मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
च तन जाउ, मन जाउ, देव गुरुजन जाउ, प्रान किन जाउ टेक टरति न टारी हौ। वृन्दाबनवारी बनवारी की मुकुट वारी, . पीतपट वारी वहि मूरति पै वारी हौ। इन सब उल्लेखो से जान पडता है कि नाभादास, ध्रुवदास और देवकवि को मीराँ के जिन पदो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था उनमे अधिकांश पदौ• मे पीताम्बरधारी रसिक-शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण की ब्रजलीला का वर्णन गोपी-भाव से किया गया था। इससे यह नही कहा जा सकता कि मीराँ ने केवल कृष्ण-लीला का ही गान किया, सत-परम्परा की रचनाएँ मीराँ ने नही की अथवा नाथ-सम्प्रदाय के प्रभाव से जोगी वाले पद मीराँ के रचित नही हैं। परतु इससे यह तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि मीराँ की प्रसिद्धि जिन पदो से हुई थी, मीराँ की जो विशिष्टतम रचनाएँ हैं, मीराँ की जिन रचनाओ की दूर-दूर तक प्रसिद्धि थी, वे रचनाएँ माधुर्य-भाव की भक्ति-से पूर्ण भगवान कृष्ण की ब्रज-लीला के गान थे। इसीलिए तो मैं मीराँ के कृष्णलीला-सम्बधी तथा माधुर्य भाव के अभिव्यक्ति वाले विरह पदो को मीराँ की सर्वाधिक प्रामाणिक रचना मानता हूँ।] मीराँ के सम्बध मे प्रसिद्ध कुछ जनश्रुतियो से भी यह स्पष्ट है कि मीराँ अपने प्रौढ वय और अतिम काल मे गिरधर नागर भगवान कृष्ण की लीलाओ का गान माधुर्य-भाव से करती थी। वृन्दावन मे जीव गुसाई (अथवा रूप गोस्वामी) को फटकार और मिलन वाली जनश्रुति से मीराँ के माधुर्य-भाव की स्वीकृति मिलती है और द्वारका मे रणछोड जी के मदिर मे मूर्ति के सामने नाचते-गाते भगवान कृष्ण की मूर्ति मे विलीन होने की जनश्रुति से भी मीराँ के माधुर्य-भाव और कृष्ण-लीला के पद-गान की ही स्वीकृति मिलती है। उपर्युक्त जनश्रुतियाँ चाहे सत्य न भी हो फिर भी इसमे तो कोई सदेह नही है कि साधारण भक्त जनता मीराँ को इसी रूप मे मानती चली आ रही है। [मीराँ माधुर्य- . भाव के भक्ति की प्रतीक हैं; अस्तु, विषय और भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से कृष्णलीला के माधुर्य-भाव से पूर्ण पद ही मीराँ की सर्वाधिक प्रामाणिक रचनाएँ मानी जा सकती है।]
छ० इसके विपरीत [प्राचीन किसी उल्लेख मे मीराँ के संत-परम्परा तथा नाथ-सम्प्रदाय के योगियो से प्रभावित होने की बात नही मिलती ।] [जनश्रुतियो मे भी केवल एक जनश्रुति मीराँ को रैदास की शिष्या प्रमाणित करती है।] नाथ सम्प्रदाय के जोगियो के सम्बंध मे किसी भी जनश्रुति मे स्पष्ट उल्लेख नही मिलता । फिर भी यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि मीराँ की वे रचनाएँ जिनपर सत-परम्परा और नाथ-परम्परा का प्रभाव स्पष्ट है, उनकी प्रामाणिक रचनाएँ नही हैं । परतु [इतना तो निर्विवाद रूप से स्वीकार करना पड़ेगा कि मीराँ की माधुर्य-भाव की अभिव्यक्ति और कृष्णलीला के पद अपेक्षाकृत सर्वाधिक प्रामाणिक हैं।] प्रस्तुत पुस्तक मे मीराँ के सरस पदो से एकात रुचि रखने वाली श्रीमती पद्मावती देवी जी 'शबनम' ने बडे लगन और परिश्रम से काफी दौड़-धूप कर सैकडो नए पद ढूंढ निकाले है । मीराँ के साहित्य का अध्ययन उनका रुचिकर विषय है और उनके पदो का प्रामाणिक सग्रह प्रस्तुत करना उनकी चिर अभिलषित वस्तु रही है। मुझे पाडुलिपि रूप मे समस्त पदो के देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। मुझे बडी प्रसन्नता है कि देवीजी ने केवल पदो का सग्रह ही नही किया है, भाषा और भाव की दृष्टि से उनका सुचारु रूप से वर्गीकरण भी कर दिया है और राजस्थानी के भाव स्पष्ट करने के लिए फुटनोट मे कुछ कठिन शब्दो का अर्थ भी दे दिया है। विशिष्ट पदो पर टिप्पणियाँ देकर सुयोग्य लेखिका न अपने गहन अध्ययन का परिचय दिया है जिससे पाठक अवश्य ही लाभान्वित होगे। प्रस्तुत पुस्तक मे कुछ पदो के आठ-आठ दश-दश पाठातर दिए गए है। इतने अधिक पाठातर इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि मौखिक परम्परा से चलनेवाले पदो मे गानेवाले किस प्रकार परिवर्तन करते चलते हैं। कभी कभी गाने वाले को केवल भाव की ही स्मृति रहती है और वे उस भाव को अपनी रुचि के अनुसार नए शब्दो का परिधान प्रदान करते है, कभी किसी दूसरे पद के कुछ चरण अन्य पदो मे जुड जाया करते हैं और कभी शब्द तो वही रहते है, परंतु राग और भाव मे ही परिवर्तन हो जाते हैं। इस प्रकार के पदो को किसी एक ही पद का पाठातर माना- जाय अथवा उनमे से कुछ पद स्वतंत्र मान लिए जायें—इसके लिए कोई
ञ नियम स्थिरं करना बहुत कठिन है। यह भी सम्भव है कि स्वय मीराँ ने ही एक ही भाव के कई पद कई स्थानो और अवसरो पर गाए होगे। फिर भी पाठांतर रूप मे देने से उनके तुलनात्मक अध्ययन मे सुविधा होगी, इसमें कोई सदेह नही हैं। प्रस्तुत पुस्तक मे देवी जी ने मीराँ के अध्येताओ के लिए बडी मूल्यवान सामग्री दी है जिसके" लिए उन्हे जितना भी साधुवाद दिया जाय थोडा है। मुझे आशा है कि इसी प्रकार वे हिन्दी पाठको के लिए अध्ययन और मनन की सामग्री देती रहेंगी। दुर्गाकुंड, काशी, फाल्गुन कृष्ण द्वितीया, } श्रीकृष्ण लाल सं० २००८
