मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| १२ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| विषये हि विदिते न किञ्चित्त्वतो विदितं स्यादिति । निराकृत्य हि पूर्वपक्षं पश्चात्सिद्धान्तो वक्तव्यो भवतीति न्यायात् ॥ ४ ॥ | विषयमें जान लेनेपर तो तत्त्वतः कुछ भी नहीं जाना जाता, क्योंकि यह नियम है कि 'पहले पूर्वपक्षका खण्डन कर पीछे सिद्धान्त कहा जाता है' ॥ ४ ॥ |
परा और अपरा विद्याका स्वरूप
तत्रापरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्माका ज्ञान होता है वह परा है ॥ ५ ॥
| तत्र कापरेत्युच्यते—ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इत्येते चत्वारो वेदाः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्यङ्गानि षडेषापरा विद्या ।<br><br>अथेदानीमियं परा विद्या उच्यते यया तद्वक्ष्यमाणविशेषणम् अक्षरमधिगम्यते प्राप्यते; अधि- | उनमें अपरा विद्या कौन-सी है, सो बतलाते हैं । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छः वेदाङ्ग अपरा विद्या कहे जाते हैं।<br><br>अब यह परा विद्या बतलायी जाती है, जिससे आगे (छठे मन्त्रमें) कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त उस अक्षरका अधिगम अर्थात् प्राप्ति होती है, क्योंकि 'अधि'पूर्वक |
| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३ |
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| [विद्यायाः परापरभेद-मीमांसा] <br><br> पूर्वस्य गमेः प्रायशः प्राप्त्यर्थत्वात् । न च परप्राप्तेरवगमार्थस्य भेदोऽस्ति। अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् । <br><br> ननु ऋग्वेदादिवाह्या तर्हि सा कथं परा विद्या स्यान्मोक्षसाधनं च। <br><br> "या वेदवाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । <br> सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः" (मनु० १२।९५) <br><br> इति हि स्मरन्ति । कुदृष्टित्वान्निष्फलत्वादनादेया स्यात्। उपनिषदां च ऋग्वेदादिवाह्यत्वं स्यात् । ऋग्वेदादित्वे तु पृथक्करणमनर्थकम् अथ परेति । <br><br> न; वेद्यविषयविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । उपनिषद्द्वेद्याक्षर- | 'गम' धातु प्रायः 'प्राप्ति' अर्थमें प्रयुक्त होती है इसके सिवा परमात्माकी प्राप्ति और उसके ज्ञानके अर्थमें कोई भेद भी नहीं है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति ही परमात्माकी प्राप्ति है, इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं । <br><br> शङ्का— तब तो वह (ब्रह्मविद्या) ऋग्वेदादिसे बाह्य है, अतः वह परा विद्या अथवा मोक्षकी साधनभूत किस प्रकार हो सकती है ? स्मृतियाँ तो कहती हैं कि "जो वेदवाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ (कुविचार) हैं वे परलोकमें निष्फल और नरककी साधन मानी गयी हैं।" अतः कुदृष्टि होनेसे निष्फल होनेके कारण वह ग्राह्य नहीं हो सकती । तथा इससे उपनिषद् भी ऋग्वेदादिसे बाह्य माने जायेंगे और यदि इन्हें ऋग्वेदादिमें ही माना जायगा तो 'अथ परा' आदि वाक्यसे जो परा विद्याको पृथक् बतलाया गया है वह व्यर्थ हो जायगा । <br><br> समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ परा विद्यासे ] वेद्यविषयक ज्ञान बतलाना अभीष्ट है । |
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१४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १ ]
| विषयं हि विज्ञानमिह परा विद्येति प्राधान्येन विवक्षितं नोपनिषच्छब्दराशिः। वेदशब्देन तु सर्वत्र शब्दराशिरिर्विवक्षितः । शब्दराश्यधिगमेऽपि यत्नान्तरमन्तरेण गुर्वभिगमनादिलक्षणं वैराग्यं च नाक्षराधिगमः सम्भवतीति पृथक्करणं ब्रह्मविद्यायाः परा विद्येति कथनं चेति ॥ ५ ॥ | यहाँ प्रधानतासे यही बतलाना इष्ट है कि उपनिषद्द्येय अक्षरविषयक विज्ञान ही परा विद्या है, उपनिषद्की शब्दराशि नहीं। और 'वेद' शब्दसे सर्वत्र शब्दराशि ही कही जाती है। शब्दसमूहका ज्ञान हो जानेपर भी गुरूपसत्ति आदिरूप प्रयत्नान्तर तथा वैराग्यके बिना अक्षरब्रह्मका ज्ञान नहीं हो सकता; इसीलिये ब्रह्मविद्याका पृथक्करण और 'अथ परा विद्या' आदिका कथन किया गया है ॥ ५ ॥ |
