भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५


तानि कवयो मेधाविनो वसिष्ठादयो यान्यपश्यन्दृष्टवन्तः। यत्तदेतत्सत्यमेकान्तपुरुषार्थसाधनत्वात्। तानि च वेदविहितान्यृषिदृष्टानि कर्माणि त्रेतायां त्रयीसंयोगलक्षणायां हौत्राध्वर्यवौद्गात्रप्रकारायामधिकरणभूतायां बहुधा बहुप्रकारं सन्ततानि प्रवृत्तानि कर्मिभिः क्रियमाणानि त्रेतायां वा युगे प्रायशः प्रवृत्तानि। <br><br> अतो यूयं तान्याचरथ निर्वर्तयत नियतं नित्यं सत्यकामा यथाभूतकर्मफलकामाः सन्तः। एष वो युष्माकं पन्था मार्गः सुकृतस्य स्वयं निर्वर्तितस्य कर्मणो लोके, फलनिमित्तं लोक्यते दृश्यते भुज्यत इति कर्मफलं लोक उच्यते; तदर्थं तत्प्राप्तय एष मार्ग इत्यर्थः। यान्येतानि अग्निहोत्रादीनि त्रय्यां विहितानि कर्माणि तान्येष पन्था अवश्यफलप्राप्तिसाधनमित्यर्थः ॥ १॥अग्निहोत्रादि कर्मोंको कवियों अर्थात् वसिष्ठादि मेधावियोंने देखा था, वही पुरुषार्थका एकमात्र साधन होनेके कारण यह सत्य है। वे ही वेदविहित और ऋषिदृष्ट कर्म त्रेतामें—[ ऋग्वेदविहित ] हौत्र, [ यजुर्वेदोक्त ] आध्वर्यव और [ सामवेदविहित ] औद्गात्र ही जिसके प्रकारभेद हैं उस अधिकरणभूत त्रयीसंयोगरूप त्रेतामें अनेक प्रकार सन्तत—प्रवृत्त हुए, अथवा कर्मठोंद्वारा किये जाकर प्रायशः त्रेतायुगमें प्रवृत्त हुए। <br><br> अतः सत्यकाम यानी यथाभूत कर्मफलकी इच्छावाले होकर तुम उनका नियत—नित्य आचरण करो। यही तुम्हारे सुकृत—स्वयं किये हुए कर्मोंके लोककी प्राप्तिके लिये मार्ग है। फलके निमित्तसे लोकित, दृष्ट अथवा भोगा जाता है इसलिये कर्मफल 'लोक' कहलाता है; उस ( कर्मफल ) के लिये अर्थात् उसकी प्राप्तिके लिये यही मार्ग है। तात्पर्य यह है कि वेदत्रयीमें विहित जो ये अग्निहोत्र आदि कर्म हैं वे ही यह मार्ग यानी अवश्य फलप्राप्तिका साधन हैं ॥ १ ॥