प्राक्कथन 'मीराँ-बृहत्-पद-संग्रह' जैसे नाम से ही पुस्तक का विषय स्पष्ट है। मीराँ के पदो के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके है तथापि ऐसा कोई संग्रह प्राप्त नही जिस मे मीराँ के नाम पर प्रचलित प्राय सभी पद और उसके पाठान्तर भी प्राप्त हो सके। अपनी प्रथम पुस्तक, 'मीराँ, एक अध्ययन' लिखते हुए मुझ को एक ऐसे बृहत्-संग्रह की आवश्यकता प्रतीत हुई अत प्रस्तुत पुस्तक उपस्थित कर के मै ने एक प्रयास किया है। प्रकाशित व अप्रकाशित संग्रहों व मौखिक परम्परा से प्राप्त पद और उन के पाठान्तरो का संग्रह कर मीराँ के नाम पर प्रचलित सभी पदो को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है तथापि बहुत सम्भव है कि कुछ पद फिर भी छूट गये हो। [अद्यावधि प्राप्त मीराँ का जीवन-वृत्तान्त सुनिश्चित इतिहास की पुष्टता को प्राप्त नही कर सका। भक्त-गाथाओ के रूप मे प्राप्त प्राचीन-साहित्य- से भी इस ओर कोई स्पष्ट प्रकाश नही पडता। प्राप्त पदो मे भी कोई स्पष्ट उल्लेख नही मिलता। इतना ही नही, प्राप्त पदो मे अधिकांश की प्रामाणिकता असदिग्ध नही। उपर्युक्त परिस्थितियो मे किसी भी एक आधार पर सर्वथा निर्भर नही किया जा सकता। सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री की समन्वयात्मक विवेचना ही सत्य के सर्वाधिक निकट पड सकती है।] [प्राप्त सामग्री मे भक्त-गाथाएँ महत्वपूर्ण बहिसाक्ष्य सिद्ध होती है। भक्तो की रचनाओ मे सर्व-प्रथम उल्लेख नाभादास कृत 'भक्तमाल' मे मिलता है। नाभादास मीराँ के सुदृढ भक्ति-भाव की भूरि-भूरि प्रशसा करते है तथापि जीवन-वृत्त पर कोई प्रकाश नही डालते। महाकवि देव भी नाभादास का ही अनुसरण करते है। प्रियादास कृत 'भक्तमाल' की टीका और ध्रुवदास रचित 'भक्तनामावली' मे मीराँ का उल्लेख है। ये दोनो ही उल्लेख जनश्रुतियो पर आधारित है अत इन पर भी सर्वथा निर्भर नही किया जा सकता। प्रियादास कृत टीका से मीराँ के विवाह तक उनके माता और पिता दोनो के ही जीवित रहने का प्रमाण मिलता है। मीराँ की बृन्दावन यात्रा का सर्व-प्रथम उल्लेख भी ध्रुवदास मे ही मिलता है। रघुराजसिंह कृत 'भक्तमाल' मे भी मीराँ का उल्लेख मिलता है। यह ग्रथ भी
३ प्रियादास कृत 'भक्तमाल' मे प्राप्त जनश्रुतियो का एक विस्तृत सग्रह ही है। भक्त-गाथाओ मे अन्य महत्वपूर्ण ग्रथ 'चौरासी' और 'दो सौ बावन वैष्णवण की वार्ताएँ' है। इन ग्रथो की प्रामाणिकता ही सर्वथा सदिग्ध हैं, तिस पर ये साम्प्रदायिक ग्रथ भी है। इतना ही नही, दोनो ग्रथो मे प्राप्त उल्लेख परस्पर विरोधात्मक भी है। ऐसी स्थिति मे इनको भी निश्चित प्रमाण स्वरूप उपस्थित नही किया जा सकता। मीराँ का सम्बन्ध राजस्थान के दो विख्यात राजकुलो से था अत मीराँ के जीवन-वृत्त को एक सुदृढ रूपरेखा देने के लिये राजस्थान का इतिहास भी अपेक्षित है। राजस्थान का इतिहास लिखते हुए कर्नल टाड ने मीराँ के जीवन- वृत्तान्त पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार करने का सर्व-प्रथम प्रयास किया। कर्नल टाड द्वारा हुए इस प्रयास के पूर्व मीराँ का प्राप्त जीवन- वृत्त अलौकिक गाथाओ से परिपूर्ण एक अतिरजित पौराणिक कथा मात्र था। यत्किचित प्राप्त प्रमाण और जनश्रुतियो के आधार पर कर्नल टाड ने मीराँ को राणा कुम्भ की रानी सिद्ध किया। 'एनाल्स एन्ड एन्टीक्वी- टीस आफ राजस्थान' देखने से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि मीराँ के पिता कौन थे इसका निर्णय वे स्वय भी न कर सके। कर्नल टाड के मतानुसार मीराँ को राणा कुम्भ की रानी मानने पर समय की सगति के आधार पर राव दूदा को ही मीराँ के पिता मानना युक्तियुक्त होता है। प्राप्त पदाभिव्यक्तियाँ इसका समर्थन भी करती है। कर्नल टाड के मत का खण्डन सर्व-प्रथम स्ट्रैटन ने अपनी पुस्तक 'मेवार एन्ड इट्स फेमिलीस' मे किया परन्तु वे भी कोई निश्चित प्रमाण नही देते। तदपश्चात् मुशी देवीप्रसाद ने कर्नल टाड का खण्डन करते हुए मीराँ को राव रत्नसिह की पुत्री और महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज की विधवा सिद्ध करने का प्रयास किया। मुशी जी का यह प्रयास भी अपूर्ण व भ्रमाच्छादित ही सिद्ध होता है। मुंशी जी लिखित 'मीराँबाई का जीवन और उनका काव्य' देखने से ही यह निश्चित हो जाता है कि मुंशी जी स्वय भी सशय मे ही थे। मुंशी जी ने महकमे तवारीख, मेवाड, से प्राप्त दो विभिन्न समाचारो के आधार पर ही चलने का प्रयास किया। प्राप्त दोनो समाचार विरोधात्मक है। अत सर्व- प्रथम उनका आधार ही भ्रमात्मक सिद्ध हो जाता है। इसी तरह मीराँ
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द्वारा किये गये विष-पान की कथा भी भ्रमजनक रूप से ही दी गई है। विष-पान से मीराँ की मृत्यु हो जाने, और मरतेमरते मीराँ का विष लाने वाले मुसाहिब को श्राप देने की कथा भी देते हैं। मीराँ के इस श्राप से उस मुसाहिब के वंश मे आज तक भी धन और जन की एक ही साथ वृद्धि न होने की चर्चा भी करते हैं। तब भी, इस के बाद ही विष-पान जैसी अप्रिय घटना के कारण राव बीरमदेव द्वारा मीराँ को बुला लिये जाने की चर्चा भी करते हैं। मीराँ द्वारा की गई तीर्थ-यात्राओ की भी चर्चा करते हैं। उनके मतानुसार सम्भवत मीराँ ने दो बार तीर्थ-यात्रा की थी। पहली बार गृह-त्याग के पूर्व और दूसरी बार गृह-त्याग के बाद। दूसरी बार भी वे सम्भवत वृन्दावन होती हुई ही द्वारिका जाती हैं। भूरिदान भाट के कथन के आधार पर वे मीराँ का मृत्यु संवत् १६०३ मानते हैं। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचना से मुंशीजी के कथन की अपूर्णता सिद्ध हो जाती है। फिर भी अन्य सामग्री के नितान्त अभाव के कारण प्राय सभी आधुनिक विद्वानो ने मुंशी जी के मतको ही आधार माना। इस आधार पर अपनी अपनी विवेचना के अनुसार घटना-क्रम के सवतो मे कुछ अन्तर पड़ता है। कुछ विद्वान मीराँ का जन्म वि० १५५५ स० मानते हैं तो अन्य वि० १५६० स०। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मीराँ का मृत्यु संवत् वि० १६३० स० तक खीच ले जाते हैं। वे भी मेवाड के राजघराने से प्राप्त सामग्री को ही अपने कथन का आधार बताते हैं। गुजराती साहित्यकारो ने कर्नल टाड का ही समर्थन किया है। बगाल की जनश्रुति व कलाकार-वर्ग भी कर्नल टाड का समर्थन करते हुए मीराँ को राणा कुम्भ की रानी व राव दूदा जी की पुत्री मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकारो ने भी अपने अपने विभिन्न ग्रन्थो मे मुंशी जी का ही समर्थन किया। अद्यावधि प्राप्त राजस्थान का इतिहास भी अपूर्ण ही है। [कविराजा श्यामलदास कृत 'वीर-विनोद', स्व० विद्वान ओझा जी लिखित 'उदयपुर राज्य का इतिहास' और श्री हरिविलास सारडा लिखित महाराणा सांगा मे, प्राप्त विभिन्न उद्धरण परस्पर विरोधात्मक ही हैं।] [मीराँ-स्मृति-ग्रंथ' की भूमिका लिखते हुए श्री रामप्रसाद त्रिपाठी लिखते हैं, “मीराँ का विवाह राणा सांगा के किसी राजकुमार से हुआ। ओझा जी का अनुमान है कि - • उसका नाम भोजराज था।” अत सहज ही सशय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।]