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| [परविद्याया वाक्यार्थज्ञान-जन्यत्वम्] <br><br> यथा विधिविषये कर्त्राद्यनेक- <br> कारकोपसंहारद्वारेण <br> वाक्यार्थज्ञानकालाद् <br> अन्यत्रानुष्ठेयोऽर्थोऽस्ति <br> अग्निहोत्रादिलक्षणो न तथेह <br> परविद्याविषये; वाक्यार्थज्ञान- <br> समकाल एव तु पर्यवसितो <br> भवति । केवलशब्दप्रकाशितार्थ- <br> ज्ञानमात्रनिष्ठाव्यतिरिक्ताभावात् ॥ | जिस प्रकार विधि (कर्मकाण्ड) के सम्बन्धमें [उसका प्रतिपादन करनेवाले] वाक्योंका अर्थ जाननेके समयसे भिन्न कर्ता आदि अनेकों कारकों (क्रियानिष्पत्तिका साधनों) के उपसंहारद्वारा अग्निहोत्र आदि अनुष्ठेय अर्थ रह जाता है, उस प्रकार परा विद्याके सम्बन्धमें नहीं होता। इसका कार्य तो वाक्यार्थ-ज्ञानके समकालमें ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि केवल शब्दोंके योगसे प्रकाशित होनेवाले अर्थ-ज्ञानमें स्थिति कर देनेसे भिन्न इसका और कोई प्रयोजन नहीं है। अतः |
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
| तस्मादिह परां विद्यां सविशेषणेन अक्षरेण विशिनष्टि यत्तदद्रेश्यम् इत्यादिना । वक्ष्यमाणं बुद्धौ संहृत्य सिद्धवत्परामृश्यते—यत्तदिति । | यहाँ 'यत्तदद्रेश्यम्' इत्यादि विशेषणोंसे विशेषित अक्षरब्रह्मका निर्देश करते हुए उस परा विद्याको विशेषित करते हैं । आगे जो कुछ कहना है उसे अपनी बुद्धिमें बिठाकर 'यत्तद्' इत्यादि वाक्यसे उसका सिद्ध वस्तुके समान उल्लेख करते हैं— |
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परविद्याप्रदर्शन
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणि- पादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥
वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चक्षुःश्रोत्रादिहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका कारण है उसे विवेकीलोग सब ओर देखते हैं ॥ ६ ॥
| अद्रेश्यमदृश्यं सर्वेषां बुद्धीन्द्रियाणामगम्यमित्येतत् । दृशेर्बहिःप्रवृत्तस्य पञ्चेन्द्रियद्वारकत्वात् ।<br><br>अग्राह्यं कर्मेन्द्रियाविषयमित्येतत् ।<br><br>अगोत्रं गोत्रमन्वयो मूलमित्यनर्थान्तरमगोत्रमनन्वयमित्यर्थः । | वह जो अद्रेश्यम्—अदृश्य अर्थात् समस्त ज्ञानेन्द्रियोंका अविषय है, क्योंकि बाहरको प्रवृत्त हुई दृक्शक्ति पञ्चज्ञानेन्द्रियरूप द्वारवाली है; अग्राह्य अर्थात् कर्मेन्द्रियोंका अविषय है; अगोत्रम्—गोत्र अन्वय अथवा मूल—ये किसी अन्य अर्थके वाचक नहीं हैं [अर्थात् इनका एक ही अर्थ है] अतः अगोत्र यानी अनन्वय है, क्योंकि उस |
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| १६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| न हि तस्य मूलमस्ति येन अन्वितं स्यात् । वर्ण्यन्त इति वर्णा द्रव्यधर्माः स्थूलत्वादयः शुक्लत्वादयो वा । अविद्यमाना वर्णा यस्य तदवर्णमक्षरम् । अचक्षुःश्रोत्रं चक्षुश्च श्रोत्रं च नामरूपविषये करणे सर्वजन्तूनां ते अविद्यमाने यस्य तदचक्षुः-श्रोत्रं, 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इति चेतनावत्त्वविशेषणात् प्राप्तं संसारिणामिव चक्षुःश्रोत्रादिभिः करणैरर्थसाधकत्वं तदिहाचक्षुः-श्रोत्रमिति वार्यते “पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः” (श्वे० उ० ३ । १९) इत्यादिदर्शनात् ।<br><br>किं च तदपाणिपादं कर्मेन्द्रिय-रहितमित्येतत् । यत एवमग्राह्य- | अक्षर [अक्षरब्रह्म] का कोई मूल नहीं है जिससे वह अन्वित हो; जिनका वर्णन किया जाय वे स्थूलत्वादि या शुक्लत्वादि द्रव्यके धर्म ही वर्ण हैं—वे वर्ण जिसमें विद्यमान नहीं हैं वह अक्षर अवर्ण है; अचक्षुःश्रोत्रम्—चक्षु (नेत्रेन्द्रिय) और श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) ये सम्पूर्ण प्राणियोंकी रूप और शब्दको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ हैं, वे जिसमें नहीं हैं उसे ही 'अचक्षुः-श्रोत्र' कहते हैं । 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इस श्रुतिमें पुरुषके लिये चेतनावत्त्व विशेषण दिया गया है, अतः अन्य संसारी जीवोंके समान उसके लिये भी चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों-से अर्थसाधकत्व प्राप्त होता है, यहाँ 'अचक्षुःश्रोत्रम्' कहकर उसीका निषेध किया जाता है, जैसा कि उसके विषयमें “बिना नेत्रवाला होकर भी देखता है, बिना कान-वाला होकर भी सुनता है” इत्यादि कथन देखा गया है ।<br><br>यही नहीं, वह अपाणिपाद अर्थात् कर्मेन्द्रियोंसे भी रहित है । क्योंकि इस प्रकार वह अग्राह्य |
. खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
| मग्राहकं चातो नित्यम् अविनाशि। विभुं विविधं ब्रह्मादि-स्थावरान्तप्राणिभेदैर्भवति इति विभुम्। सर्वगतं व्यापकमाकाश-वत्सुसूक्ष्मं शब्दादिस्थूलत्व-कारणरहितत्वात् । शब्दादयो ह्याकाशाव्वादीनामुत्तरोत्तरं स्थूलत्यकारणानि तदभावात् सूक्ष्मम्। किं च तदव्ययमुक्तधर्म-त्वादेव न व्येतीत्यव्ययम् । न हि अनङ्गस्य स्वाङ्गापचयलक्षणो व्ययः सम्भवति शरीरस्येव। नापि कोशा-पचयलक्षणो व्ययः सम्भवति राज्ञ इव । नापि गुणद्वारको व्ययः सम्भवत्यगुणत्वात्सर्वात्म-कत्वाच्च । | और अग्राहक भी है, इसलिये वह नित्य—अविनाशी है। तथा विभु—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त प्राणि-भेदसे वह विविध (अनेक प्रकारका) हो जाता है, इसलिये विभु है, सर्वगत—व्यापक है और शब्दादि स्थूलताके कारणोंसे रहित होनेके कारण आकाशके समान अत्यन्त सूक्ष्म है; शब्दादि गुण ही आकाश-वायु आदिकी उत्तरोत्तर स्थूलताके कारण हैं, उनसे रहित होनेके कारण वह [ अक्षरब्रह्म ] सुसूक्ष्म है। तथा उपर्युक्त धर्मवाला होनेसे ही कभी उसका व्यय (ह्रास) नहीं होता इसलिये वह अव्यय है; क्योंकि अङ्गहीन वस्तुका शरीरके समान अपने अङ्गोंका क्षयरूप व्यय नहीं हो सकता, न राजाके समान कोशक्षयरूप व्यय ही सम्भव है और न निर्गुण तथा सर्वात्मक होनेके कारण उसका गुणक्षयद्वारा ही व्यय हो सकता है। |
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| यदेवंलक्षणं भूतयोनिं भूतानां कारणं पृथिवीव स्थावरजङ्ग-मानां परिपश्यन्ति सर्वत आत्म-भूतं सर्वस्याक्षरं पश्यन्ति धीराः<br>२ | पृथिवी जैसे स्थावर-जङ्गम जगत्का कारण है उसी प्रकार जिस ऐसे लक्षणोंवाले भूतयोनि—भूतोंके कारण सबके आत्मभूत अक्षरब्रह्मको धीर—बुद्धिमान्— |
१८ - मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १.
| धीमन्तो विवेकिनः । ईदृशमक्षरं यया विद्ययाधिगम्यते सा परा विद्येति समुदायार्थः ॥ ६ ॥ | विवेकी पुरुष सब ओर देखते हैं, ऐसा अक्षर जिस विद्यासे जाना जाता है वही परा विद्या है—यह इस सम्पूर्ण मन्त्रका तात्पर्य है॥६॥ |
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अक्षरब्रह्मका विश्वकारणत्व
| भूतयोन्यक्षरमित्युक्तम् । तत्कथं भूतयोनित्वमित्युच्यते प्रसिद्धदृष्टान्तैः— | पहले कहा जा चुका है कि अक्षरब्रह्म भूतोंकी योनि है। उसका वह भूतयोनित्व किस प्रकार है, सो प्रसिद्ध दृष्टान्तोंद्वारा बतलाया जाता है— |
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यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥
जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और उसे निगल जाती है, जैसे पृथिवीमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुषसे केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है।
| यथा लोके प्रसिद्धम्, ऊर्णनाभिर्लूताकीटः किञ्चित्कारणान्तरमनपेक्ष्य स्वयमेव सृजते स्वशरीराव्यतिरिक्तानेव तन्तून्बहिः प्रसारयति पुनस्तानेव गृह्णते च गृह्णाति स्वात्मभावमेवापादयति । | जिस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है कि ऊर्णनाभि—मकड़ी किसी अन्य उपकरणकी अपेक्षा न कर स्वयं ही अपने शरीरसे अभिन्न तन्तुओंको रचती अर्थात् उन्हें बाहर फैलाती है और फिर उन्हींको ग्रहण भी कर लेती है, यानी अपने शरीरसे |
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १९ |
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| यथा च पृथिव्यामोषधयो व्रीह्यादिस्थावरान्ता इत्यर्थः। स्वात्माव्यतिरिक्ता एव प्रभवन्ति। यथा च सतो विद्यमानाज्जीवनः पुरुषात्केशलोमानि केशाश्च लोमानि च सम्भवन्ति विलक्षणानि। | अभिन्न कर देती है, तथा जैसे पृथिवीमें व्रीहि-यव इत्यादिसे लेकर वृक्षपर्यन्त समस्त ओषधियाँ उससे अभिन्न ही उत्पन्न होती हैं और जैसे सत्—विद्यमान अर्थात् जीवित पुरुषसे उससे विलक्षण केश और लोम उत्पन्न होते हैं। |
