मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १४६ * | ५४३ |
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| सप्तधा सप्तधा कोपात्प्राबुध्यत ततो दितिः।<br>विबुध्योवाच मा शक्र घातयेथाः प्रजां मम॥ ३४<br><br>तच्छ्रुत्वा निर्गतः शक्रः स्थित्वा प्राञ्जलिरग्रतः।<br>उवाच वाक्यं संत्रस्तो मातुर्वै वदनेरितम्॥ ३५<br><br>शक्र उवाच<br><br>दिवास्वप्नपरा मातः पादाक्रान्तशिरोरुहा।<br>सप्तसप्तभिरेवातस्तव गर्भः कृतो मया॥ ३६<br><br>एकोनपञ्चाशत्कृता भागा वज्रेण ते सुताः।<br>दास्यामि तेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते॥ ३७<br><br>इत्युक्ता सा तदा देवी सैवमस्त्वित्यभाषत।<br>पुनश्च देवी भर्त्तारमुवाचासितलोचना॥ ३८<br><br>पुत्रं प्रजापते देहि शक्रजेतारमूर्जितम्।<br>यो नास्त्रशस्त्रैर्वध्यत्वं गच्छेत् त्रिदिववासिनाम्॥ ३९<br><br>इत्युक्तः स तथोवाच तां पत्नीमतिदुःखिताम्।<br>दशवर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे॥ ४०<br><br>वज्रसारमयैरङ्गैरच्छेद्यैरायसैर्दृढैः।<br>वज्राङ्गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले॥ ४१<br><br>सा तु लब्धवरा देवी जगाम तपसे वनम्।<br>दशवर्षसहस्राणि सा तपो घोरमाचरत्॥ ४२<br><br>तपसोऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम्।<br>पुत्रमप्रतिकर्माणमजेयं वज्रदुश्छिदम्॥ ४३<br><br>स जातमात्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः।<br>उवाच मातरं भक्त्या मातः किं करवाण्यहम्॥ ४४<br><br>तमुवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपं च सा।<br>बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक॥ ४५<br><br>तेषां त्वं प्रतिकर्तुं वै गच्छ शक्रवधाय च।<br>बाढमित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं बली॥ ४६ | सात-सात भागोंमें विभक्त कर दिया। इतनेमें ही दितिकी निद्रा भंग हो गयी। तब वह सचेत होकर बोली—'अरे इन्द्र! मेरी संततिका विनाश मत कर।' यह सुनकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और अपनी उस विमाताके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर डरते-डरते मन्द स्वरमें यह वचन बोले—॥ ३०—३५॥<br><br>**इन्द्रने कहा—**माँ! आप दिनमें सो रही थीं और आपके बाल पैरोंके नीचे दबे हुए थे, इस नियम-व्युतिके कारण मैंने आपके गर्भको सात भागोंमें, पुनः प्रत्येकको सात भागोंमें विभक्त कर दिया है। इस प्रकार मैंने आपके पुत्रोंको उनचास भागोंमें बाँट दिया है। अब मैं उन्हें देवताओंद्वारा पूजित स्वर्गलोकमें स्थान प्रदान करूँगा। तब ऐसा उत्तर पानेपर देवी दितिने कहा—'अच्छा, ऐसा ही हो।' तदनन्तर कजरारे नेत्रोंवाली दिति देवीने पुनः अपने पति महर्षि कश्यपसे याचना की—'प्रजापते! मुझे एक ऐसा ऊर्जस्वी पुत्र प्रदान कीजिये, जो इन्द्रको पराजित करनेमें समर्थ हो तथा स्वर्गवासी देवगण अपने शस्त्रास्त्रोंसे जिसका वध न कर सकें।' इस प्रकार कहे जानेपर महर्षि कश्यप अपनी उस अत्यन्त दुखिया पत्नीसे बोले—'पुत्रवत्सले! दस हजार वर्षतक तपस्या करनेके उपरान्त तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी। तुम्हारे गर्भसे वज्राङ्ग नामका पुत्र उत्पन्न होगा। उसके अङ्ग वज्रके सार-तत्त्वके समान सुदृढ़ और लौहनिर्मित शस्त्रास्त्रोंद्वारा अच्छेद्य होंगे।' इस प्रकार वरदान पाकर दिति देवी तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयीं। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षोतक घोर तप किया। तपस्या समाप्त होनेपर ऐश्वर्यवती दितिने एक ऐसे पुत्रको उत्पन्न किया, जो दुर्जय, अद्भुतकर्मा और अजेय था तथा जिसके अङ्ग वज्रद्वारा अच्छेद्य थे। वह जन्म लेते ही समस्त शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् हो गया। उसने भक्तिपूर्वक अपनी माता दितिसे कहा—'माँ! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' तब हर्षित हुई दितिने उस दैत्यराजसे कहा—'बेटा! इन्द्रने मेरे बहुत-से पुत्रोंको मार डाला है, अतः उनका बदला लेनेके लिये तुम जाओ और इन्द्रका वध करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा मातासे कहकर महाबली वज्राङ्ग स्वर्गलोकमें जा पहुँचा। |