भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 591
* अध्याय १५२ *५८१
अनन्तरं शान्तमभूत् तदस्त्रं<br>दैत्यास्त्रयोगेन तु कालदण्डम्।<br>शान्तं तदालोक्य हरिः स्वशस्त्रं<br>स्वविक्रमे मन्युपरीतमूर्तिः॥ ३३<br>जग्राह चक्रं तपनायुताभ-<br>मुग्रारमात्मानमिव द्वितीयम्।<br>चिक्षेप सेनापतयेऽभिसंध्य<br>कण्ठस्थलं वज्रकठोरमुग्रम्॥ ३४<br>चक्रं तदाकाशगतं विलोक्य<br>सर्वात्मना दैत्यवराः स्वकीयैः।<br>नाशक्नुवन् वारयितुं प्रचण्डं<br>दैवं यथा कर्म मुधा प्रपन्नम्॥ ३५<br>तमप्रतर्क्यं जनयन्नजय्यं<br>चक्रं पपात ग्रसनस्य कण्ठे।<br>द्विधा तु कृत्वा ग्रसनस्य कण्ठं<br>तद्रक्तधारारुणघोरनाभि।<br>जगाम भूयोऽपि जनार्दनस्य<br>पाणिं प्रवृद्धानलतुल्यदीप्ति॥ ३६तदनन्तर दैत्योंद्वारा प्रयुक्त किये गये अस्त्रोंके संयोगसे वह कालदण्डास्त्र शान्त हो गया। अपने उस अस्त्रको शान्त हुआ देखकर श्रीहरि अपने पराक्रममें ठेस लगी समझकर क्रोधसे उबल पड़े। फिर तो उन्होंने उस चक्रको हाथमें लिया, जो दस हजार सूर्योंके समान तेजोमय, कठोर अरोंसे युक्त और प्रभावमें अपनी द्वितीय मूर्तिके समान था। उन्होंने उस वज्रकी भाँति कठोर एवं भयंकर चक्रको सेनापति ग्रसनके कण्ठस्थलको लक्ष्य करके छोड़ दिया। उस चक्रको आकाशमें पहुँचा हुआ देखकर दैत्येश्वरगण अपने पराक्रमसे पूरा बल लगानेपर भी उसी प्रकार निवारण करनेमें समर्थ न हो सके, जैसे अनिष्ट कर्मसे निष्पन्न हुए प्रचण्ड दुर्भाग्यको हटाया नहीं जा सकता। परिणामस्वरूप वह अतर्क्य महिमाशाली एवं अजेय चक्र ग्रसनके कण्ठपर जा गिरा और उसके गलेको दो भागोंमें विभक्त कर दिया। उससे बहते हुए रक्तकी धारासे उस चक्रकी कठोर नाभि लाल हो गयी थी। तत्पश्चात् धधकती हुई अग्निके समान वह उद्दीप्त चक्र पुनः भगवान् जनार्दनके हाथमें लौट गया॥ ३१–३६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे ग्रसनवधो नामैकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें ग्रसन-वध नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५१॥


एक सौ बावनवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुका मथन आदि दैत्योंके साथ भीषण संग्राम और अन्तमें घायल होकर युद्धसे पलायन

सूत उवाच
तस्मिन् विनिहते दैत्ये ग्रसने बलनायके।<br>निर्मर्यादमयुध्यन्त हरिणा सह दानवाः॥ १<br>पट्टिशैर्मुसलैः पाशैर्गदाभिः कुणपैरपि।<br>तीक्ष्णाननैश्च नाराचैश्चक्रुः शक्तिभिरेव च॥ २<br>तानस्त्रान् दानवैर्मुक्तांश्चित्रयोधी जनार्दनः।<br>एकैकं शतशश्चक्रे बाणैरग्निशिखोपमैः॥ ३<br>ततः क्षीणायुधप्राया दानवा भ्रान्तचेतसः।<br>अस्त्राण्यादातुमभवन्न समर्था यदा रणे॥ ४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! उस सेनानायक दैत्यराज ग्रसनके मारे जानेपर दानवगण श्रीहरिके साथ युद्ध-मर्यादाका परित्याग कर (भयंकर) युद्ध करने लगे। उस समय वे पट्टिश, मुसल, पाश, गदा, कुणप, तीखे मुखवाले बाण, चक्र और शक्तियोंसे प्रहार कर रहे थे। तब विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले भगवान् जनार्दनने अपने अग्निकी लपटोंके समान उद्दीप्त बाणोंसे दैत्योंद्वारा छोड़े गये उन अस्त्रोंमें प्रत्येकके सौ-सौ टुकड़े कर दिये। तब दानवोंके अस्त्र प्रायः नष्ट हो गये और उनका चित्त व्याकुल हो गया। इस प्रकार जब वे रणभूमिमें अस्त्र ग्रहण करनेमें असमर्थ हो गये,