| यथैते दृष्टान्तास्तथा विलक्षणं सलक्षणं च निमित्तान्तरानपेक्षाद्यथोक्तलक्षणादक्षरात्सम्भवति समुत्पद्यत इह संसारमण्डले विश्वं समस्तं जगत्। अनेकदृष्टान्तोपादानं तु सुखार्थप्रबोधनार्थम् ॥ ७ ॥ | जैसे कि ये दृष्टान्त हैं उसी प्रकार इस संसारमण्डलमें इससे विभिन्न और समान लक्षणोंवाला यह विश्व—समस्त जगत्, किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करनेवाले उस उपर्युक्तलक्षणविशिष्ट अक्षरसे ही उत्पन्न होता है। ये अनेक दृष्टान्त केवल विषयको सरलतासे समझानेके लिये ही लिये गये हैं ॥ ७ ॥ |
सृष्टिक्रम
| यद्ब्रह्मण उत्पद्यमानं विश्वं तदनेन क्रमेणोत्पद्यते न युगपद्बदरमुष्टिप्रक्षेपवदिति क्रमनियमविवक्षार्थोऽयं मन्त्र आरभ्यते— | ब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाला जो जगत् है वह इस क्रमसे उत्पन्न होता है, बेरोंकी मुट्ठी फेंक देनेके समान एक साथ उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार उस क्रमके नियमको बतलानेकी इच्छावाला यह मन्त्र आरम्भ किया जाता है— |
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥
| २० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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[ ज्ञानरूप ] तपके द्वारा ब्रह्म कुछ उपचय ( स्थूलता ) को प्राप्त हो जाता है, उसीसे अन्न उत्पन्न होता है । फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, सत्य, लोक, कर्म और कर्मसे अमृतसंज्ञक कर्मफल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
| तपसा ज्ञानेनोत्पत्तिविधिज्ञ- | उत्पत्तिविधिकाज्ञाता होनेके कारण तप अर्थात् ज्ञानसे भूतोंका कारण- |
| तया भूतयोन्यक्षरं ब्रह्म चीयत | रूप अक्षरब्रह्म उपचित होता है; अर्थात् इस जगत्को उत्पन्न करनेकी |
| उपचीयत उत्पिपादयिषदिदं | इच्छा करते हुए वह कुछ स्थूलताको प्राप्त हो जाता है, जैसे अङ्कुर- |
| जगदङ्कुरमिव बीजमुच्छूनतां | रूपमें परिणत होता हुआ बीज कुछ स्थूल हो जाता अथवा पुत्र उत्पन्न |
| गच्छति पुत्रमिव पिता हर्षेण । | करनेकी इच्छावाला पिता हर्षसे उल्लसित हो जाता है । |
| एवं सर्वज्ञतया सृष्टिस्थितिसंहारशक्तिविज्ञानवत्त्वोपचितात् | इस प्रकार सर्वज्ञ होनेके कारण सृष्टि स्थिति और संहार-शक्तिकी विज्ञानवत्ततासे वृद्धिको प्राप्त हुए |
| ततो ब्रह्मणोऽन्नमद्यते भुज्यत | उस ब्रह्मसे अन्न—जो खाया यानी भोजन किया जाय उसे अन्न |
| इत्यन्नमव्याकृतं साधारणं संसा- | कहते हैं, वह सबका साधारण कारणरूप अव्याकृत संसारियोंकी |
| रिणां व्याचिकीर्षितावस्थारूपेण | व्याचिकीर्षित ( व्यक्त की जाने- |
| अभिजायत उत्पद्यते । ततश्च | वाली ) अवस्थारूपसे उत्पन्न होता है । उस अव्याकृतसे यानी व्याचि- |
| अव्याकृताद्व्याचिकीर्षितावस्थातः | कीर्षित अवस्थावाले अन्नसे प्राण— |
| अन्नात्प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्मणो | हिरण्यगर्भ यानी ब्रह्मकी ज्ञान और क्रियाशक्तियोंसे अधिष्ठित, व्यष्टि |
| ज्ञानक्रियाशक्त्यधिष्ठितजगत्सा- | जीवोंका समष्टिरूप तथा अविद्या, |
| धारणोऽविद्याकामकर्मभूतसमु- | काम, कर्म और भूतोंके समुदायरूप |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
| कार्यबीजाङ्कुरो जगदात्माभिजायत इत्यनुषङ्गः । | बीजका अङ्कुर जगदात्मा उत्पन्न होता है। यहाँ प्राण शब्दका 'अभिजायते' क्रियासे सम्बन्ध है । |
| तस्माच्च प्राणान्मनो मनआख्यं सङ्कल्पविकल्पसंशयनिर्णयाद्यात्मकमभिजायते । ततोऽपि सङ्कल्पाद्यात्मकान्मनसः सत्यं सत्याख्यमाकाशादि भूतपञ्चकम् अभिजायते। तस्मात्सत्याख्याद्भूतपञ्चकाद् अण्डक्रमेण सप्तलोका भूर्वादयः । तेषु मनुष्यादिप्राणिवर्णाश्रमक्रमेण कर्माणि । कर्मसु च निमित्तभूतेष्वमृतं कर्मजं फलम् । यावत्कर्माणि कल्पकोटिशतैरपि न विनश्यन्ति तावत्फलं न विनश्यति इत्यमृतम् ॥ ८ ॥ | तथा उस प्राणसे मन यानी संकल्प-विकल्प-संशय-निर्णयात्मक मननामक अन्तःकरण उत्पन्न होता है । उस सङ्कल्पादिरूप मनसे भी सत्य—सत्यनामक आकाशादि भूतपञ्चककी उत्पत्ति होती है । फिर उस सत्यसंज्ञक भूतपञ्चकसे ब्रह्माण्डक्रमसे भूः आदि सात लोक उत्पन्न होते हैं । उनमें मनुष्यादि प्राणियोंके वर्ण और आश्रमके क्रमसे कर्म होते हैं तथा उन निमित्तभूत कर्मोंसे अमृत—कर्मजनित फल होता है । जबतक सौ करोड़ कल्पतक भी कर्मोंका नाश नहीं होता तबतक उनका फल भी नष्ट नहीं होता; इसलिये कर्मफलको 'अमृत' कहा है ॥ ८ ॥ |
