मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंच तन जाउ, मन जाउ, देव गुरुजन जाउ, प्रान किन जाउ टेक टरति न टारी हौ। वृन्दाबनवारी बनवारी की मुकुट वारी, . पीतपट वारी वहि मूरति पै वारी हौ। इन सब उल्लेखो से जान पडता है कि नाभादास, ध्रुवदास और देवकवि को मीराँ के जिन पदो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था उनमे अधिकांश पदौ• मे पीताम्बरधारी रसिक-शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण की ब्रजलीला का वर्णन गोपी-भाव से किया गया था। इससे यह नही कहा जा सकता कि मीराँ ने केवल कृष्ण-लीला का ही गान किया, सत-परम्परा की रचनाएँ मीराँ ने नही की अथवा नाथ-सम्प्रदाय के प्रभाव से जोगी वाले पद मीराँ के रचित नही हैं। परतु इससे यह तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि मीराँ की प्रसिद्धि जिन पदो से हुई थी, मीराँ की जो विशिष्टतम रचनाएँ हैं, मीराँ की जिन रचनाओ की दूर-दूर तक प्रसिद्धि थी, वे रचनाएँ माधुर्य-भाव की भक्ति-से पूर्ण भगवान कृष्ण की ब्रज-लीला के गान थे। इसीलिए तो मैं मीराँ के कृष्णलीला-सम्बधी तथा माधुर्य भाव के अभिव्यक्ति वाले विरह पदो को मीराँ की सर्वाधिक प्रामाणिक रचना मानता हूँ।] मीराँ के सम्बध मे प्रसिद्ध कुछ जनश्रुतियो से भी यह स्पष्ट है कि मीराँ अपने प्रौढ वय और अतिम काल मे गिरधर नागर भगवान कृष्ण की लीलाओ का गान माधुर्य-भाव से करती थी। वृन्दावन मे जीव गुसाई (अथवा रूप गोस्वामी) को फटकार और मिलन वाली जनश्रुति से मीराँ के माधुर्य-भाव की स्वीकृति मिलती है और द्वारका मे रणछोड जी के मदिर मे मूर्ति के सामने नाचते-गाते भगवान कृष्ण की मूर्ति मे विलीन होने की जनश्रुति से भी मीराँ के माधुर्य-भाव और कृष्ण-लीला के पद-गान की ही स्वीकृति मिलती है। उपर्युक्त जनश्रुतियाँ चाहे सत्य न भी हो फिर भी इसमे तो कोई सदेह नही है कि साधारण भक्त जनता मीराँ को इसी रूप मे मानती चली आ रही है। [मीराँ माधुर्य- . भाव के भक्ति की प्रतीक हैं; अस्तु, विषय और भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से कृष्णलीला के माधुर्य-भाव से पूर्ण पद ही मीराँ की सर्वाधिक प्रामाणिक रचनाएँ मानी जा सकती है।]