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उपर्युक्त स्थिति मे पदो से व्यक्त होती भावनाओ और घटनाओ का महत्व विशेष रूपेण बढ जाता है। इस बढी हुई महत्ता के कारण पदो की प्रामाणिकता पर भी विचार कर लेना सर्व-प्रथम आवश्यक हो जाता है। तथाकथित मीराँ के पदो के सकलन का एकमात्र आधार गेय परम्परा ही रही है। मात्र राजस्थान मे ही नही अपितु, समस्त उत्तर भारत मे ही ये पद विशेष जन-प्रिय हुए। अस्तु, कही कोई नवीन पद या पदाश मीराँ के नाम पर झल पडा तो कही मीराँ के पद ही विशेष परिवर्तनो के साथ चल पडे। अत प्रामाणिक पदो को छाँट लेना असम्भव नही तो भी अत्यन्त दुरूह कार्य अवश्य ही हो गया है। पदो की हस्तलिखित प्रति के सर्वथा अभाव मे इस कार्य की दुरूहता अपनी चरम सीमा को पहुँच गयी। फिर भी भाव और भाषा के आधार पर वर्गीकरण करने से कुछ पदो को निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त कहना सम्भव हो सकता है। शेष पदो की प्रामाणिकता असदिग्ध नही तथापि कोई ऐसा सूत्र भी प्राप्त नही जिस के आधार पर हम उन को सुनिश्चित रूपेण प्रेक्षिप्त या प्रामाणिक कह सके। वस्तुत मेरी प्रथम पुस्तक 'मीराँ, एक अध्ययन' ही इस पुस्तक की पृष्ठभूमि है फिर भी प्रस्तुत सग्रह मे किये गये पदो के वर्गीकरण के आधार का एक सक्षिप्त परिचय अप्रासगिक न होगा। तथाकथित मीराँ के पदो को भाव के आधार पर प्रमुखत दो भागो मे बाँटा जा सकता है। कुछ पद ऐसे है जिन से व्यक्त होती भावनाओ और घटनाओ से जीवन- वृत्त पर एक हल्का सा प्रकाश पडता है। ऐसे पद जीवन-खड के अन्तर्गत रखे गये है। अन्य पदो से व्यक्त होती भावनाओ से विभिन्न धार्मिक मतमतान्तरो का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है। ऐसे पद उपासना-खड के अन्तर्गत रखे गये है। जीवन-खड के अन्तर्गत आनेवाले पदो से भी जीवन-वृत्तान्त पर कोई प्रत्यक्ष प्रकाश नही पडता अपितु व्यक्त भावनाओ के आधार पर कुछ घटनाओ व स्थिति का आभास मिलता है। गेय-परम्परा से प्राप्त इन पदो से व्यक्त होती घटनाओ को ज्यो-का-त्यो मान लेना भ्रमात्मक ही सिद्ध होगा अत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर इन घटनाओ की विवेचना आवश्यक हो जाती है। इस विवेचना के लिये प्राप्त पदो को भावाभि- व्यक्ति के आधार पर विभिन्न वर्गों मे बाँट देना आवश्यक है। ऐसे पदो की श्रेणी मे सर्व-प्रथम आने वाले पद वे है जिन मे मीराँ और
परिवार व समाज के बीच हुए गहरे मतभेद की अभिव्यक्ति मिलती है। परिजनो और मीराँ के बीच हुए गहरे मतभेद और सघर्ष की अभिव्यक्ति नाभादास मे भी मिलती है। अन्य भक्त-गाथाओ व प्राप्त इतिहास मे भी इसका समर्थन मिलता है। समाज मे निन्दा होने के कारण परिवार- वालो ने मीराँ के साधु-समागर्म का गहरा विरोध किया। पदो से व्यक्त होती इस भावना को इतिहास व भक्त-कथाओ का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। ऐसे पद लगभग सभी कथोपकथन और वर्णनात्मक शैली मे प्राप्त है। अधिकांश पदो मे दोनो ही शैलियो का सम्मिश्रण हुआ है। भावावेश मे अपने उद्गारो को गा उठने वाली मीराँ द्वारा इन उपर्युक्त शैलियो मे रचना अयुक्त ही प्रतीत होती है। इन पदाभिव्यक्तियो से स्पष्ट हो जाता है कि यह कथनोपकथन मीराँ व माँ, ननद ऊदाँ बाई, सास और किसी राणा के बीच हुआ है। अद्यावधि मीराँ की माता का उनकी छोटी वयस मे ही निधन हो जाना मान्य है। प्रियादास कृत 'भक्तमाल' की टीका व अन्य उद्धरणो' के आधार पर भी पदो से व्यक्त होने वाले इस पहलू को सर्वथा अमान्य नही कहा जा सकता । ननद ऊदाँ बाई या सास के बारे मे भी वर्तमान इतिहास कोई सुनिश्चित हल नही दे पाता है। इसी तरह यह भी सुस्पष्ट नही हो पाता कि पदो मे वर्णित यह राणा कौन थे। पदाभिव्यक्ति के आधार पर यह राणा मीराँ के पति ही सिद्ध होते है। कुछ पदो ( स० ५) मे तो राणा के साथ हुए विवाह का विशद वर्णन भी है। इतना ही नही विभिन्न पदाभिव्यक्तियो से यह भी सुस्पष्ट हो जाता है कि इस विवाह कार्य को मीराँ की अनिच्छा और कठिन विरोध की अवहेलना कर सम्पन्न किया जाता है। प्राप्त इतिहास बताता है कि गृह-प्रवेश के साथ ही साथ मीराँ का अन्य परिवारवालो से देवी-पूजा के प्रश्न को लेकर विरोध हो गया था। राजस्थानी प्रथानुसार गृह-प्रवेश के अवसर पर देवी-पूजा का कोई प्रसग ही नही उठता। अस्तु बहुत सम्भव है कि विवाह के प्रति उदासीनता की कथावस्तु ही काला- न्तर मे देवी-पूजा के प्रति उदासीनता की कथा मे परिवर्तित हो गई हो। “लाजै कुम्भा जी रो वैसणो” जैसी कुछ पदाभिव्यक्ति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पदो मे वर्णित ये राणा सम्भवत मीराँ के पति राणा कुम्भ ही थे। “लाजै दूदा जी रो वैसणो” जैसी अभिव्यक्ति देखे, 'मीराँ, एक अध्ययन'—मातापिता
