भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 885
  • अध्याय २१८ * ८७५

| सोमा पिण्डा निशा चैव तथा दग्धरुहा च या।<br>स्थले कमलिनी या च विशाली शङ्खमूलिका ॥ २४<br>चाण्डाली हस्तिमगधा गोऽजापर्णी करम्भिका।<br>रक्ता चैव महारक्ता तथा बर्हिशिखा च या॥ २५<br>कौशातकी नक्तमालं प्रियालं च सुलोचनी।<br>वारुणी वसुगन्धा च तथा वै गन्धनाकुली ॥ २६<br>ईश्वरी शिवगन्धा च श्यामला वंशनालिका।<br>जतुकाली महाश्वेता श्वेता च मधुयष्टिका ॥ २७<br>वज्रकः पारिभद्रश्च तथा वै सिन्धुवारकाः।<br>जीवानन्दा वसुच्छिद्रा नतनागरकण्टका ॥ २८<br>नालं जाली च जाती च तथा च वटपत्रिका।<br>कार्त्तस्वरं महानीला कुन्दुरुर्हंसपादिका ॥ २९<br>मण्डूकपर्णी वाराही द्वे तथा तण्डुलीयके।<br>सर्पाक्षी लवली ब्राह्मी विश्वरूपा सुखाकरा ॥ ३०<br>रुजापहा वृद्धितरी तथा चैव तु शल्यदा।<br>पत्रिका रोहिणी चैव रक्तमाला महौषधी ॥ ३१<br>तथामलकवृन्दाकं श्यामचित्रफला च या।<br>काकोली क्षीरकाकोली पीलुपर्णी तथैव च ॥ ३२<br>केशिनी वृश्चिकाली च महानागा शतावरी।<br>गरुडी च तथा वेगा जले कुमुदिनी तथा ॥ ३३<br>स्थले चोत्पलिनी या च महाभूमिलता च या।<br>उन्मादिनी सोमराजी सर्वरत्नानि पार्थिव ॥ ३४<br>विशेषान्मरकतादीनि कीटपक्षं विशेषतः।<br>जीवजाताश्च मणयः सर्वे धार्याः प्रयत्नतः ॥ ३५<br>रक्षोघ्नाश्च विषघ्नाश्च कृत्या वेतालनाशनाः।<br>विशेषान्नरनागाश्च गोखरोष्ट्रसमुद्भवाः ॥ ३६<br>सर्पतित्तिरगोमायुबभ्रुमण्डूकजाश्च ये।<br>सिंहव्याघ्रर्क्षमार्जारद्वीपिवानरसम्भवाः ।<br>कपिञ्जला गजा वाजिमहिषैषणभवाश्च ये॥ ३७<br>इत्येवमेतैः सकलैरुपेतै-<br>र्द्रव्यैः पराघ्यैः परिरक्षितः स्यात्।<br>राजा वसेत् तत्र गृहं सुशुभ्रं<br>गुणान्वितं लक्षणसम्प्रयुक्तम् ॥ ३८ | बला, मोचा, पटोलिका, सोमा, पिण्डा, निशा, दग्धरुहा, स्थलपद्म, विशाली, शंखमूलिका, चाण्डाली, हस्तिमगधा, गोपर्णी, अजापर्णी, करम्भिका, रक्ता, महारक्ता, बर्हिशिखा, कौशातकी, नक्तमाल, प्रियाल, सुलोचनी, वारुणी, वसुगन्धा, गन्धनाकुली, ईश्वरी, शिवगन्धा, श्यामला, वंशनालिका, जतुकाली, महाश्वेता, श्वेता, मधुयष्टिका, वज्रक, पारिभद्र, सिन्दुवारक, जीवानन्दा, वसुच्छिद्रा, नतनागर, कण्टकारि, नाल, जाली, जाती, वटपत्रिका, सुवर्ण, महानीला, कुन्दुरु, हंसपादिका, मण्डूकपर्णी, दोनों प्रकारकी वाराही, तण्डुलीयके, सर्पाक्षी (नकुलकंद), लवली, ब्राह्मी, विश्वरूपा, सुखाकरा, रुजापहा, वृद्धिकरी, शल्यदा, पत्रिका, रोहिणी, रक्तमाला, आमलक, वृन्दाक, श्यामा, चित्रफला, काकोली, क्षीरकाकोली, पीलुपर्णी, केशिनी, वृश्चिकाली, महानागा, शतावरी, गरुड़ी, वेगा, जलकुमुदिनी, स्थलोत्पल, महाभूमिलता, उन्मादिनी, सोमराजी, सभी प्रकारके रत्न—विशेषकर मरकत आदि बहुमूल्य रत्न, अनेक प्रकारकी कीटज मणियाँ, जीवोंसे उत्पन्न होनेवाली मणियाँ—इन सभीको प्रयत्नपूर्वक दुर्गमें संचित करे। इसी प्रकार राक्षस, विष, कृत्या, वैताल आदिकी नाशक—विशेषकर मनुष्य, सर्प, गौ, गर्दभ, ऊँट, साँप, तीतर, शृगाल, नेवला, मेढक, सिंह, बाघ, रीछ, बिलाव, गैंड़ा, वानर, कपिंजल, हस्ती, अश्व, महिष और हरिण आदि जीवोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपयोगी वस्तुओंका भी राजा संचय करे। इस प्रकार इन सभी बहुमूल्य पदार्थोंसे युक्त रहनेपर वह सुरक्षित रहता है। तब राजा उनमें बने हुए अत्यन्त निर्मल, उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न तथा गुणयुक्त भवनमें निवास करे॥ २०—३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽगदाध्यायो नामाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगदाध्याय नामक दो सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१८॥