भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 551
* अध्याय १४६ *५४१

| पतितं तत् सरिद्वरां ततस्तु शरकानने।<br>तस्मात्तु स समुद्भूतो गुहो दिनकरप्रभः॥ १०<br><br>स सप्तदिवसो बालो निजघ्ने तारकासुरम्।<br>एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तमूचुर्ऋषिसत्तमाः॥ ११ | और नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गामें जा गिरा। फिर वहाँ वह बहते हुए सरपतके वनमें जा लगा। उसीसे सूर्यके समान तेजस्वी गुह उत्पन्न हुए। उसी सात दिवसीय बालकने तारकासुरका वध किया। ऐसी अद्भुत बात सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषियोंने पुनः सूतजीसे प्रश्न किया॥५—११॥ | | ऋषय ऊचुः<br>अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी।<br>विस्तरेण हि नो ब्रूहि याथातथ्येन शृण्वताम्॥ १२<br><br>वज्राङ्गो नाम दैत्येन्द्रः कस्य वंशोद्भवः पुरा।<br>यस्याभूत् तारकः पुत्रः सुरप्रमथनो बली॥ १३<br><br>निर्मितः को वधे चाभूत् तस्य दैत्येश्वरस्य तु।<br>गुहजन्म तु कार्त्स्न्येन अस्माकं ब्रूहि मानद॥ १४ | ऋषियोंने पूछा—सबको मान देनेवाले सूतजी! यह कथा तो अत्यन्त आश्चर्यसे परिपूर्ण, रमणीय और पापनाशिनी है। हमलोग इसे सुनना चाहते हैं, अतः आप हमलोगोंको इसे यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बतलाइये। पूर्वकालमें देवताओंका मान मर्दन करनेवाला महाबली तारक जिसका पुत्र था, वह दैत्यराज वज्राङ्ग किसके वंशमें उत्पन्न हुआ था? उस दैत्यराजके वधके लिये कौन-सा कारण निर्मित हुआ था? यह सब तथा गुहके जन्मकी कथा हमलोगोंको पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १२—१४॥ | | सूत उवाच<br>मानसो ब्रह्मणः पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः।<br>षष्टिं सोऽजनयत् कन्या वीरिण्यामेव नः श्रुतम्॥ १५<br><br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १६<br><br>द्वे वै बाहुकपुत्राय द्वे वै चाङ्गिरसे तथा।<br>द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुतः प्रभुः॥ १७<br><br>अदितिर्दितिर्दिनुर्विश्वा हारिष्टा सुरसा तथा।<br>सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा॥ १८<br><br>कद्रूर्मुनिश्श्व लोकस्य मातरो गोषु मातरः।<br>तासां सकाशाल्लोकानां जङ्गमस्थावरात्मनाम्॥ १९<br><br>जन्म नानाप्रकाराणां ताभ्योऽन्ये देहिनः स्मृताः।<br>देवेन्द्रोपेन्द्रपूषाद्याः सर्वे तेऽदितिजा मताः॥ २०<br><br>दितेः सकाशाल्लोकास्तु हिरण्यकशिपादयाः।<br>दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः॥ २१ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ब्रह्माके मानस पुत्र प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न की थीं, ऐसा हमने सुना है। उन ब्रह्मपुत्र सामर्थ्यशाली दक्षने उन कन्याओंमेंसे दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बाहुक-पुत्रको, दो अङ्गिराको तथा दो विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दी थीं। अदिति, दिति, दनु, विश्वा, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि—ये तेरह लोकमाताएँ कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन्हींसे पशुओंकी भी उत्पत्ति हुई है। इन्हींसे स्थावर-जङ्गमस्वरूप नाना प्रकारके प्राणियोंका जन्म हुआ है। देवेन्द्र, उपेन्द्र और सूर्य आदि सभी देवता अदितिसे उत्पन्न माने जाते हैं। दितिके गर्भसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण उत्पन्न हुए। दनुके दानव |