६ से भी इस ओर कुछ प्रकाश पडता है। दूदा जी की पुत्री का राणा कुम्भ के साथ ब्याहा जाना समय के दृष्टिकोण से असगत भी नही ठहरता। यहाँ एक और पहलू भी विशेष विचारणीय है। राजस्थान और बगाल की जनश्रुतियाँ मीराँ को सधवा ही प्रमाणित करती है परन्तु ऐसो क्षेत्रो मे जहाँ मीराँ के साहित्य का प्रचार पिछले कुछ वर्षो मे हुआ है, जनश्रुति मीराँ को विधवा ही मानती है। मीराँ के जीवन का प्रमुख भाग राजस्थान मे व्यतीत हुआ अत वहाँ की जनश्रुति तुलनात्मक दृष्टिकोण से अधिक मान्य है। मीराँ की ख्याति राजस्थान के बाहर बगाल मे ही सर्व-प्रथम फैली, यहाँ तक कि बगाल मे 'भजन' शब्द ही मीराँ के पदो के लिये रूढिरूप हो गया। अत राजस्थान के बाद बगाल की जनश्रुति को ही विशेष महत्व दिया जा सकता है। इन दोनो ही जनश्रुतियो से मीराँ विधवा सिद्ध नही होती। विभिन्न स्थलो पर एक ही रूप मे चलने वाली जनश्रुति नितान्त निराधार हो, ऐसा सम्भव नही प्रतीत होता। भक्त-गाथाओ के आधार पर भी मीराँ का वैधव्य कही से भी लक्षित नही होता। अस्तु, अद्यावधि मान्य इतिहास की अपूर्णता को देखते प्राय सभी पदो से व्यक्त होती उपर्युक्त भावना को कोरी जनश्रुति कह कर कदापि टाला नही जा सकता। ऐसी कुछ पदाभिव्यक्तियो मे मीराँ के दृढ भक्ति-भाव की भूरि-भूरि प्रशसा भी मिलती है। स्पष्ट ही है कि ऐसी भक्तिमती नारी द्वारा स्वय अपनी प्रशसा असगत ही है। फिर ऐसे पदो की क्रिया तृतीय-पुरुष वाचक है। इस से भी यही लक्षित होता है कि ऐसे पद किसी अन्य की रचना है। मतभेद द्योतक अधिकाश पद राजस्थानी भाषा मे ही प्राप्त है। कुछ पद ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे और कुछ थोडे से शुद्ध ब्रजभाषा मे भी मिलते है। मतभेद द्योतक पदो मे अधिकाश का राजस्थानी मे पाया जाना सगत भी है। इन राजस्थानी मे प्राप्त पदो की अभिव्यक्ति पर सतमत का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जब कि ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो पर वैष्णव-प्रभाव ही अधिक स्पष्ट है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदो पर दोनो ही मतो का प्रभाव है। भाषा के परिवर्तन के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति मे आया यह गहरा परिवर्तन विशेष विचारणीय है। प्राप्त पदाभिव्यक्तियो से ही यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि यह मतभेद शीघ्र ही कटु सघर्ष मे परिवर्तित हो गया। "ताला चौकी" बिठा कर मीराँ को महलो की सीमा मे बाँध रखने का निष्फल प्रयास बार बार
७ किया गया। "जहर पियाला", "साँप पिटारा", "सूल सेज" आदि के द्वारा मीराँ की हत्या का षडयन्त्र भी किया गया। उपर्युक्त प्रयासो में निष्फल क्रुद्ध राणा ने स्वय ही मीराँ को "खड्ग" के पार उतारने का प्रयास किया। इन अप्रिय घटनाओ के कारण असन्तुष्ट हो मीराँ स्वय ही एक दिन पति- गृह त्याग कर अपने पीहर चली जाने को उद्यत होती है। यहाँ पदाभि- व्यक्तियाँ विरोधात्मक है। कुछ पदाभिव्यक्तियो से मीराँ का अपने पीहर मेडते पहुँच कर तीर्थ-हेतु जाना सिद्ध होता है, तो अन्य पदाभिव्यक्तियो से बीच रास्ते से ही तीर्थ की ओर मुड जाना सिद्ध होता है। अधिकांश पदाभि- व्यक्तियाँ प्रथम मान्यता का ही समर्थन करती है। पति-गृह से असतुष्ट हो कर मीराँ का पितृ-गृह जाना और कालान्तर मे तीर्थ-हेतु प्रस्थान, मान्य इतिहास का एक सुनिश्चित पहलू है। इतना ही नही प्राप्त इतिहास का यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सब विद्वान् एकमत है और इतिहास व पदाभिव्यक्तियो मे भी गहरा सामञ्जस्य है। इस गहरे साम्य के बावजूद भी इस तीर्थयात्रा के लक्ष्य को लेकर दोनो मे गहरा विरोध है। पदाभिव्यक्तियो के आधार पर जहाँ मीराँ का पितृ-गृह त्याग कर सीधे द्वारिका जाना सिद्ध होता है, वहाँ प्राप्त वृत्तान्त द्वारा मीराँ का वृन्दावन होते हुए द्वारिका जाना ही मान्य है। "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पेलॉ पोखर जाय" (पद स० १, पाठान्तर २) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पुष्कर न्हावा जाय" (पद स० ७) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पूठ दयी चितौड" जैसी अभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ द्वारा की गयी तीर्थ-यात्रा का मार्ग निर्धारित किया जा सकता है। ध्रुवदास रचित 'भक्त नामावली' मे ही मीराँ की वृन्दावन-यात्रा का सर्व-प्रथम उल्लेख है। मुशी देवीप्रसाद भी इस विषय मे अनिश्चित ही है। इतना ही नही, उनके मतानुसार मीराँ ने सम्भवत दो बार तीर्थ-यात्रा की थी। घटना और समय के क्रमानुसार विचार करने पर मीराँ द्वारा की गई वृन्दावन-यात्रा असम्भव ही सिद्ध होती है। "इन सरवरिया री पाल" जैसे पदो से उपर्युक्त घटना पर और भी प्रकाश पडता है। ऐसी पदाभिव्यक्तियो से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि सम्पूर्ण राजसी ठाट को छोड कर मीराँ अकेली ही "सरवर के पाल" खडी है। गृह-त्याग कर "पेलॉ पोखर" या "पुष्कर न्हाने" जाने जैसी उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो से लक्षित होनेवाले तीर्थ-यात्रा का मार्ग निर्देश और घटना-क्रम का सामञ्जस्य भी ठीक बैठ जाता है। गृह-त्याग
