मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८९२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| किंचिद् देयं च विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।<br>अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामैर्विशुद्ध्यति॥ ३७<br><br>अन्नादिजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः।<br>फलपुष्पोद्गतानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ३८<br><br>कृष्टानामोषधीनां च जातानां च स्वयं वने।<br>वृथाच्छेदेन गच्छेत दिनमेकं पयोव्रती॥ ३९<br><br>एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम्।<br>स्तेयदोषापहर्तॄणां श्रूयतां व्रतमुत्तमम्॥ ४० | हड्डीवाले जानवरोंकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको कुछ दान देना चाहिये और जो बिना हड्डीके हैं उनकी हिंसा करनेपर प्राणायामसे शुद्धि हो जाती है। अन्नादिसे एवं रससे उत्पन्न होनेवाले तथा फलों और पुष्पोंमें पैदा होनेवाले जन्तुओंकी हिंसा करनेपर घृत-पान ही प्रायश्चित्त है। जुताईसे उत्पन्न हुई तथा वनमें स्वतः उगी हुई ओषधियोंको बिना आवश्यकताके काटनेपर एक दिनका दुग्धव्रत करना चाहिये। हिंसासे उत्पन्न हुआ पातक इन व्रतोंसे दूर किया जा सकता है। अब चोर-कर्मसे उत्पन्न हुए पापको दूर करनेके लिये उत्तम व्रत सुनिये॥ ३३—४०॥ |
| धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।<br>सजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुद्ध्यति॥ ४१<br><br>मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य तु।<br>कूपवापीजलानां तु शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्॥ ४२<br><br>द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।<br>चरेत् सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यविशुद्धये॥ ४३<br><br>भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य तु।<br>पुष्पमूलफलानां तु पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४४<br><br>तृणकाष्ठद्रुमाणां तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च।<br>चैलचर्मामिषाणां तु त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ४५<br><br>मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।<br>अयस्कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नभुक्॥ ४६<br><br>कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।<br>पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ४७<br><br>एतैर्व्रतैर्व्यपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।<br>अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्॥ ४८<br><br>गुरुतल्पव्रतं कुर्याद् रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।<br>सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च॥ ४९<br><br>पैतृष्वस्त्रीयभगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च।<br>भ्रातुर्दुहितरं चैव गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ५० | यदि ब्राह्मण अपनी जातिवालोंके घरसे इच्छापूर्वक धान्य, अन्न और धनकी चोरी करता है तो वह अर्धकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावलीके जलका हरण करनेपर शुद्धिके लिये चान्द्रायणव्रतका विधान है। दूसरेके घरसे थोड़ी मूल्यवाली वस्तुओंकी चोरी करनेपर उससे शुद्ध होनेके लिये कृच्छ्रसांतपन-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, वाहन, शय्या, आसन, पुष्प, मूल और फलकी चोरी करनेपर उसका प्रायश्चित्त पञ्चगव्य-पान है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड, वस्त्र, चमड़ा तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये। मणि, मोती, प्रवाल, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनोंतक अन्नके कणोंका भोजन करना चाहिये। सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र, दो तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, सुगन्धित द्रव्य, ओषधि तथा रस्सीकी चोरी करनेपर तीन दिनतक केवल जल पीकर रहना चाहिये। ब्राह्मणको इन व्रतोंद्वारा चोरीसे उत्पन्न हुए पापका निवारण करना चाहिये। अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेसे उत्पन्न हुए पापको इन व्रतोंद्वारा नष्ट करना चाहिये। अपनी जातिकी परायी स्त्रीके साथ समागम करके गुरुतल्प-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये अर्थात् गुरुकी स्त्रीके साथ समागम करनेपर जो प्रायश्चित्त कहा गया है, उसका अनुष्ठान करना चाहिये। मित्र तथा पुत्रकी स्त्री, कुमारी कन्या, नीच जातिकी स्त्री (चाण्डाली), फुफेरी तथा मौसेरी बहन और भाईकी कन्याके साथ समागम करनेपर चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४१—५०॥ |