भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 802, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 802
७९२* मत्स्यपुराण *
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायीत मानवः।<br>कावेरी च महापुण्या नर्मदा च महानदी॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम्।<br>अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते॥ १४<br>अग्निप्रवेशं यः कुर्याद् यश्च कुर्यादनाशकम्।<br>अनिवर्त्या गतिस्तस्य यथा मे शंकोरोऽब्रवीत्॥ १५<br>सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडते दिवि रुद्रवत्।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः॥ १६<br>मोदते रुद्रलोकस्थो यत्र तत्रैव गच्छति।<br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १७<br>भोगवान् दानशीलश्च महाकुलसमुद्भवः।<br>तत्र पीत्वा जलं सम्यक् चान्द्रायणफलं लभेत्॥ १८<br>स्वर्गं गच्छन्ति ते मर्त्या ये पिबन्ति शुभं जलम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यत्फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>कावेरीसंगमे स्नात्वा तत्फलं तस्य जायते॥ १९<br>एवमादि तु राजेन्द्र कावेरीसंगमे महत्।<br>पुण्यं महत्फलं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्॥ २०गये। इसलिये मनुष्यको सब तरहसे प्रयत्न करके वहाँ स्नान करना चाहिये। राजेन्द्र! कावेरी और नर्मदा—ये दोनों अतिशय पुण्यशालिनी महानदी हैं। उसमें स्नानकर जो मनुष्य वृषभध्वज शिवकी पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य वहाँ अग्निमें प्रवेश करता है या जो उपवासपूर्वक निवास करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित गति प्राप्त होती है—ऐसा शंकरजीने मुझे बतलाया था। वह पुरुष स्वर्गलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंद्वारा सेवित होकर रुद्रके समान साठ करोड़ साठ हजार वर्षोंतक क्रीड़ा करता है एवं रुद्रलोकमें स्थित होकर आनन्दका भोग करता है तथा जहाँ चाहता है वहाँ चला जाता है। पुनः पुण्य क्षीण होनेपर वह भ्रष्ट होकर उत्तम कुलमें उत्पन्न, भोगवान्, दानशील और धार्मिक राजा होता है। इस संगममें जलका सम्यक् पानकर मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका फल प्राप्त करता है। जो मानव इसके पवित्र जलको पीते हैं, वे स्वर्गको चले जाते हैं। गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे कावेरीके संगममें स्नान करनेसे मिलता है। राजेन्द्र! इस तरह कावेरी और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे सभी पापोंका नाश करनेवाला अतिशय पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है॥ ९–२०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदाका माहात्म्यवर्णन नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८९॥


एक सौ नब्बेवाँ अध्याय

नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं योजनविस्तृतम्।<br>यन्त्रेश्वरेति विख्यातं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते।<br>पञ्च वर्षसहस्राणि क्रीडते कामरूपधृक्॥ २<br>गर्जनं च ततो गच्छेद् यत्र मेघचयोत्थितः।<br>इन्द्रजिन्नाम सम्प्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ३<br>मेघनादं ततो गच्छेद् यत्र मेघानुगर्जितम्।<br>मेघनादो गणस्तत्र परमां गणतां गतः॥ ४राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर एक योजन विस्तृत यन्त्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नानकर मानव देवताओंके साथ आनन्द मनाता है और इच्छानुसार रूप धारणकर पाँच हजार वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता है। वहाँ गर्जन नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघसमूह ऊपर उठते रहते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे मेघनादको इन्द्रजित् नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे मेघनाद जाना चाहिये, जहाँ मेघके गर्जनकी-सी ध्वनि होती रहती है। इसी स्थानपर मेघनाद-गण गणके श्रेष्ठ पदको प्राप्त किया था।
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