| उक्तमेवार्थमुपसंजिहीर्षुर्मन्त्रो वक्ष्यमाणार्थमाह— | पूर्वोक्त अर्थका ही उपसंहार करनेकी इच्छावाला [ यह नवम ] मन्त्र आगे कहा जानेवाला अर्थ कहता है— |
प्रकरणका उपसंहार
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद्ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥
२२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
जो सबको [ सामान्यरूपसे ] जाननेवाला और सबका विशेषज्ञ है तथा जिसका ज्ञानमय तप है उस [ अक्षरब्रह्म ] से ही यह ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ), नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है ॥ ९ ॥
| य उक्तलक्षणोऽक्षराख्यः सर्वज्ञः सामान्येन सर्वं जानातीति सर्वज्ञः । विशेषेण सर्वं वेत्तीति सर्ववित् । यस्य ज्ञानमयं ज्ञान-विकारमेव सार्वज्ञ्यलक्षणं तपो नायासलक्षणं तस्माद्यथोक्तात् सर्वज्ञादेतदुक्तं कार्यलक्षणं ब्रह्म हिरण्यगर्भाख्यं जायते । किं च नामासौ देवदत्तो यज्ञदत्त इत्यादि-लक्षणम्, रूपमिदं शुक्लं नील-मित्यादि, अन्नं च व्रीहियवादि-लक्षणं जायते । पूर्वमन्त्रोक्तक्रमेण इत्यविरोधो द्रष्टव्यः ॥ ९ ॥ | जो ऊपर कहे हुए लक्षणोंवाला अक्षरसंज्ञक ब्रह्म सर्वज्ञ—सबको सामान्यरूपसे जानता है, इसलिये सर्वज्ञ और विशेषरूपसे सब कुछ जानता है इसलिये सर्ववित् है, जिसका ज्ञानमय अर्थात् सर्वज्ञतारूप ज्ञानविकार ही तप है—आयास-रूप तप नहीं है उस उपर्युक्त सर्वज्ञसे ही यह पूर्वोक्त हिरण्यगर्भ-संज्ञक कार्यब्रह्म उत्पन्न होता है । तथा उसीसे पूर्वोक्त मन्त्रके क्रमानु-सार यह देवदत्त-यज्ञदत्त इत्यादि नाम, यह शुक्ल-नील इत्यादि रूप तथा व्रीहि-यवादिरूप अन्न उत्पन्न होता है । अतः पूर्वमन्त्रसे इसका अविरोध समझना चाहिये ॥ ९ ॥ |
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इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये प्रथममुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
प्रथम मुण्डक (द्वितीय खण्ड) - कर्मनिरूपण व संन्यास
द्वितीय खण्ड
कर्मनिरूपण
| पूर्वापरसम्बन्ध-निरूपणम्<br><br>साङ्गा वेदा अपरा विद्योक्ता ऋग्वेदो यजुर्वेद इत्यादिना । यत्तदद्रेश्यम् इत्यादिना नामरूपम् अन्नं च जायत इत्यन्तेन ग्रन्थेन उक्तलक्षणमक्षरं यया विद्यया अधिगक्यत इति परा विद्या सविशेषणोक्ता । अतःपरमनयोर्विद्ययोर्विषयौ विवेक्तव्यौ संसारमोक्षावित्युत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते । | ऊपर 'ऋग्वेदो यजुर्वेदः' इत्यादि [ पञ्चम ] मन्त्रसे अङ्गों-सहित वेदोंको अपरा विद्या बतलाया है । तथा 'यत्तदद्रेश्यम्' इत्यादिसे लेकर 'नामरूपमन्नं च जायते' यहाँतकके ग्रन्थसे जिसके द्वारा उपर्युक्त लक्षणवाले अक्षरका ज्ञान होता है उस परा विद्याका उसके विशेषणोंसहित वर्णन किया । इसके पश्चात् इन दोनों विद्याओंके विषय संसार और मोक्षका विवेक करना है; इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । |
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| संसारमोक्षयोः स्वरूपनिर्देशः<br><br>तत्रापरविद्याविषयः कर्त्रादिसाधनक्रियाफलभेदरूपः संसारोऽनादिः अनन्तो दुःखरूपत्वाद्धातव्यः प्रत्येकं शरीरिभिः सामस्त्येन नदीस्रोतोवदव्यवच्छेदरूपसम्बन्धः, तदुपशमलक्षणो | उनमें अपरा विद्याका विषय संसार है, जो कर्त्ता-करण आदि साधनोंसे होनेवाले कर्म और उसके फलरूप भेदवाला, अनादि, अनन्त और नदीके प्रवाहके समान अविच्छिन्न सम्बन्धवाला है तथा दुःखरूप होनेके कारण प्रत्येक देहधारीके लिये सर्वथा त्याज्य है । उस ( संसार ) का उपशमरूप |
२४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
| मोक्षः परविद्याविषयोऽनाद्यनन्तोऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयः शुद्धः प्रसन्नः स्वात्मप्रतिष्ठालक्षणः परमानन्दोऽद्वय इति । <br><br> पूर्वं तावदपरविद्याया विषयप्रदर्शनार्थमारम्भः । तद्दर्शने हि तन्निर्वेदोपपत्तेः । तथा च वक्ष्यति—'परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्' (मु० उ० १ । २ । १२) इत्यादिना । न ह्यप्रदर्शिते परीक्षोपपद्यत इति तत्प्रदर्शयन्नाह— | मोक्ष परा विद्याका विषय है और वह अनादि, अनन्त, अजर, अमर, अमृत, अभय, शुद्ध, प्रसन्न, स्वस्वरूपमें स्थितिरूप तथा परमानन्द एवं अद्वितीय है । <br><br> उन दोनोंमें पहले अपरा विद्याका विषय दिखलानेके लिये आरम्भ किया जाता है, क्योंकि उसे जान लेनेपर ही उससे विराग हो सकता है । ऐसा ही 'परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्' इत्यादि वाक्योंसे आगे कहेंगे भी । बिना दिखलाये हुए उसकी परीक्षा नहीं हो सकती; अतः उस ( कर्मफल ) को दिखलाते हुए कहते हैं— |