' ८ के बाद मीराँ की मानसिक स्थिति अत्यन्त करुण हो उठी है। "भर भर धोबा धोये नैन, साधॉ रो सग जोवति" मीराँ "आमण दूमणी" हो उठी हैं। अपने दृढ भक्ति-भाव और समर्पण के बाद भी सतत महल-निवासिनी मीराँ का अपने को नितान्त एकाकिनी पाकर क्षणिक आकुलता का अनुभव करना असंगत भी नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि प्राप्त वृत्तान्त और प्राप्त पदो मे सामञ्जस्य की एक कडी सिद्ध होने वाले इन पदो से व्यक्त होती अन्य भावनाओ और घटनाओ का पक्षपात विहीन विश्लेषण इतिहास की सुदृढ रूपरेखा बनाने मे सफल हो सके। विभिन्न अलौकिक गाथाओ का वर्णन भी इन सघर्ष द्योतक पदो का एक प्रधान अग है। राणा द्वारा मीराँ तक "जहर पियाला" भेजे जाने की कथा प्राय सर्वत्र ही मिलती है। पदाभिव्यक्तियो और प्राप्त सामग्री के आधार पर भी यह सुनिश्चित हो जाता है कि मीराँ के साधु-समागम के कारण फैलती बदनामी के कारण राणा ने मीराँ तक "जहर पियाला" भेजने मे ही अपना कल्याण समझा। अत कुछ लोगो के मतानुसार अपने एक मुँहलगे मुसाहिब के द्वारा और अन्य कुछ किम्बदन्तियो के अनुसार अपनी बहन ऊदाँ बाई के द्वारा यह "पियाला" मीराँ तक पहुँचा दिया जाता है। पदाभिव्यक्तियो से यह प्रकट होता है कि ननद ऊदाँ इस "पियाले" के रहस्य को जानती थी और कई बार मीराँ को इससे आगाह भी कर चुकी थी। नाभादास मे भी मीराँ को बन्धुजन द्वारा दिये गये विष की चर्चा मिलती है। इस विष- पान का प्रभाव मीराँ पर क्या पडा, यह सर्वथा अनिश्चित ही है। मुंशीजी भी दोनो ही मान्यताओ का उल्लेख करते है। एक मान्यता के अनुसार मीराँ की मृत्यु हो जाती है और मरते मरते वे विष लानेवाले राणा के मुँहलगे मुसाहिब को श्राप देती है, जिस के कारण आज तक भी उस मुसाहिब के वश मे धन और जन की वृद्धि एक साथ नही हो पाती। दूसरी मान्यता के अनुसार मीराँ किसी रहस्यमय तरीके से बच जाती है और जब उनके पितृव्य बीरमदेव को इस अप्रिय घटना का पता चलता है तो मीराँ को लिवा ले जाते है। परन्तु यहाँ भी साधु-समागम मे गहरी रोक-टोक है। अत एक दिन मीराँ दोनो ही कुलो और सम्पूर्ण राज वैभव को "तजि बटुक की नाई" चली जाती हैं अपने आराध्य के आश्रय मे। अस्तु, यही सम्भव प्रतीत होता है कि मीराँ ने अपने जीवन की किसी घटना का विष-पान के रूपक मे वर्णन किया हो और नाभादास ने भी
उसकी चर्चा ठीक उसी रूप मे कर दी हो और कालान्तर मे कवि-हृदय का यह सत्य ही जनश्रुतियो मे वस्तुत 'सत्य बन गया हो । जो भी हो, यह तो निश्चित है कि विष-पान की जनश्रुति अन्य जनश्रुंतियो से बहुत पुरानी है क्योकि नाभादास मे भी इस की चर्चा मिलती है। "सूल सेज" और "साँप पिटूरा" भेजे जाने की अथवा "खड्ग" से हत्या के प्रयास की जनश्रुतियो का वर्णन रघुराजसिंह कृत 'भक्तनामावली' मे भी प्राप्त नही होता। अत यह सिद्ध हो जाता है कि इन का प्रचलन बहुत बाद मे हुआ है। फिर, एक ही कथा के कई विभिन्न रूप भी पाये जाते है। अत उनकी प्रामाणिकता और भी संदिग्ध है। उदाहरणार्थ "साँप पिटारा" की कथा है। यह साँप कही "सालिगराम की बटिया" मे, कही "चन्दन हार" मे और कही "मोतीडारो हारो" मे भी परिणतित हो जाता है। इन उपर्युक्त कथाओ के द्योतक कुछ इने-गिने पद वर्णनात्मक शैली मे ही प्राप्त है। अस्तु, ऐसी कथाओ को मीराँ के प्रति भक्तो की अतिरजित श्रद्धांजलि मात्र ही कहा जा सकता है। अभिव्यक्ति के आधार पर अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होनेवाले ये सघर्ष द्योतक सभी पद राजस्थानी मे ही प्राप्त है। उपर्युक्त विभिन्न समूहो मे यही एक ऐसा समूह है जिसके पद केवल राजस्थानी मे ही प्राप्त है। इन प्राप्त पदो मे कुछ पद तो ठेठ पुरानी राजस्थानी मे प्राप्त है और शेष पदो की भाषा आधुनिक राजस्थानी है। मतभेद और सघर्ष द्योतक लगभग सभी पद वर्णनात्मक और कथो- पकथन की मिश्रित शैलियो मे प्राप्त है। शैली के आधार पर ये पद नौटकियो के पद्यबद्ध वार्तालाप कहे जा सकते हैं। पारस्परिक वार्तालाप के बीच- बीच मे कथा-वस्तु का वर्णन नौटकियो के लिये आवश्यक भी सिद्ध होता है। नौटकियो और रामलीला आदि करने वालो मे ऐसी परम्परा प्रचलित भी है। अपनी पुस्तक 'मीराँ बाई' मे पृष्ठ ११ पर डा० श्री कृष्णलाल लिखते है, "मध्य- कालीन भारत मे प्रमुख भक्तो और महापुरुषो की स्मृति अनेक गीतो, कथा-वार्ताओ और प्रसगो तथा रूपको द्वारा जीवित रखी जाती थी। कवि और गायक गीतो और पदो मे उन महात्माओ की कीर्त्ति गाते फिरते थे। वृद्धगण उनके सबन्ध मे अनेक कथा और प्रसग उत्सुक श्रोताओ को सुनाते रहते थे और संगीत अथवा छंदबद्ध वार्तालापो मे उनके जीवन के प्रमुख प्रसग रूपको के रूप मे प्रदर्शित किए जाते थे।" अस्तु, उपर्युक्त श्रेणी के पद
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अपने प्रचलित रूप मे तो प्रमाणिक कदापि नही माने जा सकते हैं। तब भी, सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री मे सामञ्जस्य की एक कड़ी सिद्ध होनेवाले इन पदों की अभिव्यक्ति की सर्वथा अवहेलना भी नही की जा सकती । एक मध्य-मार्ग को अपना कर ही इस गम्भीर समस्या का हल निकाला जा सकता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्राप्त पदाभिव्यक्तियो और प्राप्त सामग्री की मनोवैज्ञानिक आलोचना ही प्रस्तुत समस्या का एकमात्र हल हो सकती है।
- यहाँ, प्रचलित जनश्रुतियो पर विचार कर लेना भी अप्रासंगिक न होगा। ऐतिहासिक जनश्रुतियो का नितान्त निराधार रूपेण चल पडना सम्भव नही प्रतीत होता। सूक्ष्मातिसूक्ष्म आधार को कल्पना और भावना के आधार पर अतिरजित और अलौकिक बनाया जा सकता है, परन्तु आधार के नितान्त अभाव में ऐसा सम्भव नही प्रतीत होता, विशेषत जब विभिन्न पदाभिव्यक्तियो मे कथा एक ही रूप मे मिलती हो। मीराँ की यात्राओ का मार्ग-निर्देश करने वाली विभिन्न पदाभिव्यक्तियो से एक ही तथ्य प्रकट होता है । इतना ही नही, प्राप्त भक्त-गाथाएँ, पदाभिव्यक्तियाँ और जनश्रुतियो का सम्मिश्रण ही हमारे मान्य इतिहास का एक महत्वपूर्ण आधार है। अस्तु, इतिहास की सुदृढ रूपरेखा तय्यार करने के लिये सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री की समन्वयात्मक आलोचना अत्यावश्यक हो जाती है। प्राप्त पदो मे सर्वाधिक सख्या ऐसे पदो की है जिनकी अभिव्यक्ति वियोगात्मक है। ऐसे कुछ पदो मे सघर्ष की भी अभिव्यक्ति मिलती है परन्तु अधिकाश पदो से मात्र वियोग ही.लक्षित होता है। वियोग की यह अभिव्यक्ति अधिकांश सघर्ष-द्योतक पदो मे भी मिलती है। अत प्रस्तुत पुस्तक मे मतभेद द्योतक पदो के बाद ही वियोग द्योतक पद और तब संघर्ष द्योतक पद रखे गये हैं, परन्तु प्रस्तुत विवेचना मे इस क्रम को बदल कर सघर्ष द्योतक पदो की चर्चा पहले ही कर दी गई है क्योकि उपर्युक्त दोनो भावाभिव्यक्ति द्योतक पदो की विवेचना के कई पहलू सर्वथा एक है और शेष मे भी गहरा साम्य है। सघर्ष द्योतक पदो मे प्राप्त वियोगाभिव्यक्तियो मे वह भाव-गाम्भीर्य नही जो वियोग द्योतक पदाभिव्यक्तियो की विशेषता है। ऐसी पदा- भिव्यक्तियो से विरह-व्याकुला नारी की सुरुचिपूर्ण भोजन, भवन और शृङ्गारादि के प्रति गहरी उदासीनता ही लक्षित होती है। नौटकियो की शैली मे प्राप्त पदो मे भाव-गाम्भीर्य ही कृत्रिम सिद्ध होता ।
