेतुमान्‌को पश्चिम दिशाका अध्यक्ष बनाया॥ २—१०॥ |


१. पाठान्तर — ऐरावण । २. इसीलिये वेदादिमें कुबेरको 'राजाधिराज वैश्रवण' कहा गया है।

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