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तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि
त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा
एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥
बुद्धिमान् ऋषियोंने जिन कर्मोंका मन्त्रोंमें साक्षात्कार किया था वही यह सत्य है, त्रेतायुगमें उन कर्मोंका अनेक प्रकार विस्तार हुआ । सत्य ( कर्मफल ) की कामनासे युक्त होकर उनका नित्य आचरण करो; लोकमें यही तुम्हारे लिये सुकृत ( कर्मफलकी प्राप्ति ) का मार्ग है ॥ १ ॥
| तदेतत्सत्यमवितथम् । किं तत् ? मन्त्रेष्वृग्वेदाद्याख्येषु कर्माणि अग्निहोत्रादीनि मन्त्रैरेव प्रकाशि- | वही यह सत्य अर्थात् अमिथ्या है । वह क्या ? ऋग्वेदादि मन्त्रोंमें मन्त्रोंद्वारा ही प्रकाशित जिन |
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
| तानि कवयो मेधाविनो वसिष्ठादयो यान्यपश्यन्दृष्टवन्तः। यत्तदेतत्सत्यमेकान्तपुरुषार्थसाधनत्वात्। तानि च वेदविहितान्यृषिदृष्टानि कर्माणि त्रेतायां त्रयीसंयोगलक्षणायां हौत्राध्वर्यवौद्गात्रप्रकारायामधिकरणभूतायां बहुधा बहुप्रकारं सन्ततानि प्रवृत्तानि कर्मिभिः क्रियमाणानि त्रेतायां वा युगे प्रायशः प्रवृत्तानि। <br><br> अतो यूयं तान्याचरथ निर्वर्तयत नियतं नित्यं सत्यकामा यथाभूतकर्मफलकामाः सन्तः। एष वो युष्माकं पन्था मार्गः सुकृतस्य स्वयं निर्वर्तितस्य कर्मणो लोके, फलनिमित्तं लोक्यते दृश्यते भुज्यत इति कर्मफलं लोक उच्यते; तदर्थं तत्प्राप्तय एष मार्ग इत्यर्थः। यान्येतानि अग्निहोत्रादीनि त्रय्यां विहितानि कर्माणि तान्येष पन्था अवश्यफलप्राप्तिसाधनमित्यर्थः ॥ १॥ | अग्निहोत्रादि कर्मोंको कवियों अर्थात् वसिष्ठादि मेधावियोंने देखा था, वही पुरुषार्थका एकमात्र साधन होनेके कारण यह सत्य है। वे ही वेदविहित और ऋषिदृष्ट कर्म त्रेतामें—[ ऋग्वेदविहित ] हौत्र, [ यजुर्वेदोक्त ] आध्वर्यव और [ सामवेदविहित ] औद्गात्र ही जिसके प्रकारभेद हैं उस अधिकरणभूत त्रयीसंयोगरूप त्रेतामें अनेक प्रकार सन्तत—प्रवृत्त हुए, अथवा कर्मठोंद्वारा किये जाकर प्रायशः त्रेतायुगमें प्रवृत्त हुए। <br><br> अतः सत्यकाम यानी यथाभूत कर्मफलकी इच्छावाले होकर तुम उनका नियत—नित्य आचरण करो। यही तुम्हारे सुकृत—स्वयं किये हुए कर्मोंके लोककी प्राप्तिके लिये मार्ग है। फलके निमित्तसे लोकित, दृष्ट अथवा भोगा जाता है इसलिये कर्मफल 'लोक' कहलाता है; उस ( कर्मफल ) के लिये अर्थात् उसकी प्राप्तिके लिये यही मार्ग है। तात्पर्य यह है कि वेदत्रयीमें विहित जो ये अग्निहोत्र आदि कर्म हैं वे ही यह मार्ग यानी अवश्य फलप्राप्तिका साधन हैं ॥ १ ॥ |
| २६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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अग्निहोत्रका वर्णन
| तत्राग्निहोत्रमेव तावत्प्रथमं प्रदर्शनार्थमुच्यते सर्वकर्मणां प्राथम्यात् । तत्कथम् ? | उनमें सबसे पहले प्रदर्शित करनेके लिये अग्निहोत्रका ही वर्णन किया जाता है, क्योंकि [ अग्नि-साध्य कर्मोंमें ] उसीकी प्रधानता है । सो किस प्रकार ? |
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यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥
जिस समय अग्निके प्रदीप्त होनेपर उसकी ज्वाला उठने लगे उस समय दोनों आज्यभागोंके* मध्यमें [ प्रातः और सायंकाल ] आहुतियाँ डाले ॥ २ ॥
| यदैवेन्धनैरभ्याहितैः सम्यगिद्धे समिद्धे हव्यवाहने लेलायते चलत्यर्चिस्तदा तस्मिन्काले लेलायमाने चलत्यर्चिष्याज्यभागावाज्यभागयोरन्तरेण मध्य आवापस्थान आहुतीः प्रतिपादयेत्प्रक्षिपेद्देवतामुद्दिश्य । अनेकाहप्रयोगापेक्षयाहुतीरिति बहुवचनम् ॥ २ ॥ | जिस समय सब ओर आधान किये हुए ईंधनद्वारा सम्यक् प्रकारसे इद्ध अर्थात् प्रज्वलित होनेपर अग्निसे ज्वाला उठने लगे तब—उस समय ज्वालाओंके चञ्चल हो उठनेपर आज्यभागोंके अन्तर—मध्यमें आवापस्थानमें देवताओंके उद्देश्यसे आहुतियाँ देनी चाहिये। अनेक दिनतक होनेवाले प्रयोगकी अपेक्षासे यहाँ 'आहुतीः' इस बहुवचनका प्रयोग किया गया है ॥ २ ॥ |