११ वियोग द्योतक पदो मे "दरद की मारी" नारी की करुण. आतुरता का अति गम्भीर व सुन्दर चित्र खीचा गया है। अन्य भक्त-कवियो मे भी विरहाभिव्यक्ति मिलती है। वैष्णव-साहित्य राधा-कृष्ण के 'प्रेम' और वियोग के गीतो से परिपूर्ण है तो सत-साहित्य भी इसं वियोगाभिव्यक्ति. से रिक्त नही। "राम की बहुरिया" बने हुए कबीर• की वियोगाभिव्यक्ति कही कही नारी हृदय की सहज वियोगाभिव्यक्ति के समकक्ष आ जाती है। इतने पर भी, "सूनी सेज न कोई" या "तेरा साँइयाँ तुझ मे" जैसी भावनाओ का एक अन्त श्रोत सतत् लक्षित होता रहता है। मीराँ की विरहाभिव्यक्ति इन दोनो से ही सर्वथा भिन्न पडती है। यहाँ न तो वैष्णव साहित्य की अतिशयोक्ति है न सत-साहित्य का तत्व-चिन्तन। यहाँ तो केवल एक ऐसा दर्द है जिसको कोई नही जानता और शायद जान भी नही सकता। मीराँ स्वय ही कहती है — "दरद की मारी मै बन बन डोलूँ, मेरो दरद न जाने कोय। घायल की गति घायलया जाने, की जिन लाई होय।" "को विरहणी को दुख जाणे .हो। जा घट विरहा सोई लखि है, कै कोई हरिजन मानै हो।" यह दर्द भी सम्पूर्ण मानव-भावनाओ से ओतप्रोत है ? इस मे खीज है, उपालम्भ है, मनावन है और है आत्म-समर्पण, जो सर्वोपरि है। मीराँ के आँसू गोकुल मे बाढ नही लाते अपितु वे भी "मोतियन की माल" बन जाते है, शायद आराध्य की पूजा हेतु ही। विरहाकुला गोपियाँ मधुबन को आराध्य के वियोग मे भी हरा भरा रहने के लिये धिक्कारती है परन्तु मीराँ स्वय अपने कठिन हृदय को ही धिक्कारती है जो आराध्य के वियोग मे अब तक भी फट नही गया — "पिड माँ सू प्राण पापी, निकस क्यूँ नही जात।" परन्तु यहाँ भी कितनी बडी विवशता है। आराध्य के दर्शनो के लोभ मे ही प्राण अब भी अटके हुए है -- "सावण आवण कहि गया रे, हरि आवण की आस। रैन अधेरी बीज चमकै, तारा गिणत निरास। लेई कटारी कठ सारूँ, मरूँगी जहर विष खाई। मीराँ दासी राम राती, लालच रही ललचाइ।" मीराँ द्वारा की गई इस गम्भीर विरहाभिव्यक्तियो मे किसी व्यक्तिगत
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दाम्पत्य, सम्बन्ध को व्यक्त करने वाला अन्त श्रोत पुन पुन लक्षित हो उठता है। अस्तु, श्री परशुराम 'जी चतुर्वेदी के शब्दो मे कहा जा सकता हे कि “मीराँबाई के इष्टदेव सगुण व साकार श्रीकृष्ण थे ।"१ वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, पजाबी और खडी-बोली आदि विभिन्न बोलियो मे प्राप्त है। ॰राजस्थानी और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदो की अभि- व्यक्ति लगभग एक ही सी पडती है। ये अभिव्यक्तियाँ हृदय-गत भावनाओ के छद-अलंकार-विहीन शुद्धतम चित्र है। इनकी अभिव्यक्ति मे एक तडप है, एक टीस है। अधिकांश पदो मे अपने इष्टदेव से शीघ्रातिशीघ्र दर्शन देने के लिये अति करुण प्रार्थना की गई है। ऐसे कुछ पदो पर नाथ- पथ का हल्का-सा प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो पर सतमत का भी प्रभाव मिलता है। ऐसे कुछ पदो मे गुरु की चर्चा मिलती हे। एक पद मे मीराँ अपने गुरु का नाम रैदास बताती हे। ब्रजभाषा मे प्राप्त पद साहित्यिक सौन्दर्य का विशेष रूपेण सृजन करते है। यहाँ तक कि कुछ पद तो सूरदास के पदो से भी ॰ होड लेते से प्रतीत होते है। ऐसे अधिकांश पदो मे पौराणिक गाथाओ का ही वर्णन है। हिन्दी की अपूर्व गायिका मीराँ की महत्ता एक कवयित्री के रूप मे नही अपितु एक भक्तिमती नारी के रूप मे ही है। हृदय-गत भावनाओ की सहज सरल अभिव्यक्ति के कारण ही ये पद इतने अधिक जन-प्रिय हो सके है। मीराँ का वृन्दावन-गमन और निवास बहु-मान्य होते हुए भी असदिग्ध नही। प्राप्त सामग्री मे घटना और समय के क्रमो मे असम्बद्धता स्पष्ट ही है। शास्त्रीय शिक्षा का सुअवसर भी मीराँ को प्राप्त हुआ हो, ऐसा भी प्राप्त सामग्री से स्पष्ट नही होता। अस्तु, विशुद्ध ब्रजभाषा मे उच्चकोटि के ये कुछ पद प्रामाणिक रूपेण मीराँ की रचना हो या न हो, पर हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि निस्सदेह ही है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदो की अभिव्यक्तियो मे विरोधाभास और पूर्वापर सबध का अभाव है। इन मे वह भाव-गाम्भीर्य भी नही जो मीराँ के पदो की विशेषता है। पजाबी मे दो और खडी बोली में एक पद प्राप्त है। इनकी अभिव्यक्ति भी बहुत हल्की पडती है। १ 'मीराँ-स्मृति-ग्रंथ'-'सतमत और मीराँ' पृ० ४६३।
