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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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दाम्पत्य, सम्बन्ध को व्यक्त करने वाला अन्त श्रोत पुन पुन लक्षित हो उठता है। अस्तु, श्री परशुराम 'जी चतुर्वेदी के शब्दो मे कहा जा सकता हे कि “मीराँबाई के इष्टदेव सगुण व साकार श्रीकृष्ण थे ।"१ वियोगाभिव्यक्ति द्योतक पद राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, ब्रज, गुजराती, पजाबी और खडी-बोली आदि विभिन्न बोलियो मे प्राप्त है। ॰राजस्थानी और ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदो की अभि- व्यक्ति लगभग एक ही सी पडती है। ये अभिव्यक्तियाँ हृदय-गत भावनाओ के छद-अलंकार-विहीन शुद्धतम चित्र है। इनकी अभिव्यक्ति मे एक तडप है, एक टीस है। अधिकांश पदो मे अपने इष्टदेव से शीघ्रातिशीघ्र दर्शन देने के लिये अति करुण प्रार्थना की गई है। ऐसे कुछ पदो पर नाथ- पथ का हल्का-सा प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो पर सतमत का भी प्रभाव मिलता है। ऐसे कुछ पदो मे गुरु की चर्चा मिलती हे। एक पद मे मीराँ अपने गुरु का नाम रैदास बताती हे। ब्रजभाषा मे प्राप्त पद साहित्यिक सौन्दर्य का विशेष रूपेण सृजन करते है। यहाँ तक कि कुछ पद तो सूरदास के पदो से भी ॰ होड लेते से प्रतीत होते है। ऐसे अधिकांश पदो मे पौराणिक गाथाओ का ही वर्णन है। हिन्दी की अपूर्व गायिका मीराँ की महत्ता एक कवयित्री के रूप मे नही अपितु एक भक्तिमती नारी के रूप मे ही है। हृदय-गत भावनाओ की सहज सरल अभिव्यक्ति के कारण ही ये पद इतने अधिक जन-प्रिय हो सके है। मीराँ का वृन्दावन-गमन और निवास बहु-मान्य होते हुए भी असदिग्ध नही। प्राप्त सामग्री मे घटना और समय के क्रमो मे असम्बद्धता स्पष्ट ही है। शास्त्रीय शिक्षा का सुअवसर भी मीराँ को प्राप्त हुआ हो, ऐसा भी प्राप्त सामग्री से स्पष्ट नही होता। अस्तु, विशुद्ध ब्रजभाषा मे उच्चकोटि के ये कुछ पद प्रामाणिक रूपेण मीराँ की रचना हो या न हो, पर हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि निस्सदेह ही है। गुजराती मे प्राप्त अधिकांश पदो की अभिव्यक्तियो मे विरोधाभास और पूर्वापर सबध का अभाव है। इन मे वह भाव-गाम्भीर्य भी नही जो मीराँ के पदो की विशेषता है। पजाबी मे दो और खडी बोली में एक पद प्राप्त है। इनकी अभिव्यक्ति भी बहुत हल्की पडती है। १ 'मीराँ-स्मृति-ग्रंथ'-'सतमत और मीराँ' पृ० ४६३।