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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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११ वियोग द्योतक पदो मे "दरद की मारी" नारी की करुण. आतुरता का अति गम्भीर व सुन्दर चित्र खीचा गया है। अन्य भक्त-कवियो मे भी विरहाभिव्यक्ति मिलती है। वैष्णव-साहित्य राधा-कृष्ण के 'प्रेम' और वियोग के गीतो से परिपूर्ण है तो सत-साहित्य भी इसं वियोगाभिव्यक्ति. से रिक्त नही। "राम की बहुरिया" बने हुए कबीर• की वियोगाभिव्यक्ति कही कही नारी हृदय की सहज वियोगाभिव्यक्ति के समकक्ष आ जाती है। इतने पर भी, "सूनी सेज न कोई" या "तेरा साँइयाँ तुझ मे" जैसी भावनाओ का एक अन्त श्रोत सतत् लक्षित होता रहता है। मीराँ की विरहाभिव्यक्ति इन दोनो से ही सर्वथा भिन्न पडती है। यहाँ न तो वैष्णव साहित्य की अतिशयोक्ति है न सत-साहित्य का तत्व-चिन्तन। यहाँ तो केवल एक ऐसा दर्द है जिसको कोई नही जानता और शायद जान भी नही सकता। मीराँ स्वय ही कहती है — "दरद की मारी मै बन बन डोलूँ, मेरो दरद न जाने कोय। घायल की गति घायलया जाने, की जिन लाई होय।" "को विरहणी को दुख जाणे .हो। जा घट विरहा सोई लखि है, कै कोई हरिजन मानै हो।" यह दर्द भी सम्पूर्ण मानव-भावनाओ से ओतप्रोत है ? इस मे खीज है, उपालम्भ है, मनावन है और है आत्म-समर्पण, जो सर्वोपरि है। मीराँ के आँसू गोकुल मे बाढ नही लाते अपितु वे भी "मोतियन की माल" बन जाते है, शायद आराध्य की पूजा हेतु ही। विरहाकुला गोपियाँ मधुबन को आराध्य के वियोग मे भी हरा भरा रहने के लिये धिक्कारती है परन्तु मीराँ स्वय अपने कठिन हृदय को ही धिक्कारती है जो आराध्य के वियोग मे अब तक भी फट नही गया — "पिड माँ सू प्राण पापी, निकस क्यूँ नही जात।" परन्तु यहाँ भी कितनी बडी विवशता है। आराध्य के दर्शनो के लोभ मे ही प्राण अब भी अटके हुए है -- "सावण आवण कहि गया रे, हरि आवण की आस। रैन अधेरी बीज चमकै, तारा गिणत निरास। लेई कटारी कठ सारूँ, मरूँगी जहर विष खाई। मीराँ दासी राम राती, लालच रही ललचाइ।" मीराँ द्वारा की गई इस गम्भीर विरहाभिव्यक्तियो मे किसी व्यक्तिगत