भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 799
* अध्याय १८८ *७८९

| यः पठेत् तोटकं दिव्यं प्रयत: शुचिमानसः।<br>बाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि वरदो भवेत्॥ ७२<br>इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः।<br>प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं वचनमब्रवीत्॥ ७३<br><br>महेश्वर उवाच<br>न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव।<br>पुत्रपौत्रसुहृद्बन्धुभार्याभृत्यजनैः सह॥ ७४<br>अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पाण्डव॥ ७५<br>अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः।<br>ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा॥ ७६<br>तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना।<br>भ्रमत्तु गगने दिव्यं रुद्रतेजःप्रभावतः॥ ७७<br>एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना।<br>ज्वालामालाप्रदीप्तं तत् पतितं धरणीतले॥ ७८<br>एकं निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके।<br>द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ७९<br>दग्धेषु तेषु राजेन्द्र रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>ज्वलत्तदपतत् तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः॥ ८०<br>ऊर्ध्‍वेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवं गताः।<br>हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृतो महान्॥ ८१<br>शरमस्तम्भयद् रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे।<br>एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८२<br>चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः॥ ८३<br>ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः।<br>पृथिवीमेकच्छत्रेण भुङ्क्ते स तु न संशयः॥ ८४<br><br>एवं पुण्यो महाराज पर्वतोऽमरकण्टकः।<br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम्॥ ८५<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्॥ ८६<br><br>ब्रह्महत्या गमिष्यन्ति राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तदेवं निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८७ | जो मनुष्य संयत होकर पवित्र मनसे इस दिव्य तोटकछन्दमें रचित स्तोत्रको पढ़ता है, उसके लिये भी रुद्र बाणके समान वरदायक होते हैं। उस समय स्वयं महेश्वरदेव इस महादिव्य स्तोत्रको सुनकर उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले॥ ६७-७३॥<br><br>भगवान् महेश्वरने कहा—वत्स! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। दानव! तुम पुत्र, मित्र, बन्धु, पत्नी और भृत्यजनोंके साथ सुवर्णनिर्मित नगरमें निवास करो। बाण! आजसे तुम देवताओंद्वारा अवध्य हो गये। अब तुम लोकमें सर्वथा निर्भय, अव्यय और अक्षय होकर विचरण करो। पाण्डुनन्दन! इस प्रकार देवाधिदेवने बाणको पुनः वर प्रदान किया। तदनन्तर रुद्रने अग्निको जलानेसे मना कर दिया। इस प्रकार महात्मा शंकरने बाणासुरके तृतीय पुरकी रक्षा की। वह पुर रुद्रके तेजके प्रभावसे गगनमण्डलमें घूमने लगा। इस प्रकार महात्मा शंकरने त्रिपुरको जलाया। वह ज्वालामालासे प्रदीप्त होकर पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। उनमेंसे एक पुर त्रिपुरान्तकके श्रीशैलपर गिरा और द्वितीय उस अमरकण्टक पर्वतपर गिरा। राजेन्द्र! उनके जल जानेपर उसपर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हुए। वह जलता हुआ गिरा था, इस कारण ज्वालेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसकी दिव्य ज्वालाएँ ऊपरको उठती हुई स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। उस समय देवों और असुरोंके द्वारा किया गया भयंकर हाहाकार व्याप्त हो गया। तब रुद्रने अमरकण्टक पर्वतपर उत्तम माहेश्वरपुरमें शरको स्तम्भित कर दिया। पाण्डुनन्दन! (इस प्रकार अमरकण्टकपर्वतपर जो व्यक्ति रुद्रकोटिकी अर्चना करता है) वह तीस करोड़ एक हजार वर्षपर्यन्त चौदहों भुवनोंका उपभोग कर अन्तमें पृथ्वीपर जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है। वह एकच्छत्र सम्राट् होकर पृथ्वीका उपभोग करता है—इसमें संदेह नहीं है॥ ७४-८४॥<br><br>महाराज! यह अमरकण्टक पर्वत ऐसा पुण्यजनक है। जो व्यक्ति चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टक पर्वतपर जाता है, वह अश्वमेध-यज्ञसे दसगुना फल प्राप्त करता है और वहाँ महेश्वरका दर्शन करके स्वर्गलोकको प्राप्त करता है—ऐसा मनीषियोंने कहा है। सूर्यग्रहणके अवसरपर अमरकण्टकपर जानेसे ब्रह्महत्याएँ निवृत्त हो जाती हैं। इस प्रकार अमरकण्टक पर्वतपर अशेष पुण्य |

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