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मिलन जनित आनन्द को व्यक्त करने वाले कुछ पद उपर्युक्त सभी भाषाओ मे प्राप्त हैं। इनमे से अधिकांश ब्रजभाषा मे ही है। “बहोत दिनों की जोवती, बिरहिन पिव पाया जी” जैसी पदाभिव्यक्ति ही इन पदो की विशेषता है। ऐसे कुछ पदो से वैष्णव मत का प्रभाव सुस्पष्ट है शेष से सतमत का प्रभाव ही व्यक्त होता है तथापि उमडते हुए आनन्द की सहज अभिव्यक्ति ही इनकी विशेषता है। शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा मे प्राप्त सतमत से प्रभावित इन पदो की प्रमाणिकता विशेष-विचारणीय है। आराध्य के प्रति एक गहरा समर्पण ही मीराँ की विशेषता है। ऐसे अनुभूति-द्योतक कुछ थोडे से पद प्राप्त होते हैं। राजस्थानी मे ऐसे दो पद प्राप्त हैं जिनमे एक, “मीराँ रग लाग्यो हरि” की प्रामाणिकता विशेष विचारणीय है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त दोनो पदो की प्रामाणिकता भी असदिग्ध नही। ब्रजभाषा मे प्राप्त पदो की कुछ अपनी विशेषताएँ भी हैं। इनकी अभिव्यक्ति के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि मीराँ को समाज और स्वजनों से गहरी लाछना ही मिली थी तथापि किसी एक वर्ग से गहरा समर्थन और सम्मान भी मिला था। “कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनाँसी। कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रसी।” लोक-निन्दा और पारिवारिक कटुता की सर्वथा अवहेलना करते हुए अपने निर्धारित मार्ग पर दृढ रहने की अभिव्यक्ति ही इन पदो की दूसरी विशेषता है। अवधी और गुजराती मे भी समर्पण द्योतक कुछ पद प्राप्त होते हैं परन्तु भाव और भाषा के आधार पर इनकी प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध ही प्रतीत होती है। इन विभिन्न भाषाओ मे प्राप्त समर्पण-द्योतक अधिकांश पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ऐसे अधिकांश पदो मे “मीराँ के प्रभु गिरधर नागर” जैसी टेक-परम्परा “यूँ कहै मीराँ बाई”, “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा” आदि विभिन्न प्रयोगो मे परिवर्तित हो गई है। कुछ पदो मे यह परम्परा 'मीरा दासी', 'दासी मीरा', 'मीरा दास' और 'जन मीराँ' मे भी परिवर्तित हो गई है। ऐसे पद अन्य सभी प्राप्त पदो से सर्वथा भिन्न पडते हैं। इन पदाभिव्यक्तियो से मीराँ के जीवन पर बहुमुखी प्रकाश पडता है। ऐसी अभिव्यक्तियो से विभिन्न घटना-क्रम के
१८ साथ ही साथ विभिन्न धार्मिक मतो का प्रभाव भी स्पष्ट हो जाता है। ऐसे पदो मे सर्वाधिक सख्या उन पदो की है जिनकी अभिव्यक्ति वियोगात्मक है और जो नाथ-पथ से विशेष प्रभावित हैं। विशेषत इन्ही पदाभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ के इष्टदेव “सगुण व साकार” प्रतीत होते हैं। राजस्थानी मे प्राप्त ‘दासी’ ओर ‘जन्’ छाप युक्त अधिकांश पदो मे विरहाकुला नारी की आराध्य से शीघ्र दर्शन देने की आतुर प्रार्थना है। ऐसे अधिकांश पदो पर विभिन्न धार्मिक मतमतान्तरो का कोई विशेष प्रभाव नही दीखता तथापि एक पद (स २८३) से सतमत का और कुछ पदो से विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। पद स० २८४ ही एक ऐसा पद हैं जिसमे रणछोड जी का वर्णन हुआ है। • ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदाभिव्यक्ति भी वियोग-द्योतक ही है। इन पदो पर पौराणिक गाथा और नाथ-पथ का समान रूपेण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ब्रजभाषा मे प्राप्त ऐसे पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव है। इन पदाभिव्यक्तियो से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ख्याति फैलने के बाद परिवारवालो से मीराँ को सम्मान मिला। “कुल कुटुम्बी आन बैठे, मनहुँ मधुमासी। दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी।” यह एक विशेष विचारणीय पहलू है। अन्य कुछ पदो से आनन्द और दृढ भक्ति-भाव भी लक्षित होता है। कुछ पदो पर पौराणिक गाथाओ का भी प्रभाव मिलता है परन्तु ऐसे पदो मे भाव-गाम्भीर्य नही है। गुजराती मे प्राप्त पदो मे पौराणिक गाथाओ के साथ ही निर्वेद की भी अभिव्यक्ति मिलती हैं। पजाबी मे एक ही पद प्राप्त होता है जिसकी भी प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। ‘दास’ और ‘जन’ प्रयोग की परम्परा अन्य भक्त-कवियो में भी प्राप्त होती है। एच० एच० विल्सन के मतानुसार दक्षिण भारत मे ‘मीराँ दासी’ सम्प्रदाय की स्थापना हुई थी। श्री नटवर नडियाल भी अपनी पुस्तक मे इस सम्प्रदाय की कुछ चर्चा करते हैं। अन्यत्र कही कोई ऐसा स्पष्ट उल्लेख नही मिलता जिसके आधार पर इस सम्प्रदाय का इतिहास जाना जा सके। • हिन्दी जगत् मे मीराँ सर्व-प्रथम एक भक्तिमती नारी के ही रूप मे आँती है। इनके नाम पर प्रचलित विभिन्न पदो से विभिन्न धार्मिक
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भावनाओ का प्रभाव सुस्पष्ट होता है। विक्रम की १५, १६ और. १७वी शताब्दियो का युग विभिन्न धार्मिक भावनाओ से आलोडित एक अपूर्व युग था। इस युग मे प्रस्फुटित होती प्रेरणा ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित पौराणिक युग-धर्म व इनकी रूढियो को एक गहरी चुनौती थी। इस युग मे एकेश्वरवाद के शुष्क सिद्धान्तो और प्रचलित कर्मकाण्ड का सर्वथा खण्डन करने वाली एक अद्भुत व अभूतपूर्व धार्मिक प्रवृत्ति का उदय हुआ । यह प्रवृत्ति मानव-हृदय की रस-सिक्त सहज भावनाओ के अधिक निकट पडी । नवीन उदित होने वाली इस प्रवृत्ति मे तत्व-चिन्तन और आत्मज्ञान के शुष्क सिद्धान्तो के प्रति गहरी उदासीनता थी तो ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित कर्म-काण्ड मे भी कोई आस्था नही थी। इतना ही नही, बौद्धो की सेवा, दया और जीव-मात्र के प्रति प्रेम के सिद्धान्तो से भी पूर्ण सतोष न था। व्यक्तिगत हृदय की प्रवृत्तियाँ ही इस नवीन धर्म की नीव थी। यह धर्म व्यक्ति का धर्म था। आराध्य के प्रति एकान्त समर्पण ही इसकी विशेषता थी। इसी धर्म को पडितो ने भक्ति-धर्म की सज्ञा प्रदान की। इस भक्ति- धर्म का उद्गम कब और कहाँ हुआ, यह निश्चित रूपेण नही कहा जा सकता यद्यपि श्रीमद्भागवत् मे ही इसका सर्व-प्रथम स्पष्ट उल्लेख मिलता है। गीता मे प्रतिपादित भक्ति-धर्म मे और जन-समुदाय में प्रसारित भक्ति धर्म के मूल सिद्धान्तो मे ही गहरा अन्तर है। गीतानुमोदित भक्ति-मार्ग मे ज्ञान और कर्म भी सर्वथा अपेक्षित है परन्तु जनता मे प्रचलित इस धर्म मे नारद के भक्ति-सूत्र तथा