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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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होती है कि उन सभी को किसी एक की रचना मान लेने मे संदेह होता ही है। अस्तु, विद्वानो ने संशय की कि बागडोर ढीली कर दी। मीराँ के पदो, उनके सम्बन्ध मे प्रसिद्ध कथाओ और जनश्रुतियो पर संदेह करते-करते एक प्रतिष्ठित विद्वान् ने स्वय मीराँ के नाम पर भी संदेह प्रकट किया। उनका कहना है कि मीराँबाई मीराँ के नाम से प्रसिद्ध पदो की गायिका का नाम नही था, परन्तु संतो द्वारा दी गयी उनकी उपाधि मात्र थी। संशय ज्ञानोपलब्धि के लिए एक उपयोगी साधन है, परंतु संशय की भी एक सीमा होनी चाहिए। केवल संशय के लिए संशय का कोई महत्व नही। • परंतु संदेह करना तो सरल है, उसका समाधान ढूंढ निकालना उतना सरल नही। विशेष रूप से मीराँ के पदो के सम्बन्ध मे यह कठिनाई और भी अधिक है। मीराँ के पद लिखे नही गए थे, वे गाए गए थे। मीराँ भक्त थी, उन्होने भक्ति-भावना के आवेग मे अपने गिरधर नागर की मूर्ति के सामने, अथवा मार्ग पर चलते हुए अथवा वृन्दावन और द्वारका के मंदिरो मे अथवा साधु संतो और महात्माओ के समागम के समय उनके सामने अपने पदो का गान किया था और वे गीत मौखिक परम्परा से बहुत दिनो तक जनता मे प्रसिद्ध रहे। सूर, कबीर, रैदास तथा अन्य संतो और महात्माओ ने भी अपने पद और छंद गाए थे, लिखा नही था, परंतु उन महात्माओ के शिष्य और सम्प्रदाय वालो ने उन्हीके जीवन काल मे अथवा उनकी मृत्यु के कुछ ही समय उपरांत उनकी रचनाओ को लिपिबद्ध कर लिया था जिससे उनकी रचनाओ की प्रामाणिकता बहुत कुछ जाँची जा सकती है। परंतु मीराँ का किसी सम्प्रदाय विशेष से सम्बंध नही था, उनकी शिष्य-परम्परा थी ही नही और संतान तथा कुटुम्बी भी उनके नहीं थे, इसी कारण उनकी रचनाएँ बहुत दिनो तक लिपिबद्ध नही हो सकी, केवल मौखिक परम्परा से ही उनका प्रचलन होता रहा। दूर दूर तक भक्तमंडली में मीराँ के पदो का प्रचार था। राजस्थान, ब्रज और गुजरात मे तो उनके पद गाए ही जाते थे; पंजाब, महाराष्ट्र तथा सुदूर बंगाल मे भी मीराँ के पद बडे चाव से सुने और गाए जाते थे। लिपिबद्धता के अभाव और अपेक्षाकृत सुदूर प्रांतो तक प्रसिद्धि और प्रचार के कारण मीराँ के पदो की किस सीमा तक कायापलट हुई होगी, इसका अनुमान लगाना कुछ कठिन नही है।