मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३ |
|---|
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्यादिना, अत्र चापरशब्दवाच्या-<br>यामृग्वेदादिलक्षणायां विधिप्रति-<br>षेधमात्रपरायां विद्यायां संसार-<br>कारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं<br>नास्तीति स्वयमेवोक्त्वा परापर-<br>विद्याभेदकरणपूर्वकम् ‘अविद्या-<br>यामन्तरे वर्तमानाः’ (मु० उ०<br>१।२।८) इत्यादिना । तथा<br>परप्राप्तिसाधनं सर्वसाधनसाध्य-<br>विषयवैराग्यपूर्वकं गुरुप्रसाद-<br>लभ्यां ब्रह्मविद्यामाह—‘परीक्ष्य<br>लोकान्’ (मु० उ० १।२।१२)<br>इत्यादिना । प्रयोजनं चास-<br>कृद्ब्रवीति ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव<br>भवति’ (मु० उ० ३।२।९) इति<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’<br>(मु० उ० ३। २। ६) इति च । | यहाँ तो ‘विधि-प्रतिषेधमात्रमें तत्पर<br>अपर शब्दवाच्य ऋग्वेदादिरूप<br>विद्या संसारके कारणभूत अज्ञान<br>आदि दोषकी निवृत्ति करनेवाली नहीं<br>है’—यह बात ‘अविद्यायामन्तरे<br>वर्तमानाः’ इत्यादि वाक्योंसे विद्याके<br>पर और अपर भेद करते हुए स्वयं<br>ही बतलाकर फिर ‘परीक्ष्य लोकान्’<br>इत्यादि वाक्योंसे साधन-साध्यरूप<br>सब प्रकारके विषयोंसे वैराग्यपूर्वक<br>गुरुकृपासे प्राप्य ब्रह्मविद्याको ही<br>परब्रह्मकी प्राप्तिका साधन बतलाया<br>है । तथा ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’ इत्यादि<br>वाक्योंसे उसका प्रयोजन तो<br>बारम्बार बतलाया है । |
| ज्ञानमात्रे यद्यपि सर्वाश्रमिणाम्<br><sub>[संन्यासनिष्ठैव ब्रह्मविद्या मोक्षसाधनम्]</sub> अधिकारस्तथापि<br>संन्यासनिष्ठैव ब्रह्म-<br>विद्या मोक्षसाधनं<br>न कर्मसहितेति ‘भैक्ष्यचर्यां<br>चरन्तः’ (मु० उ० १।२।११)<br>‘संन्यासयोगात्’ (मु० उ०<br>३।२।६) इति च ब्रुवन्दर्शयति । | यद्यपि ज्ञानमात्रमें सभी आश्रम-<br>वालोंका अधिकार है तथापि<br>ब्रह्मविद्या केवल संन्यासगत होनेपर<br>ही मोक्षका साधन होती है कर्म-<br>सहित नहीं—यह बात श्रुति<br>‘भैक्ष्यचर्यां चरन्तः’ ‘संन्यासयोगात्’<br>इत्यादि कहते हुए प्रदर्शित<br>करती है । |