भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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१२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १
विषये हि विदिते न किञ्चित्त्वतो विदितं स्यादिति । निराकृत्य हि पूर्वपक्षं पश्चात्सिद्धान्तो वक्तव्यो भवतीति न्यायात् ॥ ४ ॥विषयमें जान लेनेपर तो तत्त्वतः कुछ भी नहीं जाना जाता, क्योंकि यह नियम है कि 'पहले पूर्वपक्षका खण्डन कर पीछे सिद्धान्त कहा जाता है' ॥ ४ ॥

परा और अपरा विद्याका स्वरूप

तत्रापरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्माका ज्ञान होता है वह परा है ॥ ५ ॥

तत्र कापरेत्युच्यते—ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इत्येते चत्वारो वेदाः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्यङ्गानि षडेषापरा विद्या ।<br><br>अथेदानीमियं परा विद्या उच्यते यया तद्वक्ष्यमाणविशेषणम् अक्षरमधिगम्यते प्राप्यते; अधि-उनमें अपरा विद्या कौन-सी है, सो बतलाते हैं । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छः वेदाङ्ग अपरा विद्या कहे जाते हैं।<br><br>अब यह परा विद्या बतलायी जाती है, जिससे आगे (छठे मन्त्रमें) कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त उस अक्षरका अधिगम अर्थात् प्राप्ति होती है, क्योंकि 'अधि'पूर्वक