मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| २६ | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक १ |
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अग्निहोत्रका वर्णन
| तत्राग्निहोत्रमेव तावत्प्रथमं प्रदर्शनार्थमुच्यते सर्वकर्मणां प्राथम्यात् । तत्कथम् ? | उनमें सबसे पहले प्रदर्शित करनेके लिये अग्निहोत्रका ही वर्णन किया जाता है, क्योंकि [ अग्नि-साध्य कर्मोंमें ] उसीकी प्रधानता है । सो किस प्रकार ? |
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यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥
जिस समय अग्निके प्रदीप्त होनेपर उसकी ज्वाला उठने लगे उस समय दोनों आज्यभागोंके* मध्यमें [ प्रातः और सायंकाल ] आहुतियाँ डाले ॥ २ ॥
| यदैवेन्धनैरभ्याहितैः सम्यगिद्धे समिद्धे हव्यवाहने लेलायते चलत्यर्चिस्तदा तस्मिन्काले लेलायमाने चलत्यर्चिष्याज्यभागावाज्यभागयोरन्तरेण मध्य आवापस्थान आहुतीः प्रतिपादयेत्प्रक्षिपेद्देवतामुद्दिश्य । अनेकाहप्रयोगापेक्षयाहुतीरिति बहुवचनम् ॥ २ ॥ | जिस समय सब ओर आधान किये हुए ईंधनद्वारा सम्यक् प्रकारसे इद्ध अर्थात् प्रज्वलित होनेपर अग्निसे ज्वाला उठने लगे तब—उस समय ज्वालाओंके चञ्चल हो उठनेपर आज्यभागोंके अन्तर—मध्यमें आवापस्थानमें देवताओंके उद्देश्यसे आहुतियाँ देनी चाहिये। अनेक दिनतक होनेवाले प्रयोगकी अपेक्षासे यहाँ 'आहुतीः' इस बहुवचनका प्रयोग किया गया है ॥ २ ॥ |
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* दर्श-पौर्णमास यज्ञमें आहवनीय अग्निके उत्तर और दक्षिण ओर 'अग्नये स्वाहा' तथा 'सोमाय स्वाहा' इन मन्त्रोंसे दो घृताहुतियाँ दी जाती हैं । उन्हें 'आज्यभाग' कहते हैं । इनके बीचका भाग 'आवापस्थान' कहलाता है । शेष सब आहुतियाँ उसीमें दी जाती हैं ।