भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 803
* अध्याय १९० *७९३
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थमाम्रातकेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५<br>नर्मदोत्तरतीरे तु धारा तीर्थं तु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ६<br>सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा ये विचिन्तिताः।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम्॥ ७<br>तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ब्रह्मलोके महीयते॥ ८राजेन्द्र! इसके बाद आम्रातकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके उत्तर तटपर प्रसिद्ध धारातीर्थ है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य यदि पितरों और देवताओंका तर्पण करता है तो उसे मनोऽभिलषित कामनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। राजेन्द्र! इसके बाद ब्रह्मावर्त नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान रहते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है॥ १—८॥
ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलादानमाप्नुयात्॥ १०<br>गच्छेत् करञ्जतीर्थं तु देवर्षिगणसेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोलोकं समवाप्नुयात्॥ ११<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितो रुद्रस्तिष्ठते ह्युमया सह॥ १२<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र स वन्द्यस्त्रिदशैरपि।<br>पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र रुद्रलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्॥ १४<br>तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता।<br>तत्र प्राणपरित्यागाद् रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ १५<br>ततः पुष्करिणीं गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र हीन्द्रस्यार्थासनं लभेत्॥ १६वहाँ नियमपूर्वक संयत भोजन करता हुआ अङ्गारेश्वर जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है। राजेन्द्र! वहाँसे कपिला नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कपिला गौके दानका फल प्राप्त करता है। इसके बाद देवों और ऋषियोंसे सेवित करंज नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको गोलोककी प्राप्ति होती है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ कुण्डलेश्वर नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ उमाके साथ रुद्र सदा निवास करते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर वह देवताओंद्वारा भी वन्दनीय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सभी पापोंके नाशक पिप्पलेश-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! वहाँसे श्रेष्ठ विमलेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ महेश्वरद्वारा निर्मित एक देवशिला है। उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदुपरान्त पुष्करिणीतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे, वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही मानव इन्द्रका आधा आसन प्राप्त कर लेता है॥ ९—१६॥
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १७नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा रुद्रके शरीरसे निकली है, यह स्थावर और जंगम सभी जीवोंका उद्धार करती है।
सर्वदेवाधिदेवेन त्वीश्वरेण महात्मना।<br>कथिता ऋषिसंघेभ्यो ह्यस्माकं च विशेषतः॥ १८ऐसा सभी देवताओंके अधीश्वर महात्मा शंकरने स्वयं ऋषिगणको और विशेषकर मुझे बताया है।
मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।<br>रुद्रदेहाद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥ १९मुनियोंने इस श्रेष्ठ नर्मदा नदीकी स्तुति की है। यह नर्मदा संसारके हितकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है।