मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १८८ * | ७८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तेषां बलं च बुद्धिश्च हरकोपेन नाशिते।<br>ततः सांवर्तको वायुर्युगान्तप्रतिमो महान्॥ १४<br>समीरितोऽनलस्तेन उत्तमाङ्गेन धावति।<br>ज्वलन्ति पादपास्तत्र पतन्ति शिखराणि च॥ १५<br>सर्वतो व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम्।<br>भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तत् प्रत्यभज्यत॥ १६<br>तेनैव पीडितं सर्वं ज्वलितं त्रिशिखैः शरैः।<br>द्रुमाश्रारामखण्डानि गृहाणि विविधानि च॥ १७<br>दशदिक्षु प्रवृत्तोऽयं समृद्धो हव्यवाहनः।<br>मनःशिलापुञ्जनिभो दिशो दश विभागशः॥ १८<br>शिखाशतैरनेकस्तु प्रजज्वाल हुताशनः।<br>सर्वं किंशुकवर्णाभं ज्वलितं दृश्यते पुरम्॥ १९ | लगे। शंकरजीके कोपसे उनके बल और बुद्धि नष्ट हो गये। तदनन्तर प्रलयकालके समान प्रचण्ड सांवर्तक वायु बहने लगा। वायुसे प्रेरित आगकी भयंकर लपटें भी इधर-उधर व्याप्त होने लगीं। जिससे वहाँ वृक्ष-समूह जलने लगे और पर्वतके शिखर गिरने लगे। सभी ओर लोग व्याकुल होकर चेतानारहित हो गये। चतुर्दिक भयंकर हाहाकार मच गया। सभी उद्यान नष्ट हो गये। वहाँ सब कुछ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया। शंकरजीद्वारा सभी दुःखमग्न कर दिये गये। तीन शिखाओंवाले बाणोंसे वृक्ष, वाटिकाएँ और विविध प्रासाद जलने लगे। यह प्रदीप्त अग्नि दसों दिशाओंमें फैल गया। उस समय दसों दिशाएँ मैनशिलसमूहके समान दीखने लगीं। अग्निदेव अनेकों प्रकारकी सैकड़ों शिखाओंसे युक्त प्रज्वलित हो उठे, जिससे जला हुआ वह सम्पूर्ण त्रिपुर पलाशपुष्पके समान लाल रंगका दिखायी पड़ रहा था॥ ११—१९॥ |
| गृहाद् गृहान्तरं नैव गन्तुं धूमेन शक्यते।<br>हरकोपानलैर्दग्धं क्रन्दमानं सुदुःखितम्॥ २०<br>प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम्।<br>प्रासादशिखराग्राणि व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥ २१<br>नानामणिविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा।<br>गृहाणि चैव रम्याणि दह्यन्ते दीप्तवह्निना॥ २२<br>धावन्ति द्रुमखण्डेषु वलभीषु तथा जनाः।<br>देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलन्तः प्रधाविताः॥ २३<br>क्रन्दन्ति चानलप्लुष्टा रुदन्ति विविधैः स्वरैः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र दृश्यन्तेऽङ्गारराशयः॥ २४<br>गजाश्च गिरिकूटाभा दह्यमाना यतस्ततः।<br>स्तुवन्ति देवदेवेशं परित्रायस्व नः प्रभो।<br>अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनप्रधर्षिताः॥ २५<br>स्नेहात् प्रदह्यमानाश्च तथैव विलयंगताः।<br>दह्यन्ते दानवास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६ | उस समय धुएँके कारण एक घरसे दूसरे घरमें जाना सम्भव नहीं था। सभी लोग शंकरजीकी क्रोधाग्निसे जलते हुए अत्यन्त दुःखके कारण चीत्कार कर रहे थे। इस प्रकार सभी दिशाओंमें धधकता हुआ त्रिपुरनगर जल रहा था। राजभवनोंके शिखरोंके अग्रभाग हजारों टुकड़ोंमें टूटकर गिर रहे थे। विविध मणियोंसे जटित अनेकों विमान और रमणीय घर उद्दीप्त आगसे जल रहे थे। वहाँके निवासी वृक्षोंके समूहोंमें, घरोंके छज्जोंके नीचे तथा सभी देवगृहोंमें जलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे। आगकी चपेटमें आकर वे सभी विविध स्वरोंमें क्रन्दन कर रहे थे। वहाँ पर्वतशिखरके समान अङ्गारसमूह दिखायी दे रहे थे। पर्वतशिखरके समान विशाल गजराज इधर-उधर जल रहे थे। सभी देवाधिदेव शंकरकी यों स्तुति कर रहे थे—'प्रभो! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये।' वे अग्निसे जलते हुए स्नेहके कारण एक-दूसरेका आलिङ्गन कर उसी प्रकार जलते हुए नष्ट हो रहे थे। इस प्रकार वहाँ सैकड़ों-हजारों दानव जल रहे थे॥ २०—२६॥ |
| हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यः सहपङ्कजाः।<br>दृश्यन्तेऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः॥ २७<br>अम्लानपङ्कजच्छन्ना विस्तीर्णा योजनायताः।<br>गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नभूषिताः॥ २८<br>पतन्त्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव।<br>वरस्त्रीबालवृद्धेषु गोषु पक्षिषु वाजिषु॥ २९ | हंसों और बतखोंसे परिपूर्ण एवं कमलोंसे युक्त पुष्करिणी, बगीचे तथा बावलियाँ, जो एक योजन लम्बी-चौड़ी और खिले हुए कमलोंसे व्याप्त थीं, अग्निसे जलती हुई दिखायी दे रही थीं। वहाँ रत्नोंसे विभूषित पर्वतशिखरके समान राजभवन अग्निके द्वारा भस्म होकर गिर रहे थे। वे जलशून्य मेघके समान दिखायी दे रहे थे। शंकरजीके क्रोधसे प्रेरित अग्नि श्रेष्ठ स्त्री, बालक, वृद्ध, गौ, पक्षी |