भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७९० * मत्स्यपुराण *


| मनसापि स्मरेद् यस्तं गिरिं त्वमरकण्टकम्।<br>चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥८८ | प्राप्त होता है। जो मनसे भी उस अमरकण्टकपर्वतका स्मरण करता है, उसे निःसंदेह सौ चान्द्रायणव्रतसे भी अधिक फल मिलता है। | | त्रयाणामपि लोकानां विख्यातोऽमरकण्टकः।<br>एष पुण्यो गिरिश्रेष्ठः सिद्धगन्धर्वसेवितः॥८९ | अमरकण्टक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। यह पुण्यमय श्रेष्ठ पर्वत सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित, | | नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः।<br>मृगव्याघ्रसहस्रैस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥९० | विविध वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत हजारों मृगों और व्याघ्रोंसे सेवित है। | | यत्र संनिहितो देवो देव्या सह महेश्वरः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह॥९१ | जहाँ देवी पार्वतीके साथ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु तथा विद्याधरोंके साथ इन्द्र सदा उपस्थित रहते हैं, | | ऋषिभिः किन्नरैर्यक्षैर्नित्यमेव निषेवितः।<br>वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते पन्नगोत्तमैः॥९२ | वह अमरकण्टक पर्वत ऋषियों, किन्नरों और यक्षोंके द्वारा सदा सेवित रहता है। श्रेष्ठ सर्पोंके साथ वासुकि वहाँ क्रीड़ा करते रहते हैं। | | प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥९३ | जो मनुष्य अमरकण्टक पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। | | तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥९४ | वहाँ सिद्धोंद्वारा सेवित ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है, उसमें स्नानकर मानव स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं और जो वहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। | | ज्वालेश्वरे महाराज यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु तस्यापि शृणु यत्फलम्॥९५ | महाराज! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर जो व्यक्ति ज्वालेश्वरमें प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। | | सर्वकर्मविनिर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानसंयुतः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥९६ | वह व्यक्ति सभी कर्मोंसे विनिर्मुक्त तथा ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो प्रलयकालपर्यन्त रुद्रलोकको प्राप्त करता है। | | अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे।<br>तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत॥९७ | सुव्रत! अमरकण्टकपर्वतके दोनों तटोंपर करोड़ों ऋषिगण तपस्यामें रत रहते हैं। | | समंताद् योजनक्षेत्रो गिरिश्चामरकण्टकः॥९८ | यह अमरकण्टकपर्वत चारों ओरसे एक योजनमें विस्तृत है। | | अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले।<br>स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥९९ | अकाम हो या सकाम, जो मनुष्य नर्मदाके शुभदायक जलमें स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है और रुद्रलोकको प्राप्त करता है॥८५-९९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णनमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