भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६०* मत्स्यपुराण *

| नाम्ना सत्यवती लोके पितृलोके तथाष्टका।<br>आयुरारोग्यदा नित्यं सर्वकामफलप्रदा॥ १९<br>भविष्यसि परे काले नदीत्वं च गमिष्यसि।<br>पुण्यतोया सरिच्छ्रेष्ठा लोके ह्यच्छोदनामिका॥ २०<br>इत्युक्त्वा स गणस्तेषां तत्रैवान्तरधीयत।<br>साप्यवाप च तत् सर्वं फलं यदुदितं पुरा॥ २१ | इस प्रकार मनुष्य-लोकमें सत्यवती और पितृलोकमें आयु एवं आरोग्य प्रदान करनेवाली तथा नित्य सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंकी प्रदात्री अष्टका नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। कालान्तरमें तुम मनुष्यलोकमें नदियोंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला अच्छोदा नामसे नदीरूपमें जन्म धारण करोगी।' ऐसा कहकर पितरोंका वह समुदाय वहीं अन्तर्हित हो गया तथा अच्छोदाको अपने उन समस्त कर्मफलोंकी प्राप्ति हुई, जो पहले कहे जा चुके हैं॥ ९—२१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
विभ्राजा नाम चान्ये तु दिवि सन्ति सुवर्चसः।<br>लोका बर्हिषदो यत्र पितरः सन्ति सुव्रताः॥ १ऋषियो! स्वर्गमें विभ्राज नामक अन्य तेजस्वी लोक भी हैं, जहाँ परम श्रेष्ठ उत्तम व्रतपरायण बर्हिषद् नामक पितर निवास करते हैं।
यत्र बर्हिणयुक्तानि विमानानि सहस्रशः।<br>सङ्कल्पा बर्हिषो यत्र तिष्ठन्ति फलदायिनः॥ २जहाँ मयूरोंसे युक्त हजारों विमान विद्यमान रहते हैं। जहाँ संकल्पके लिये प्रयुक्त हुए बर्हि (कुश) फल देनेके लिये उन्मुख होकर उपस्थित रहते हैं
यत्राभ्युदयशालासु मोदन्ते श्राद्धदायिनः।<br>यांश्च देवासुरगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः॥ ३<br>यक्षरक्षोगणाश्चैव यजन्ति दिवि देवताः।एवं जहाँकी अभ्युदयशालाओंमें पितरोंको श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग आनन्द मनाते रहते हैं। देवताओं और असुरोंके गण, गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह तथा यक्षों और राक्षसोंके समुदाय स्वर्गमें उन पितरोंके निमित्त यज्ञका विधान करते रहते हैं।
पुलस्त्यपुत्राः शतशस्तपोयोगसमन्विताः॥ ४<br>महात्मानो महाभागा भक्तानामभयप्रदाः।महर्षि पुलस्त्यके सैकड़ों पुत्र, जो तपस्या और योगसे परिपूर्ण, महान् आत्मबलसे सम्पन्न, महान् भाग्यशाली एवं अपने भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले हैं, वहाँ निवास करते हैं।
एतेषां पीवरी कन्या मानसी दिवि विश्रुता॥ ५<br>योगिनी योगमाता च तपश्चक्रे सुदारुणम्।इन पितरोंकी एक मानसी कन्या थी, जो पीवरी नामसे विख्यात थी। उस योगिनी एवं योगमाता पीवरीने अत्यन्त कठोर तप किया।
प्रसन्नो भगवांस्तस्या वरं वव्रे तु सा हरेः॥ ६<br>योगवन्तं सुरूपं च भर्तारं विजितेन्द्रियम्।<br>देहि देव प्रसन्नस्त्वं पतिं मे वदतां वरम्॥ ७उसकी तपस्यासे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये (और उसके समक्ष प्रकट हुए)। तब पीवरीने श्रीहरिसे यह वरदान माँगा—'देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे योगाभ्यासी, अत्यन्त सौन्दर्यशाली, जितेन्द्रिय, वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं पालन-पोषण करनेवाला पति प्रदान कीजिये।'
उवाच देवो भविता व्यासपुत्रो यदा शुकः।<br>भविता तस्य भार्या त्वं योगाचार्यस्य सुव्रते॥ ८यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'सुव्रते! जब महर्षि व्यासके पुत्र शुक जन्म धारण करेंगे, उस समय तुम उन योगाचार्यकी पत्नी होओगी।
भविष्यति च ते कन्या कृत्वी नाम च योगिनी।<br>पाञ्चालाधिपतेर्देया मानुषस्य त्वया तदा॥ ९उनके संयोगसे तुम्हें एक योगाभ्यासपरायणा कृत्वी नामकी कन्या उत्पन्न होगी। तब तुम उसे मानव-योनिमें उत्पन्न हुए पञ्चाल-नरेश (नीप मतान्तरसे अणुह)-को समर्पित कर देना।
जननी ब्रह्मदत्तस्य योगसिद्धा च गौः स्मृता।<br>कृष्णो गौरः प्रभुः शम्भुर्भविष्यन्ति च ते सुताः॥ १०तुम्हारी वह योगसिद्धा कन्या (कृत्वी) ब्रह्मदत्तकी माता होकर 'गौ' नामसे भी प्रसिद्ध होगी। तदनन्तर कृष्ण, गौर, प्रभु और शम्भु नामक तुम्हारे चार पुत्र होंगे,