भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४२ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
पक्षिणो विनतापुत्रा गरुडप्रमुखाः स्मृताः।<br>नागाः कद्रूसुता ज्ञेयाः शेषाश्चान्येऽपि जन्तवः ॥ २२<br><br>त्रैलोक्यनाथं शक्रं तु सर्वामरगणप्रभुम्।<br>हिरण्यकशिपुश्चक्रे जित्वा राज्यं महाबलः ॥ २३<br><br>ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः।<br>निहता विष्णुना संख्ये शेषाश्चेन्द्रेण दानवाः ॥ २४<br><br>ततो निहतपुत्राभूत् दितिर्वरमयाचत।<br>भर्तारं कश्यपं देवं पुत्रमन्यं महाबलम् ॥ २५<br><br>समरे शक्रहन्तारं स तस्या अददात् प्रभुः ॥ २६<br><br>नियमे वर्त हे देवि सहस्रं शुचिमानसा।<br>वर्षाणां लप्स्यसे पुत्रमित्युक्ता सा तथाकरोत् ॥ २७<br><br>वर्तन्त्या नियमे तस्याः सहस्त्राक्षः समाहितः।<br>उपासामाचरत् तस्याः सा चैनमन्वमन्यत ॥ २८<br><br>दशवत्सरशेषस्य सहस्रस्य तदा दितिः।<br>उवाच शक्रं सुप्रीता वरदा तपसि स्थिता ॥ २९और गौ आदि पशु सुरभीके संतान हुए। गरुड आदि पक्षी विनताके पुत्र कहे जाते हैं। नागों तथा अन्य रेंगनेवाले जन्तुओंको कद्रूकी संतति समझना चाहिये। कुछ समय बाद हिरण्यकशिपु समस्त देवगणोंके स्वामी त्रिलोकीनाथ इन्द्रको जीतकर राज्य करने लगा। तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर हिरण्यकशिपु आदि दैत्यगण भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये तथा शेष दानवोंका इन्द्रने युद्धस्थलमें सफाया कर दिया। इस प्रकार जब दितिके सभी पुत्र मार डाले गये, तब उसने अपने पतिदेव महर्षि कश्यपसे युद्धमें इन्द्रका वध करनेवाले अन्य महाबली पुत्रकी याचना की। तब सामर्थ्यशाली कश्यपजीने उसे वर प्रदान करते हुए कहा—'देवि! तुम एक हजार वर्षतक पवित्र मनसे नियमका पालन करो तो तुम्हें वैसा पुत्र प्राप्त होगा।' पतिद्वारा ऐसा कही जानेपर वह नियममें तत्पर हो गयी। जिस समय वह नियममें संलग्न थी, उस समय सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उसके निकट आकर सावधानीपूर्वक उसकी सेवा करने लगे। यह देखकर उसने इन्द्रपर विश्वास कर लिया। जब एक सहस्र वर्षकी अवधिमें दस वर्ष शेष रह गये, तब तपस्यामें निरत वरदायिनी दिति परम प्रसन्न होकर इन्द्रसे बोली ॥ १५—२९ ॥
दितिरुवाच<br><br>पुत्रोत्तीर्णव्रतां प्रायो विद्धि मां पाकशासन।<br>भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्धमिमां श्रियम् ॥ ३०<br><br>भुङ्क्ष्व वत्स यथाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम्।<br>इत्युक्त्वा निद्रयाऽऽविष्टा चरणाक्रान्तमूर्धजा ॥ ३१<br><br>स्वयं सुष्वप नियता भाविनोऽर्थस्य गौरवात्।<br>तत्तु रन्ध्रं समासाद्य जठरं पाकशासनः ॥ ३२<br><br>चकार सप्तधा गर्भं कुलिशेन तु देवराट्।<br>एकैकं तु पुनः खण्डं चकार मघवा ततः ॥ ३३**दितिने कहा—**पुत्र! अब तुम ऐसा समझो कि मैंने प्रायः अपने व्रतको पूर्ण कर लिया है। पाकशासन! (व्रतकी समाप्तिपर) तुम्हारे एक भाई उत्पन्न होगा। वत्स! उसके साथ तुम इस राजलक्ष्मी तथा निष्कण्टक त्रिलोकीके राज्यका इच्छानुसार उपभोग करना। ऐसा कहकर स्वयं दिति निद्राके वशीभूत हो सो गयी। उस समय भावी कार्यके गौरवके कारण वह अपने नियमसे च्युत हो गयी थी; क्योंकि (सोते समय) उसके खुले हुए बाल चरणोंसे दबे हुए थे। ऐसी त्रुटिपर अवसर पाकर देवराज इन्द्र दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् इन्द्रने क्रुद्ध होकर पुनः प्रत्येक टुकड़ेको काटकर