मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| पराजयं महेन्द्रस्य सर्वलोकक्षयावहम्।<br>चेलुः शिखरिणो मुख्याः पेतुरुल्का नभस्तलात्॥ २१०<br><br>जगर्जुर्जलदा दिक्षु ह्युद्धताश्च महार्णवाः।<br>तां भूतविकृतिं दृष्ट्वा भगवान् गरुडध्वजः॥ २११<br><br>व्यबुद्ध्यताहिपर्यङ्के योगनिद्रां विहाय तु।<br>लक्ष्मीकरयुगाजस्रलालिताङ्घ्रिसरोरुहः॥ २१२<br><br>शरदम्बरनीलाब्जकान्तदेहच्छविर्विभुः।<br>कौस्तुभोद्भासितोरस्को कान्तकेयूरभास्वरः॥ २१३<br><br>विमृश्य सुरसंक्षोभं वैनतेयं समाह्वयत्।<br>आहूतेऽवस्थिते तस्मिन् नागावस्थितवर्ष्मणि॥ २१४<br><br>दिव्यनानास्त्रतीक्ष्णार्चिरारुह्यागात् सुरान् स्वयम्।<br>तत्रापश्यत देवेन्द्रमभिद्रुतमभिप्लुतैः॥ २१५<br><br>दानवेन्द्रैर्नवाम्भोदसच्छायैः पौरुषोत्कटैः।<br>यथा हि पुरुषं घोरैर्भाग्यैर्वंशशालिभिः॥ २१६<br><br>परित्राणायाशु कृतं सुक्षेत्रे कर्म निर्मलम्।<br>अथापश्यन्त दैतेया वियति ज्योतिर्मण्डलम्॥ २१७<br><br>स्फुरन्तमुदयाद्रिस्थं सूर्यमुष्णत्विषा इव।<br>प्रभावं ज्ञातुमिच्छन्तो दानवास्तस्य तेजसः॥ २१८<br><br>गरुत्मन्तमपश्यन्तः कल्पान्तानलसंनिभम्।<br>तमास्थितं च मेघौघद्युतिमक्षयमच्युतम्॥ २१९<br><br>तमालोक्यासुरेन्द्रास्तु हर्षसम्पूर्णमानसाः।<br>अयं वै देवसर्वस्वं जितेऽस्मिन् निर्जिताः सुराः॥ २२०<br><br>अयं स दैत्यचक्राणां कृतान्तः केशवोऽरिहा।<br>एनमाश्रित्य लोकेषु यज्ञभागभुजोऽमराः॥ २२१ | महेन्द्रकी पराजय मान ली, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाली थी। उस समय प्रधान-प्रधान पर्वत विचलित हो उठे, आकाशमण्डलसे उल्काएँ गिरने लगीं, दसों दिशाओंमें बादल गरजने लगे और महासागरोंमें ज्वार उठने लगा॥ २०३—२१० १/२ ॥<br><br>उस समय पञ्चभूतोंके उस विकारको देखकर शेषशय्यापर शयन करते हुए भगवान् गरुडध्वज योगनिद्राका त्याग कर सहसा जाग पड़े। लक्ष्मी अपने दोनों हाथोंसे जिनके चरणकमलोंकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, जिनके शरीरकी कान्ति शरत्कालीन आकाश एवं नीले कमल-सी सुन्दर है, जिनका वक्षःस्थल कौस्तुभ मणिसे उद्भासित होता रहता है, जो चमकीले बाजूबंदसे प्रकाशित होते रहते हैं, उन सर्वव्यापी भगवान्ने देवताओंकी अस्त-व्यस्तताका विचार कर गरुड़का आह्वान किया। बुलाते ही हाथीके समान विशाल शरीरवाले गरुड़के उपस्थित होनेपर भगवान् उनपर सवार होकर स्वयं देवताओंके निकट गये, उस समय उनके नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रचण्ड प्रकाश फैल रहा था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि नूतन मेघकी-सी कान्तिवाले एवं उत्कट पुरुषार्थी दानवेन्द्रोंद्वारा खदेड़े जाते हुए देवराज इन्द्र उसी प्रकार भाग रहे हैं, जैसे भयंकर अभाग्यसे युक्त विस्तृत परिवारसे घिरा हुआ पुरुष कष्ट पाता है। फिर तो उस सुन्दर अवसरपर भगवान्ने तुरंत ही इन्द्रकी रक्षाके लिये निर्मल कर्म किया। उस समय दैत्योंको आकाशमें एक ज्योतिर्मण्डल दिखायी पड़ा, जो उदयाचलपर स्थित उष्ण कान्तिवाले सूर्यके समान चमक रहा था। तब दानवगण उस तेजके प्रभावको जाननेके इच्छुक हो उठे। इतनेमें ही उन्हें प्रलयकालीन अग्निकी भाँति भयंकर गरुड दीख पड़े। तत्पश्चात् गरुडपर बैठे हुए मेघसमूहकी-सी कान्तिवाले अविनाशी भगवान् अच्युतका दर्शन हुआ। उन्हें देखकर असुरेन्द्रोंका मन हर्षसे परिपूर्ण हो गया (और वे कहने लगे—) 'यही तो देवताओंका सर्वस्व है। इसे जीत लेनेपर देवताओंको पराजित हुआ ही समझना चाहिये। यही वह दैत्यसमूहोंका विनाश करनेवाला शत्रुसूदन केशव है। इसीका आश्रय ग्रहण कर देवगण लोकोंमें यज्ञ-भागके भोक्ता बने हुए हैं'॥ २११—२२१॥ | | इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे परिवार्य समंततः।<br>निजघ्नुर्विविधैरस्त्रैस्ते तमायान्तमाहवे॥ २२२ | ऐसा कहकर कालनेमि प्रभृति दस महारथी दैत्य तथा वे सभी दानव युद्धस्थलमें आते हुए भगवान् विष्णुको चारों ओरसे घेरकर उनपर विविध प्रकारके अस्त्रोंसे प्रहार करने लगे। |