भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

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प्रथम मुण्डक

प्रथम खण्ड

सम्बन्धभाष्यम्

ॐ ब्रह्मा देवानामित्याद्याथर्वणोपनिषत्। अस्याश्च विद्यासम्प्रदायकर्तृपारम्पर्यलक्षणसम्बन्धम् आदावेवाह स्वयमेव स्तुत्यर्थम्। एवं हि महद्भिः परमपुरुषार्थसाधनत्वेन गुरुणायासेन लब्धा विद्येति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय विद्यां महीकरोति। स्तुत्या प्ररोचितायां हि विद्यायां सादराः प्रवर्तेरन्निति।<br><br><sub>[उपक्रमः]</sub><br><br>प्रयोजनेन तु विद्यायाः साध्यसाधनलक्षणसम्बन्धम् उत्तरत्र वक्ष्यति 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' (मु० उ० २।२।८)।<br><br><sub>[ब्रह्मविद्यायाः सम्बन्धप्रयोजन-निरूपणम्]</sub>'ॐ ब्रह्मा देवानाम्' इत्यादि [वाक्यसे आरम्भ होनेवाली] उपनिषद् अथर्ववेदकी है। श्रुति इसकी स्तुतिके लिये इसके विद्यासम्प्रदायके कर्त्ताओंकी परम्परास्वरूप सम्बन्धका सबसे पहले स्वयं ही वर्णन करती है। इस प्रकार यह दिखलाकर कि 'इस विद्याको परमपुरुषार्थके साधनरूपसे महापुरुषोंने अत्यन्त परिश्रमसे प्राप्त किया था' श्रुति श्रोताओंकी बुद्धिमें इसके लिये रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी महत्ता दिखलाती है, जिससे कि लोग स्तुतिके कारण रुचिकर प्रतीत हुई विद्याके उपार्जनमें आदरपूर्वक प्रवृत्त हों।<br><br>अपने प्रयोजनके साथ ब्रह्मविद्याका साध्यसाधनरूप सम्बन्ध आगे चलकर 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि मन्त्रद्वारा बतलाया जायगा।