भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 801, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 801
  • अध्याय १८९ * | ७९१

एक सौ नवासीवाँ अध्याय

नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>पृच्छन्ति ते महात्मानो मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>युधिष्ठिरपुरोगास्ते ऋषयश्च तपोधनाः॥ १<br>आख्याहि भगवंस्तथ्यं कावेरीसंगमो महान्।<br>लोकानां च हितार्थाय अस्माकं च विवृद्धये॥ २<br>सदा पापरता ये च नरा दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो गच्छन्ति परं पदम्।<br>एतदिच्छाम विज्ञातुं भगवन् वक्तुमर्हसि॥ ३सूतजी कहते हैं—ऋषियो! युधिष्ठिरको आगे कर वे तपोधन महात्मा-ऋषिगण महामुनि मार्कण्डेयसे पूछने लगे—'भगवन्! आप हमलोगोंके अभ्युदय और लोकके कल्याणके लिये उस नर्मदा और कावेरीके संगमका माहात्म्य भलीभाँति वर्णन कीजिये। भगवन्! जिसके प्रभावसे सदा पापमें रत एवं दुराचारमें प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और परमपदको प्राप्त करते हैं, उसे हमलोग जानना चाहते हैं, आप बतानेकी कृपा करें॥ १—३॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृण्वन्त्ववहिताः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>अस्ति वीरो महायक्षः कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ४<br>इदं तीर्थमनुप्राप्य राजा यक्षाधिपोऽभवत्।<br>सिद्धिं प्राप्तो महाराज तन्मे निगदतः शृणु॥ ५<br>कावेरी नर्मदा यत्र सङ्गमो लोकविश्रुतः।<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ६<br>तपोऽतप्यत यक्षेन्द्रो दिव्यं वर्षशतं महत्।<br>तस्य तुष्टो महादेवः प्रादाद् वरमनुत्तमम्॥ ७<br>भो भो यक्ष महासत्त्व वरं ब्रूहि यथेप्सितम्।<br>ब्रूहि कार्यं यथेष्टं तु यत्ते मनसि वर्तते॥ ८मार्कण्डेयजीने कहा—युधिष्ठिरसहित ऋषिगण! आपलोग सावधान होकर सुनिये। सत्य पराक्रमी एवं शूरवीर महायक्ष कुबेरने इस तीर्थमें आकर सिद्धि प्राप्त की और वे यक्षोंके अधीश्वर बने। महाराज! मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। किसी समय सत्यपराक्रमी यक्षपति कुबेरने जहाँ कावेरी और नर्मदाका लोकप्रसिद्ध संगम है, वहाँ स्नानकर पवित्र हो सौ दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की। तब संतुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा—'महाबलशाली यक्ष! तुम अपना अभीष्ट वर माँग लो। तुम्हारे मनमें जो यथेष्ट कार्य वर्तमान है, उसे बतलाओ'॥ ४—८॥
कुबेर उवाच<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>अद्यप्रभृति सर्वेषां यक्षाणामधिपो भवे॥ ९<br>कुबेरस्य वचः श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः।<br>एवमस्तु ततो देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०<br>सोऽपि लब्धवरो यक्षः शीघ्रं लब्धफलोदयः।<br>पूजितः स तु यक्षैश्च ह्यभिषिक्तस्तु पार्थिव॥ ११<br>कावेरीसङ्गमं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्।<br>ये नरा नाभिजानन्ति वञ्चितास्ते न संशयः॥ १२कुबेर बोले—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मैं आजसे सभी यक्षोंका अधीश्वर हो जाऊँ। कुबेरका वचन सुनकर महेश्वर परम प्रसन्न हुए और 'ऐसा ही हो'—यों कहकर वे देवाधिदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। राजन्! इस प्रकार उस यक्षने वर प्राप्त कर शीघ्र ही फलको भी प्राप्त किया। वह यक्षोंद्वारा पूजित होकर राजाके पदपर अभिषिक्त किया गया। वहीं सभी पापोंको नाश करनेवाला कावेरी-संगम है जो मनुष्य उसे नहीं जानते, वे निःसंदेह ठगे
मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 801, कुल 1098 में से · BharatKosha