भागवत के अनुकूल विशुद्ध भावमय मार्ग ही अपेक्षित है। पूर्ण शान्ति और पूर्ण आनन्द की प्राप्ति ही इसका लक्ष्य था। जनता मे इस धर्म को प्रसारित करने का श्रेय दक्षिण भारत के वैष्णव गायक-कवि अलवारो को प्राप्त है। “जाँति पाँति पूछे नही कोई, हरि को भजै सो हरि का होई” जैसी भावना को जन्म इन्ही अलवार साधको से मिला। ये स्वय जाति-बहिष्कृत थे और शूद्रो व जाति-बहिष्कृतो को भी उपदेश देते थे। इन अलवार कवियो के सुमधुर गान से प्रस्फुटित होने वाली इस विशुद्ध भक्ति-भावना ने कालान्तर मे पडितो और विचारको को भी प्रभावित किया। फलत हृदयगत भावनाओ से उद्भासित इस धर्म का भी एक शास्त्र बन गया। विभिन्न यम-नियम और दार्शनिक सिद्धान्तो के आधार पर एक गहरा वितण्डावाद खडा हो गया जो भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रामानुज इस आन्दोलन के प्रमुख आचार्य थे।
१६ क्रमश - यह आन्दोलन दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर प्रसारित होने लगा। उत्तर भारत मे इसके अग्रगण्य नेता थे रामानन्द, जिन्होने काशी को अपना क्षेत्र बनाया। “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाये रामानन्द। प्रकट करी कबीर ने, सप्त दीप नौ खंड।” उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होते हुए इस नवीन आन्दोलन के प्रभाव से स्वजस्थान भी अछूता न रह सका। राजस्थान मे प्रत्येक प्रचलित धर्म को राजाश्रय प्राप्त हुआ तथा विचार-स्वातन्त्र्य का पूर्ण अनुमोदन हुआ। फलत. एकलिंग और भवानी के उपासक गणा-परिवार मे भी महाराणा कुम्भ वैष्णव भक्ति के रग मे रग कर राधा-कृष्ण के प्रेम-गीत गा उठे तो दूसरी ओर “अकबर के गर्व दलनहार और चितोड के जोद्धार" वीर श्रेष्ठ जयमल भी परम वैष्णव सुविख्यात हुए। चितौड की महाराणी झाली ने भी रामानन्द के शिष्य कबीर के गुरुभाई चर्मकार रैदास को अपना गुरु स्वीकार करने मे गौरव का ही अनुभव किया। राजस्थान, इस युग मे प्रवाहित होनेवाली इन तीनो ही विभिन्न धाराओ का सगमराज बना हुआ था। अस्तु, मीराँ की रचना पर भी तीनो ही विभिन्न धाराओ का प्रभाव 'का पाया जाना स्वाभाविक ही सिद्ध होता है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि मीराँ अपने युग की प्रतिनिधि कवयित्री थी। प्राप्त पदो मे तीनो धाराएँ इतनी स्पष्ट हैं कि इनको बड़ी सरलता से छाँटा जा सकता है। कृष्ण-भक्ति के कारण ही मीराँ की सर्वाधिक ख्याति हुई। अत वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो पर ही सर्व-प्रथम विचार कर लेना उचित होगा। वैष्णव-परम्परा से प्रभावित पदो को भी दो विभिन्न प्रभेदो मे विभक्त किया जा सकता है। प्रथम समूह उन पदो का है जिनसे निर्वेद की भावना झलकती है। इनमे ससार के सुख और सम्बन्धो को मोह जनित और नश्वर मान कर उनकी ओर से एक गहरी उदासीनता और परमात्मा के शरणा- गत होने पर ही पूर्ण शान्ति और आनन्द की प्राप्ति सम्भव होने की ही अभिव्यक्ति मिलती है। ये पदाभिव्यक्तियाँ अधिकांशतः उपदेशात्मक है। कुछ पदों पर विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव भी मिलता है। ऐसे पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती और खडी बोली मे भी पाये जाते हैं। इन पदो मे से अधिकांश की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। खड़ीबोली मे प्राप्त पदो को भाषा के आधार पर निश्चित-
१७ रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदं भी भाव और भाषा के आधार पर प्रामाणिक नही प्रतीत होते हैं। राजस्थानी और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त अधिकांश पदो मे पूर्वापर सबंध का और अर्थ-सगति का सर्वथा अभाव है। अस्तु, ऐसे अधिकांश पदो को तो प्राप्त रूप मे प्रामाणिक मान लेना सगत नही सिद्ध होता। वैष्णव परम्परा से प्रभावित अन्य पदो पर पौराणिक गाथाओ का का विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पदो के बाद सर्वाधिक सख्या इन्ही पदो की हे। इनमे भी बहुसख्यक पद राधा- कृष्ण की प्रेम-लीला और बाँसुरी-वर्णन के ही हैं। इसी वर्ग के पद सर्वाधिक विभिन्न प्रान्तीय बोलियो मे भी प्राप्त है। राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, अवधी, भोजपुरी आदि बोलियाँ इन पदो की भाषा है। निर्वेदाभिव्यक्ति द्योतक पदो की तरह ही इन मे भी अधिकांश मे पूर्वापर सबंध और अर्थ-सगति का अभाव है। अत बहुत सम्भव है कि इनमे से अधिकांश पद प्रामाणिक न हो। 'मीर माधो', 'रैदास' आदि अन्य भक्त कवियो के पद भी मीराँ के नाम पर चल पडे है। सर्वाधिक सख्या मे 'चन्द्रसखी' के पद ही मीराँ के पदो से मिल कर मीराँ के ही नाम पर चल पडे हे। राजस्थान के इस जन-प्रिय कवि का साहित्य और वृतान्त दोनो ही गहरे अन्धकार मे है। मीराँ के पदो की तरह इनके सकलन का भी एकमात्र आधार लोक-गीत ही है। लोक-गीतो की यह परम्परा भी बडे वेग से लुप्त हो रही है। अत समय रहते ही सकलन हो जाने की अत्यधिक आवश्यकता है। प्रस्तुत सग्रह को तय्यार करने के प्रसग मे ही 'चन्द्रसखी' के कुछ पदो को सकलित करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ये लगभग सौ पद हैं। इन प्राप्त पदो से 'चन्द्रसखी' के व्यक्तित्व या जीवन-वृतान्त पर कोई प्रकाश नही पडता। ऐसी भी एक मान्यता है कि सम्भवत मीराँ ने ही इस उपनाम से रचना की परन्तु ऐसी मान्यता का कोई आधार नही। 'चन्द्रसखी' नामक यह भक्त कौन थे और कब हुए थे यह जानने का कोई भी सूत्र अद्यावधि उपलब्ध नही। इनकी प्रामाणिक रचनाओ को भी छाँट लेने का भी कोई आधार नही। जो भी हो, प्राप्त पदो के आधार पर इतना तो निश्चित- रूपेण ही कहा जा सकता है कि 'चन्द्रसखी' और मीराँ के कुछ पदो मे भाव और भाषा का गहरा साम्य है। इतना ही नही, कुछ पद तो एक दूसरे