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* दर्श-पौर्णमास यज्ञमें आहवनीय अग्निके उत्तर और दक्षिण ओर 'अग्नये स्वाहा' तथा 'सोमाय स्वाहा' इन मन्त्रोंसे दो घृताहुतियाँ दी जाती हैं । उन्हें 'आज्यभाग' कहते हैं । इनके बीचका भाग 'आवापस्थान' कहलाता है । शेष सब आहुतियाँ उसीमें दी जाती हैं ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
विधिहीन कर्मका कुफल
| एष सम्यगाहुतिप्रक्षेपादि- | यह यथाविधि आहुतिप्रदानरूप |
| लक्षणः कर्ममार्गो लोकप्राप्तये | कर्ममार्ग [ स्वर्गादि ] लोकोंकी |
| पन्थास्तस्य च सम्यक्करणं दुष्करम् । | प्राप्तिका साधन है । इसका यथा- |
| विपत्तयस्त्वनेका भवन्ति। कथम्? | वत् होना बड़ा ही दुष्कर है । |
| इसमें अनेकों विपत्तियाँ आ सकती | |
| हैं। किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] |
यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च। अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुत- मासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥ ३ ॥
जिसका अग्निहोत्र दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य और आग्रयण—इन कर्मोंसे रहित, अतिथि-पूजनसे वर्जित, यथासमय किये जानेवाले हवन और वैश्वदेवसे रहित अथवा अविधिपूर्वक हवन किया होता है, उसकी मानो सात पीढ़ियोंका वह नाश कर देता है ॥ ३ ॥
| यस्याग्निहोत्रिणोऽग्निहोत्रमदर्शं | जिस अग्निहोत्रीका अग्निहोत्र |
| दर्शाख्येन कर्मणा वर्जितम् । | अदर्श—दर्शनामक कर्मसे रहित |
| अग्निहोत्रिणोऽवश्यकर्तव्यत्वाद् | होता है, क्योंकि अग्निहोत्रियोंको |
| दर्शस्य। अग्निहोत्रसम्बन्ध्यग्निहोत्र- | दर्शकर्म अवश्य करना चाहिये । |
| विशेषणमिव भवति । तदक्रिय- | अग्निहोत्रसे सम्बन्ध रखनेवाला |
| माणमित्येतत् । तथापौर्णमासम् | होनेके कारण [ यह दर्शकर्म ] |
| इत्यादिष्वप्यग्निहोत्रविशेषणत्वं | अग्निहोत्रके विशेषणके समान |
| द्रष्टव्यम् , अग्निहोत्राङ्गत्वस्य | प्रयुक्त हुआ है । अतः जिसके |
| द्वारा इसका अनुष्ठान नहीं किया | |
| जाता । इसी प्रकार 'अपौर्णमासम्' | |
| आदिमें भी अग्निहोत्रका विशेषणत्व | |
| देखना चाहिये, क्योंकि अग्निहोत्रके | |
| अङ्ग होनेमें उन [पौर्णमास आदि] |
| २८ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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| अविशिष्टत्वात् । अपौर्णमासं पौर्णमासकर्मवर्जितम्, अचातुर्मास्यं चातुर्मास्यकर्मवर्जितम्, अनाग्रयणमाग्रयणं शरदादिकर्तव्यं तच्च न क्रियते यस्य, तथातिथिवर्जितं चातिथिपूजनं चाहन्यहन्यक्रियमाणं यस्य, स्वयं सम्यगग्निहोत्रकालेऽहुतम्, अदर्शादिवद्वैश्वदेवं वैश्वदेवकर्मवर्जितम्, हूयमानमप्यविधिना हुतं न यथाहुतमित्येतद् एवं दुःसम्पादितमसम्पादितम् अग्निहोत्राद्युपलक्षितं कर्म किं करोतीत्युच्यते । | की दर्शसे समानता है । [ अतः जिनका अग्निहोत्र ] अपौर्णमास—पौर्णमास कर्मसे रहित, अचातुर्मास्य—चातुर्मास्य कर्मसे रहित, अनाग्रयण—शरदादि ऋतुओंमें [ नवीन अन्नसे ] किया जानेवाला जो आग्रयण कर्म है वह जिस ( अग्निहोत्र ) का नहीं किया जाता वह अनाग्रयण है, तथा अतिथिवर्जित—जिसमें नित्यप्रति अतिथिपूजन नहीं किया गया, ऐसा होता है और जो स्वयं भी, जिसमें विधिपूर्वक अग्निहोत्रकालमें हवन नहीं किया गया, ऐसा है तथा जो अदर्श आदिके समान अवैश्वदेव—वैश्वदेव कर्मसे रहित है और यदि [ उसमें ] हवन भी किया गया है तो अविधिपूर्वक ही किया गया है, यानी यथोचित रीतिसे जिसमें हवन नहीं किया गया ऐसा है; इस प्रकार अनुचित रीतिसे किया हुआ अथवा बिना किया हुआ अग्निहोत्र आदिसे उपलक्षित कर्म क्या करता है ? सो बतलाया जाता है— |
| आसप्तमान्सप्तमसहितांस्तस्य कर्तुर्लोकान्हिनस्ति हिनस्तीव आयासमात्रफलत्वात्। सम्यक्क्रिय- | वह कर्म केवल परिश्रममात्र फलवाला होनेके कारण उस कर्ताके सातों—सप्तम लोकसहित सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट—विध्वस्त-सा कर देता है । कर्मोंका यथावत् अनुष्ठान |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
