भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 550

५४० * मत्स्यपुराण *


एक सौ छियालीसवाँ अध्याय

वज्राङ्गकी उत्पत्ति, उसके द्वारा इन्द्रका बन्धन, ब्रह्मा और कश्यपद्वारा समझाये जानेपर इन्द्रको बन्धनमुक्त करना, वज्राङ्गका विवाह, तप तथा ब्रह्माद्वारा वरदान

ऋषय ऊचुः<br>कथं मत्स्येन कथितस्तारकस्य वधो महान्।<br>कस्मिन् काले विनिर्वृत्ता कथेयं सूतनन्दन॥ १<br><br>त्वन्मुखक्षीरसिन्धूत्था कथेयममृतात्मिका।<br>कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिरस्माकं न प्रजायते।<br>इदं मुने समाख्याहि महाबुद्धे मनोगतम्॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतनन्दन! मत्स्यभगवान्‌ने तारकासुरके वधरूप महान् कार्यका वर्णन किस प्रकार किया था? यह कथा किस समय कही गयी थी? मुने! आपके मुखरूपी क्षीरसागरसे उद्भूत हुई इस अमृतरूपिणी कथाका दोनों कानोंद्वारा पान करते हुए भी हमलोगोंको तृप्ति नहीं हो रही है। अतः महाबुद्धिमान् सूतजी! आप हमलोगोंके इस मनोऽभिलषित विषयका वर्णन कीजिये॥ १-२॥
सूत उवाच<br>पृष्टस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>कथं शरवणे जातो देवः षड्वदनो विभो॥ ३<br><br>एतत्त वचनं श्रुत्वा पार्थिवस्यामितौजसः।<br>उवाच भगवान् प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम्॥ ४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (प्राचीन कालकी बात है) राजर्षि मनुने मत्स्यरूपधारी भगवान् विष्णुसे प्रश्न किया—'विभो! षडानन स्वामिकार्तिकका जन्म सरपतके वनमें कैसे हुआ था?' उन अमिततेजस्वी राजर्षि मनुका प्रश्न सुनकर महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र भगवान् मत्स्य प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ३-४॥
मत्स्य उवाच<br>वज्राङ्गो नाम दैत्योऽभूत् तस्य पुत्रस्तु तारकः।<br>सुरानुद्वासयामास पुरेभ्यः स महाबलः॥ ५<br><br>ततस्ते ब्रह्मणोऽभ्याशं जग्मुर्भयनिपीडिताः।<br>भीतांश्च त्रिदशान् दृष्ट्वा ब्रह्मा तेषामुवाच ह॥ ६<br><br>संत्यजध्वं भयं देवाः शंकरस्यात्मजः शिशुः।<br>तुहिनाचलदौहित्रस्तं हनिष्यति दानवम्॥ ७<br><br>ततः काले तु कस्मिंश्चिद् दृष्ट्वा वै शैलजां शिवः।<br>स्वरेतो वह्निवदने व्यसृजत् कारणान्तरे॥ ८<br><br>तत् प्राप्तं वह्निवदने रेतो देवानतर्पयत्।<br>विदार्य जठराण्येषामजीर्णं निर्गतं मुने॥ ९**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! (बहुत पहले) वज्राङ्ग नामका एक दैत्य उत्पन्न हुआ है, उसके पुत्रका नाम तारक था। उस महाबली तारकने देवताओंको उनके नगरोंसे निकालकर खदेड़ दिया। तब भयभीत हुए वे सभी देवगण ब्रह्माके निकट गये। उन देवताओंको डरा देखकर ब्रह्माने उनसे कहा—'देववृन्द! भय छोड़ दो। (शीघ्र ही) भगवान् शंकरके एक औरस पुत्र हिमाचलका दौहित्र (नाती) उत्पन्न होगा, जो उस दानवका वध करेगा।' तदनन्तर किसी समय पार्वतीको देखकर शिवजीका वीर्य स्खलित हो गया, तब उन्होंने उसे किसी भावी कारणवश अग्निके मुखमें गिरा दिया। अग्निके मुखमें पड़े हुए उस वीर्यने देवताओंको तृप्त कर दिया, किंतु पच न सकनेके कारण वह उनके उदरको फाड़कर बाहर निकल पड़ा
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