मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २२० * | ८७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इन्द्रियैर्नापकृष्येत सतां मार्गात् सुदुर्गमात्।<br>गुणाधानमशक्यं तु यस्य कर्तुं स्वभावतः॥ ५<br>बन्धनं तस्य कर्तव्यं गुप्तदेशे सुखान्वितम्।<br>अविनीतं कुमारं हि कुलमाशु विशीर्यते॥ ६<br>अधिकारेषु सर्वेषु विनीतं विनियोजयेत्।<br>आदौ स्वल्पे ततः पश्चात् क्रमेणाथ महत्स्वपि॥ ७<br>मृगयापानमक्षांश्च वर्जयेत् पृथिवीपतिः।<br>एतांस्तु सेवमानास्तु विनष्टाः पृथिवीक्षितः॥ ८<br>बहवो नृपशार्दूल तेषां संख्या न विद्यते।<br>वृथाटनं दिवास्वप्नं विशेषेण विवर्जयेत्॥ ९<br>वाक्पारुष्यं न कर्तव्यं दण्डपारुष्यमेव च।<br>परोक्षनिन्दा च तथा वर्जनीया महीक्षिता॥ १० | इन्द्रियोंद्वारा अत्यन्त दुर्गम सत्पुरुषोंके मार्गसे अपकृष्ट न किया जा सके। जिस राजकुमारमें स्वभाववश गुणाधान करना अशक्य हो उसे गुप्तस्थानमें सुखपूर्वक अवरुद्ध कर देना चाहिये, क्योंकि उद्दण्ड राजकुमारसे युक्त कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। राजाको सभी अधिकारोंपर सुशिक्षित व्यक्तिको नियुक्त करना चाहिये। प्रथमतः उसे छोटे पदपर नियुक्त करे, तत्पश्चात् क्रमशः अधिक शिक्षितकर ऊँचे पदोंपर भी पहुँचा दे। राजसिंह! राजाको शिकार, मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ाका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि पूर्वकालमें इनके सेवनसे बहुत-से राजा नष्ट हो चुके हैं, जिनकी गणना नहीं कही जा सकती। राजाके लिये व्यर्थ घूमना तथा विशेषकर दिनमें शयन करना वर्जित है। राजाको कटुवचन बोलना और कठोर दण्ड देना—ये दोनों कर्म नहीं करना चाहिये। राजाको परोक्षमें किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है॥ १–१०॥ |
| अर्थस्य दूषणं राजा द्विप्रकारं विवर्जयेत्।<br>अर्थानां दूषणं चैकं तथार्थेषु च दूषणम्॥ ११<br>प्राकाराणां समुच्छेदो दुर्गादीनामसत्क्रिया।<br>अर्थानां दूषणं प्रोक्तं विप्रकीर्णत्वमेव च॥ १२<br>अदेशकाले यद्दानमपात्रे दानमेव च।<br>अर्थेषु दूषणं प्रोक्तमसत्कर्मप्रवर्तनम्॥ १३<br>कामः क्रोधो मदो मानो लोभो हर्षस्तथैव च।<br>एते वर्ज्याः प्रयत्नेन सादरं पृथिवीक्षिता॥ १४<br>एतेषां विजयं कृत्वा कार्यों भृत्यजयस्ततः।<br>कृत्वा भृत्यजयं राजा पौरान् जानपदान् जयेत्॥ १५<br>कृत्वा च विजयं तेषां शत्रून् बाह्यांस्ततो जयेत्।<br>बाह्याश्च विविधा ज्ञेयास्तुल्याभ्यन्तरकृत्रिमाः॥ १६<br>गुरुवस्ते यथापूर्वं तेषु यत्नपरो भवेत्।<br>पितृपैतामहं मित्रममित्रं च तथा रिपोः॥ १७<br>कृत्रिमं च महाभाग मित्रं त्रिविधमुच्यते।<br>तथापि च गुरुः पूर्वं भवेत् तत्रापि चादृतः॥ १८<br>स्वाम्यमात्यौ जनपदो दुर्गं दण्डस्तथैव च।<br>कोशो मित्रं च धर्मज्ञ सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते॥ १९<br>सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलं स्वामी प्रकीर्तितः।<br>तन्मूलत्वात् तथाङ्गानां स तु रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ २० | राजाको दो प्रकारके अर्थदोषोंसे बचना चाहिये—एक अर्थका दोष और दूसरा अर्थ-सम्बन्धी दोष। अपने दुर्गके परकोटोंका तथा मूलदुर्ग आदिकी उपेक्षा और अस्तव्यस्तता—ये अर्थके दोष कहे गये हैं। उसी प्रकार कुदेश और कुसमयमें दिया गया दान, कुपात्रको दिया गया दान और असत्कर्मका प्रचार—ये अर्थ-सम्बन्धी दोष कहे गये हैं। राजाको आदरसहित काम, क्रोध, मद, मान, लोभ तथा हर्षका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। राजाको इनपर विजय प्राप्त करनेके पश्चात् अनुचरोंको जीतना चाहिये। इस प्रकार अनुचरोंको जीतनेके बाद पुरवासियों और देशवासियोंको अपने अधिकारमें करे। उनको जीतनेके पश्चात् बाहरी शत्रुओंको परास्त करे। तुल्य, आभ्यन्तर और कृत्रिम-भेदसे बाह्य शत्रुओंको अनेकों प्रकारका समझना चाहिये। उनमेंसे क्रमशः एक-एकको बढ़कर समझना चाहिये और उनको जीतनेमें यत्नशील रहे। महाभाग! मित्र तीन प्रकारके होते हैं—प्रथम वे हैं जो पिता-पितामह आदिके कालसे मित्रताका व्यवहार करते चले आ रहे हैं। दूसरे वे हैं, जो शत्रुके शत्रु हैं तथा तीसरे वे हैं, जो किन्हीं कारणोंसे पीछे मित्र बनते हैं। इन तीनों मित्रोंमें प्रथम मित्र उत्तम होता है, उसका आदर करना चाहिये। धर्मज्ञ! स्वामी, मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना, कोश तथा मित्र—ये राज्यके सात अङ्ग कहे गये हैं। इस सप्ताङ्गयुक्त राज्यका भी मूल स्वयं राजा कहा गया है। राज्यका तथा राज्याङ्गोंका मूल होनेके कारण वह प्रयत्नपूर्वक रक्षणीय है॥ ११–२०॥ |