| मार्गेषु हि कर्मसु कर्मपरिणामा- | किया जानेपर ही कर्मफलके अनुसार |
| नुरूपेण भूरादयः सत्यान्ताः | भूर्लोकसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त |
| सप्त लोकाः फलं प्राप्यन्ते । ते | सात लोक फलरूपसे प्राप्त होते हैं । |
| लोका एवंभूतेनाग्निहोत्रादि- | वे लोक इस प्रकारके अग्निहोत्रादि |
| कर्मणा त्वप्राप्यत्वाद्विंस्यन्त इव । | कर्मसे तो अप्राप्य होनेके कारण |
| मानो नष्ट ही कर दिये जाते हैं । | |
| आयातमात्रं त्वव्यभिचारीत्यतो | हाँ उसका परिश्रममात्र फल तो |
| हिनस्तीत्युच्यते । | अव्यभिचारी—अनिवार्य है, इसी- |
| लिये 'हिनस्ति' [ अर्थात् वह | |
| अग्निहोत्र उसके सातों लोकोंको | |
| नष्ट कर देता है ] ऐसा कहा है । | |
| पिण्डदानाद्यनुग्रहेण वा | अथवा पिण्डदानादि अनुग्रहके |
| द्वारा यजमानसे सम्बद्ध पिता, | |
| सम्बन्ध्यमानाः पितृपितामह- | पितामह और प्रपितामह [ ये तीन |
| पूर्वपुरुष ] तथा पुत्र, पौत्र और | |
| प्रपितामहाः पुत्रपौत्रप्रपौत्राः | प्रपौत्र [ ये तीन आगे होनेवाली |
| सन्ततियाँ ये ही अपने सहित ] | |
| स्वात्मोपकाराः सप्त लोका उक्त- | अपना उपकार करनेवाले सात |
| लोक हैं । ये उक्त प्रकारके अग्निहोत्र | |
| प्रकारेणाग्निहोत्रादिना न भव- | आदिसे प्राप्त नहीं होते; इसलिये 'नष्ट |
| कर दिये जाते हैं' इस प्रकार कहा | |
| न्तीति हिंस्यन्त इत्युच्यते ॥३॥ | जाता है ॥ ३ ॥ |
अग्निकी सात जिह्वाएँ
काली कराली च मनोजवा च
सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।
३० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥
काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची देवी—ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥
| कालीकरालीचमनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः । काल्याद्या विश्वरुच्यन्ता लेलायमाना अग्नेर्हविराहुतिग्रसनार्था एताः सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥ | काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची देवी—ये अग्निकी लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। कालीसे लेकर विश्वरुचीतक—ये अग्निकी सात चञ्चल जिह्वाएँ हवि—आहुतिका ग्रास करनेके लिये हैं ॥ ४ ॥ |
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विधिवत् अग्निहोत्रादिसे स्वर्गप्राप्ति
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥
जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्निशिखाओंमें यथासमय आहुतियाँ देता हुआ [ अग्निहोत्रादि कर्मका ] आचरण करता है उसे ये सूर्यकी किरणें होकर वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी [ इन्द्र ] रहता है ॥ ५ ॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
| एतेष्वग्निजिह्वाभेदेषु योऽग्निहोत्री चरते कर्माचरत्यग्निहोत्रादि भ्राजमानेषु दीप्यमानेषु । यथाकालं च यस्य कर्मणो यः कालस्तत्कालं यथाकालं यजमानमाददायन्नाददाना आहुतयो यजमानेन निर्वर्त्तितास्तं नयन्ति प्रापयन्त्येता आहुतयो या इमा अनेन निर्वर्त्तिताः सूर्यस्य रश्मयो भूत्वा रश्मिद्वारैरित्यर्थः । यत्र यस्मिन्स्वर्गे देवानां पतिरिन्द्र एकः सर्वानुपर्यधि वसतीत्यधिवासः ॥ ५ ॥ | जो अग्निहोत्री इन भ्राजमान—दीप्तिमान् अग्निजिह्वाके भेदोंमें यथाकाल यानी जिस कर्मका जो काल है उस कालका अतिक्रमण न करते हुए अग्निहोत्रादि कर्मका आचरण करता है, उस यजमानको इसकी दी हुई वे आहुतियाँ सूर्यकी किरणें होकर अर्थात् सूर्यकी किरणोंद्वारा वहाँ पहुँचा देती हैं जहाँ—जिस स्वर्गलोकमें देवताओंका एकमात्र पति इन्द्र सबके ऊपर अधिवास—अधिष्ठान करता है ।५। |
| कथं सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्तीत्युच्यते— | वे सूर्यकी किरणोंद्वारा यजमानको किस प्रकार ले जाती हैं, सो बतलाया जाता है— |
एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः
सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य
एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥
वे दीप्तिमती आहुतियाँ 'आओ, आओ, यह तुम्हारे सुकृतसे प्राप्त हुआ पवित्र ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है' ऐसी प्रियवाणी कहकर यजमानका अर्चन (सत्कार) करती हुई उसे ले जाती हैं ॥ ६ ॥