भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उदपात्रं च कांस्यं च मेक्षणं च समित् कुशान्।<br>तिलाः पात्राणि सद्वासो गन्धधूपानुलेपनम्॥ २६<br><br>आहरेदपसव्यं तु सर्वे दक्षिणतः शनैः।<br>एवमासाद्य तत् सर्वं भवनस्याग्रतो भुवि॥ २७<br><br>गोमयेनोपलिप्तायां गोमूत्रेण तु मण्डलम्।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिस्तदभ्यर्च्य्यापसव्यवत्॥ २८<br><br>विप्राणां क्षालयेत् पादावभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>आसनेषूपक्लृप्तेषु दर्भवत्सु विधानवत्॥ २९<br><br>उपस्पृष्टोदकान् विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत्।<br>द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र च॥ ३०इसी प्रकार अपसव्य होकर (जनेऊको बाँयें कंधेसे दाहिने कंधेपर रखकर) पीतलका जलपात्र, मेक्षण (प्रणीतापात्र), समिधा, कुश, तिल, अन्यान्य पात्र, शुद्ध नवीन वस्त्र, गन्ध, धूप, चन्दन आदिको लाकर सबको धीरेसे अपनी दाहिनी ओर रख ले। इस प्रकार सभी आवश्यक सामग्रियोंको एकत्र करके घरके दरवाजेपर गोबरसे लिपी हुई भूमिपर अपसव्य होकर गोमूत्रसे मण्डलकी रचना करे और पुष्पसहित अक्षतोंद्वारा उसकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् बारम्बार ब्राह्मणोंका अभिनन्दन करते हुए उनका पाद-प्रक्षालन करे। पुनः उन ब्राह्मणोंको कुशनिर्मित आसनोंपर बैठाकर विधिपूर्वक उन्हें आचमन या जलपान करावे। तदनन्तर उनसे श्राद्धके लिये सम्मति ले॥ १९—२९ १/२॥
भोजयेदीश्वरोऽपीह न कुर्याद् विस्तारं बुधः।<br>दैवपूर्वं नियोज्याथ विप्रानर्घ्यादिना बुधः॥ ३१बुद्धिमान् पुरुषको देवकार्यमें दो एवं पितृकार्यमें तीन अथवा दोनों कार्योंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न होनेपर भी पार्वण श्राद्धमें विस्तार करना उचित नहीं है। पहले विश्वेदेवको अर्घ्य आदि समर्पित करके तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी अर्घ्य आदि द्वारा पूजा करे।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो विप्रैर्विप्रो यथाविधि।<br>स्वगृहोक्तविधानेन कांस्ये कृत्वा चरुं ततः॥ ३२पुनः श्राद्धकर्ता ब्राह्मणको चाहिये कि वह उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर चरुको काँसेके बर्तनमें रखकर अपने गृह्योक्तके विधानानुसार विधिपूर्वक अग्निमें हवन करे,
अग्नीषोमयमानां तु कुर्यादाप्यायनं बुधः।<br>दक्षिणाग्नौ प्रतीते वा य एकाग्निर्द्विजोत्तमः॥ ३३फिर बुद्धिमान् पुरुषको अग्नि, सोम और यमका तर्पण करना चाहिये। इस प्रकार एक अग्निका उपासक यज्ञोपवीतधारी श्रेष्ठ ब्राह्मण 'दक्षिण' नामक अग्निके प्रज्वलित हो जानेपर श्राद्धकर्म सम्पन्न करे।
यज्ञोपवीती निर्वर्त्य ततः पर्युक्षणादिकम्।<br>प्राचीनावीतिना कार्यमतः सर्वं विजानता॥ ३४तदनन्तर पर्युक्षण आदिसे निवृत्त होकर उपर्युक्त सारी विधियोंको समझ ले और प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर सारा कार्य सम्पन्न करे।
षट् च तस्माद्धविःशेषात् पिण्डान् कृत्वा ततोदकम्।<br>दद्यादुदकपात्रैस्तु सतिलं सव्यपाणिना॥ ३५फिर उस बचे हुए हविसे छः पिण्ड बनाकर उनपर बायें हाथसे अपने जलपात्रद्वारा तिलसहित जल गिराये
जान्वाच्य सव्यं यत्नेन दर्भयुक्तो विमत्सरः।<br>विधाय लेखां यत्नेन निर्वापेष्क्ववनेजनम्॥ ३६और ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर हाथमें कुश लेकर बायाँ घुटना मोड़कर प्रयत्नपूर्वक (वेदीपर) रेखा बनाये (एवं रेखाओंपर कुश बिछाये।) तथा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके पिण्ड रखनेके लिये बिछाये गये कुशोंपर अवनेजन (श्राद्ध-वेदीपर बिछे हुए कुशोंपर जल सींचनेका संस्कार) करे।
दक्षिणाभिमुखः कुर्यात् करे दर्वीं निधाय वै।<br>निधाय पिण्डमेकैकं सर्वदर्भेष्वनुक्रमात्॥ ३७फिर हाथमें करछुल लेकर