मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| ४ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| (संस्कृत-भाष्य) | (हिन्दी-अनुवाद) |
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| ज्ञानकर्मविरोध-निरूपणम्<br>विद्याकर्मविरोधाच्च । न हि ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन सह कर्म स्वप्नेऽपि सम्पादयितुं शक्यम्। विद्यायाः कालविशेषाभावादनियतनिमित्तत्वात्कालसङ्कोचानुपपत्तिः । | इसके सिवा विद्या और कर्मका विरोध होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है। ब्रह्मात्मैक्यदर्शनके साथ तो कर्मोंका सम्पादन स्वप्नमें भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि विद्यासम्पादनका कोई कालविशेष नहीं है और न उसका कोई नियत निमित्त ही है; अतः किसी काल-विशेषद्वारा उसका संकोच कर देना उचित नहीं है। |
| यत्तु गृहस्थेषु ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृत्वादि लिङ्गं न तत्स्थितन्यायं बाधितुमुत्सहते । न हि विधिशतेनापि तमःप्रकाशयोरेकत्र सद्भावः शक्यते कर्तुं किमुत लिङ्गैः केवलैरिति । | गृहस्थोंमें जो ब्रह्मविद्याका सम्प्रदायकर्तृत्व आदि लिङ्ग (अस्तित्व-सूचक निदर्शन) देखा गया है वह पूर्वप्रदर्शित स्थिरतर नियमको बाधित करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि तम और प्रकाशकी एकत्र स्थिति तो सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं की जा सकती, फिर केवल लिङ्गोंकी तो बात ही क्या है ? |
| उपनिषच्छब्द-निरुक्तिः<br>एवमुक्तसम्बन्धप्रयोजनाया उपनिषदोऽल्पाक्षरं ग्रन्थविवरणमारभ्यते। य इमां ब्रह्मविद्यामुपयन्त्यात्मभावेन श्रद्धाभक्तिपुरःसराः | इस प्रकार जिसके सम्बन्ध और प्रयोजनका निर्देश किया है उस [ मुण्डक ] उपनिषद्की यह संक्षिप्त व्याख्या आरम्भ की जाती है। जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आत्मभावसे इस ब्रह्मविद्याके समीप |